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फ़ुरसत

धूप इक रोज़ ढल ही जाती है उम्र सूरत बदल ही जाती है थोड़ी फ़ुरसत निकालकर देखो ज़िन्दगी तो निकल ही जाती है ✍️ चिराग़...

ख़ुदशनास

यूँ न समझो उदास बैठा हूँ आज मैं ख़ुदशनास बैठा हूँ मुझसे कोई अभी न बात करो मैं अभी अपने पास बैठा हूँ ✍️ चिराग़...

शबरी

नित्य सजाती रही अंगना, प्रभु राम के दर्श की आस में शबरी आस की ऐसी निशंक तपस्या से दर्ज हुई इतिहास में शबरी सीता वियोग से व्याकुल थे, तब घुल गयी राम की प्यास में शबरी राम को भक्ति का स्वाद चखा गयी बेर की जूठी मिठास में शबरी ✍️ चिराग़...

अहल्या

साँस न थी पर आस की डोर पे जीवित थी दुखियारी अहल्या शाप के ताप को, स्वर्ग के पाप को झेल रही थी बेचारी अहल्या देखने में बस पाहन थी, मन में धरती से थी भारी अहल्या देखो शिला में भी प्राण बहे जब राम ने छूकर तारी अहल्या ✍️ चिराग़...

उजाला हो गया

हर तरफ़ तन्हाइयों का बोलबाला हो गया सर्दियों में रात का मुँह और काला हो गया कर दिया डर के हवाले जब अंधेरे ने मुझे मैंने अपना डर जलाया और उजाला हो गया ✍️ चिराग़...

काँटे

मुश्किलो, और बढ़ो, और बिछाओ काँटे राह में, पाँव में, दामन में सजाओ काँटे दर्द कम होगा तो आराम की याद आएगी दूर मन्ज़िल है अभी, ढूंढ के लाओ काँटे ✍️ चिराग़...
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