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फ़ुरसत

धूप इक रोज़ ढल ही जाती है
उम्र सूरत बदल ही जाती है
थोड़ी फ़ुरसत निकालकर देखो
ज़िन्दगी तो निकल ही जाती है

✍️ चिराग़ जैन

ख़ुदशनास

यूँ न समझो उदास बैठा हूँ
आज मैं ख़ुदशनास बैठा हूँ
मुझसे कोई अभी न बात करो
मैं अभी अपने पास बैठा हूँ

✍️ चिराग़ जैन

आँसू की आवाज़

जो रैली में पींग बढ़ाते नारों की
हालत देखो जाकर उन बेचारों की

इंसानों की बस्ती भूखी बैठी है
तुम बातें करते हो चाँद-सितारों की

आँसू की आवाज़ छुपाकर रख पाएँ
इतनी भी औक़ात कहाँ दीवारों की

लहरों से कश्ती का हाथ छुड़ाना है
हिम्मत बढ़ती जाती है पतवारों की

सिगरेट को इक बार बुझाना उंगली से
गर तासीर समझनी है अंगारों की

✍️ चिराग़ जैन

ईद

ईद के चांद अगर हो तो बस इतना कर दे
फिर से इस मुल्क के लहजे में मिठास आ जाए

✍️ चिराग़ जैन

उजाला हो गया

हर तरफ़ तन्हाइयों का बोलबाला हो गया
सर्दियों में रात का मुँह और काला हो गया
कर दिया डर के हवाले जब अंधेरे ने मुझे
मैंने अपना डर जलाया और उजाला हो गया

✍️ चिराग़ जैन

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