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सरकार बड़ी दयालु है

सालों तक हम किसानों के लिए ‘अन्नदाता’, ‘धरती का भगवान’ और न जाने क्या-क्या विशेषण प्रयोग करते रहे। फिर एक दिन किसानों का राजनीति से पंगा हो गया। पंगा होते ही हम किसानों को ‘आतंकवादी’, ‘राष्ट्रद्रोही’, ‘दंगाई’, ‘अराजक’ और न जाने क्या-क्या कहने लगे। किसानों ने आंदोलन किया तो हमने ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे को बांट दिया और अपने जवानों को आदेश दिया कि किसानों पर हमला करो।
इसी तरह हम डॉक्टरों को भगवान का प्रतिनिधि कहते रहे। फिर एक बार डॉक्टरों को सरकार के सामने अपनी कुछ मांगें रखनी पड़ी। चूंकि इतने सालों में डॉक्टर भी खुद को भगवान समझने लगे थे इसलिए उन्होंने सरकार को डांटने का दुस्साहस किया। सरकार ने दो मिनिट में डॉक्टरों को बता दिया कि बेटा, तुम्हें भगवान बनाना हमारी लीला है। भगवान दरअस्ल हम ही हैं।
यही हाल खिलाड़ियों का भी रहा। जिसका सरकार से पंगा हुआ, उसी को उसकी औक़ात बता दी गई। पत्रकारों ने समय पर ही सरकार की कुर्सी पर बैठे भगवान को पहचान लिया था। इसलिए उन्होंने समय से पहले ही सरकार की आरती गानी शुरू कर दी थी। सरकार ने शरणागतवत्सल की तरह पत्रकारों को अभयदान दिया।
ज्यों-ज्यों अलग-अलग वर्गों ने सरकार द्वारा दिए गए सम्मान को सरकार के विरुद्ध प्रयोग करना चाहा, तुरंत सरकार ने उन पर से दयादृष्टि हटाकर तीसरी आंख खोल दी। और एक बार जिस पर उस तीसरी आंख की ज्वाला पड़ी, उसकी प्रतिष्ठा जलकर भस्म हो गई।
जिन विद्यार्थियों को हम अब तक देश का भविष्य समझते रहे, वे सरकार के सिस्टम में खामी निकालते ही कॉकरोच बन गए। विद्यार्थियों ने कहा कि हम सरकार का विरोध नहीं कर रहे हैं, हम तो केवल चोट के दर्द से कराह रहे हैं। पत्रकारों ने बताया कि तुम्हारी कराह से सरकार की आरती का माहौल खराब होता है। यह भी राष्ट्रद्रोह ही है।
शिक्षकों ने सोचा, हमें तो गुरुपूर्णिमा, शिक्षक दिवस और ऐसे ही तमाम सम्मान प्राप्त हैं। हमें तो हर वर्ग ने हमेशा सम्मान की दृष्टि से ही देखा है। यहां तक कि हिन्दी फिल्मों में भी हम हमेशा सम्मानित ही रहे हैं। और फिर हमने जनगणना से लेकर सरकार के अन्यान्य कार्यों में भी कभी आनाकानी नहीं की। झोला लेकर गली-गली बंद और खुली नालियां गिनते फिरे हैं। पोलियो की दवाइयां पिलाई हैं। इसलिए सरकार हमारी बात अवश्य सुनेगी।
ऐसा विचार करके मास्टर जी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने विद्यार्थियों को हुए कष्ट की दुहाई देते हुए रण में कूद पड़े। अबकी बार सरकार ने कुछ नहीं कहा। लेकिन पत्रकारों ने मास्टर जी की कौड़ी उठा दी। मास्टर बेचारा अपनी अदना सी पे-स्लिप को देखकर अपमानित होकर पानी-पानी हो गया। किसी ने मास्टर को ट्यूशनिया कहा तो किसी ने माफ़िया।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सरकार कभी ग़लत नहीं होती। जिसे सरकार में कोई ख़ामी दिखती है, वह या तो अहसानफ़रामोश है या फिर राष्ट्रद्रोही है। सरकार तो कृपानिधान है। वह तुम्हें समाज से इज़्ज़त दिलवाती है और तुम चले हो उसी पर उंगली उठाने…! हम्मम… बड़े आए!
✍️ चिराग़ जैन

क्रांति

उम्मीद से भरी आँखों में धूल झोंकी जाए तो उन आँखों से लावा फूटने लगता है। कराह को अनसुना किया जाए तो कराह चीख बन जाती है। और चीख बड़े-बड़े राजवंशों की चूल हिलाने का सामर्थ्य रखती है।

✍️ चिराग़ जैन

धरना दिया किसानों ने

दिल्ली के द्वारे आकर जब धरना दिया किसानों ने
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने

भीड़ जुटी तो आँखों में फुलझड़ियां छूट रही होंगी
हाथों में खुजली, मन में झुरझुरियाँ फूट रही होंगी
अपनापन-सा दिखता होगा लाठी छाप निशानों में
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने

दिल की धड़कन बढ़ती होगी, आंदोलन के नारों से
मुँह में पानी आता होगा, पानी की बौछारों से
जन्नत का सुख मिलता होगा, फटे गलों के गानों में
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने

बैरिगेट पुलिस के जिनके क़द से छोटे पड़ते थे
रह-रहकर जो दिल्ली की सड़कों पे लोटे पड़ते थे
कैसे रोक लिया सरजी को घर पर चार जवानों ने
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने
✍️ चिराग़ जैन

किसान आंदोलन, सरकार और कोविड

आज भारतीय शासन-तंत्र के प्रति श्रद्धा उमड़ रही है। इतने बड़े देश को सही से चलाने के लिये हर समस्या का समाधान खोजने चले तो सिस्टम के पसीने छूट जायेंगे, इसीलिये इसका श्रेष्ठ उपचार यह है कि जो आपके पास समस्या लेकर आये उसे किसी और समस्या में उलझा दो। इससे उसकी समस्या का समाधान नहीं होगा, लेकिन नयी समस्या में उलझते ही वह मूल समस्या को भूल ज़रूर जायेगा।
आप अदालत में कोई मुक़द्दमा दर्ज कराओ, अदालत आपको प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं के ऐसे जंजाल में उलझा देंगी कि अपनी मूल पीड़ा को बयान करना आपको याद ही नहीं रहेगा। इससे लाभ यह है कि जब आप किसी अन्याय अथवा उत्पीड़न के शिकार होते हैं तो थाने और कचहरी की उलझनों से मिलनेवाले कष्ट की मात्रा का आप कार्यवाहियों से मिलनेवाले कष्टों की मात्रा से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जिसने आपके साथ बुरा किया है, उसे ईश्वर एक दिन दण्ड देगा। इससे मनुष्य में ईश्वर के प्रति आस्था पुष्ट होती है।
इसी शानदार विधि से सरकार ने किसानों के आन्दोलन को डील किया। जो किसान कृषि बिल वापस लेने की मांग लेकर घर से चले थे, उनको सरकार ने बताया कि बिल पर चर्चा तब करेंगे जब दिल्ली आकर हमसे बात करोगे। अब किसानों को दिल्ली में घुसना, कृषि बिल वापस लेने की मांग से ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा। पूरे देश का ध्यान इस पर केंद्रित हो गया है कि किसान दिल्ली में घुस पाएंगे या नहीं। कृषि बिल के औचित्य पर चर्चा करना किसी को महत्त्वपूर्ण लग ही नहीं रहा।
अराजकता को रोकने के लिये राज्य का अराजक हो जाना प्रशंसनीय है। सरकार की मंशा किसानों का अहित नहीं है। वह चाहती है कि मंडी के दाम और मुनाफ़े जैसे भौतिक प्रश्नों से ऊपर उठकर किसान एक दिन अध्यात्म की ओर मुड़ें और ईश्वर पर भरोसा रखते हुए घर लौट जायें।
लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक नारा दिया था – ‘जय जवान, जय किसान।’ किसान आंदोलन में इस नारे का जो स्वरूप देखने को मिल रहा है वह आश्चर्यजनक है।
सरकार ने पुलिस के जवानों को निर्देश दिया है कि किसानों को दिल्ली में नहीं घुसने देना है। इस निर्देश का पालन करने के लिये पुलिस के जवान किसानों पर पानी की बौछार कर रहे हैं, आँसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं। सीआरपीएफ, पुलिस और रेपिड एक्शन फोर्स मिलकर ‘किसी भी हाल में’ किसानों को राजधानी में घुसने से रोकने के लिये कटिबध्द हैं।
चूँकि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है इसलिये सरकार को यह क़दम किसानों की भलाई के लिये उठाना पड़ रहा है। सरकार जानती है कि इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली में इकट्ठा होंगे तो इससे कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ सकता है। इसलिये सरकार किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक रही है। क्योंकि कोरोना वायरस हरियाणा और पंजाब में जाने से परहेज करता है।
कुछ मूढ़ लोग सरकार से पूछ रहे हैं कि हरियाणा उपचनाव, मध्य प्रदेश उपचुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव में कोरोना फैलने का ख़तरा क्यों नहीं था। उन मूर्खों को इतनी-सी बात समझ नहीं आती कि चुनाव लोकतंत्र के लिये सर्वाधिक आवश्यक हैं किन्तु सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतंत्र में अब निषिद्ध हो चुका है।
लोकतंत्र की रक्षार्थ समर्पित पुलिस के जवान, क़ानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये लोकतंत्रात्मक तरीक़े से चुनी गयी सरकार के विरुद्ध सड़क पर उतरे किसानों को रोक रही है तो इसमें क्या ग़लत है।
उधर श्रम सुधार के एजेंडे पर लाखों मजदूर हड़ताल पर हैं लेकिन उनकी कोई ख़ास ख़बर दिखाने का समय मीडिया के पास नहीं है। क्योंकि सारे संवाददाता अभी किसानों को रोकने के लिये की जा रही पुलिस कार्रवाई की कवरेज में व्यस्त हैं। कोविड को लेकर इतनी सतर्कता तो बरतनी ही पड़ेगी कि जनता के बहुत सारे मुद्दों को एक साथ इकट्ठा न होने दिया जाये। मुद्दों में सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर ही कोविड से लड़ा जा सकता है। सरकारों की इस सदाशयता पर किसी तथाकथित बुद्धिजीवी का ध्यान ही नहीं जाता।
दिल्ली सरकार ने कोविड से बचने के लिये मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का चालान दो हज़ार रुपये कर दिया है। बेचारे ग़रीब किसान दिल्ली में इतना महंगा चालान कैसे भरेंगे – इस चिंता के समाधान स्वरूप सरकार ने पुलिस को कहा है कि किसानों को दिल्ली में न घुसने दो ताकि दिल्ली की क्रूर सरकार उनसे दो-दो हज़ार रुपये न वसूल पाये। हमें केंद्र सरकार की इस सहृदयता की सराहना करनी चाहिये।
लाल बहादुर शास्त्री को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि भविष्य की राजनीति उनके नारे को इतना प्रचारित करेगी। आज अलग-अलग राजनेताओं ने अपनी-अपनी टीम बना ली है। सड़क पर दंगल चल रहा है। एक राजनैतिक दल जवानों को चीयर कर रही है और दूसरा राजनैतिक दल किसानों को। चैनल के स्टूडियो से रनिंग कमेंट्री चल रही है। ‘किसानों का जत्था बॉर्डर की ओर बढ़ा आ रहा है, पुलिस ने पानी की तेज़ बौछार से किसानों में अफरा-तफ़री मचा दी। पानी की बौछार तेज़ होती जा रही है और दर्शक दीर्घा के एक खेमे से ‘जय जवान’ का उद्घोष गूंजने लगा। उधर किसानों ने पानी की बौछार को पछाड़ते हुए बैरिगेट उठाकर फेंक दिये और पुलिस के जवानों पर पत्थरबाज़ी करनी शुरू कर दी। बैरिगेट के हवा में उठते ही दर्शक दीर्घा के दूसरे खेमे में जोश आ गया और वहाँ ‘जय किसान’ का नारा गूंजने लगा। अब पुलिस का पलड़ा भारी… अब किसान का पलड़ा भारी… दंगल रोमांचक होता हुआ… दर्शक दीर्घा में जोश बढ़ता हुआ… अब जय जवान के नारे गूंजने लगे… अब जय किसान के नारे गूंजने लगे…
दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर जो आँसू गैस के गोले चले उनके कारण लोकतंत्र और लाल बहादुर शास्त्री, दोनों की आँखों से आँसू बह रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन

नफ़रतें

आइये, मिलकर बढ़ायें नफ़रतें
चप्पे-चप्पे पर उगायें नफ़रतें

धर्म अपना यूँ निभायें नफ़रतें
एक दिन हमको ही खायें नफ़रतें

प्यार, माफ़ी,अम्न और इंसानियत
इन सभी को काट आयें नफ़रतें

गर मुहब्बत की कोई बातें करे
तो उसे ज़िन्दा जलायें नफ़रतें

जिसने ये दुनिया बनाई प्यार से
आओ, उसको भी सिखायें नफ़रतें

✍️ चिराग़ जैन

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