सफ़र
आगे बढ़नेवाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछेवाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
आगे बढ़नेवाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछेवाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
चलो, इस राह चलकर देखते हैं
कहाँ बदले मुकद्दर, देखते हैं
कहीं मुस्कान तो लब पर नहीं है
मेरे आँसू छलककर देखते हैं
हमें तो दिख रहा है कंठ नीला
यहाँ सब सिर्फ शंकर देखते हैं
हमारे हौसलों की थाह मत लो
कहाँ तक है समंदर, देखते हैं
अगर हँसता हुआ मिल जाऊँ उनको
तो जिगरी यार जलकर देखते हैं
अगर मुस्कान से परहेज रखूँ
तो फिर बच्चे सहम कर देखते हैं
अभी मजबूरियों की चल रही है
इरादे आह भरकर देखते हैं
यही एहसास दिल को खुश रखे है
वो हमको छुप-छुपाकर देखते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
बूंद बारिश की उसको छूती है
मन मेरा ज़ार-ज़ार जलता है
मैं उसे प्यार करूं तो बेहतर
और लोगों का प्यार खलता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
तुमसे सिंचित कली
हौले-हौले खिली
चहकी …महकी
इतराने लगी।
हवाओं में
बिखरने लगी उसकी ख़ुश्बू।
…अरे!
तुम रूठ क्यों गए हरसिंगार?
काॅम्प्लेक्स में आ गए हो क्या?
बर्दाश्त न हुई
अपने जने की ख़ुश्बू?
भार लगने लगा
अपना ही अंश?
तुम्हारी तो कीर्ति ही बढ़ाता था!
वरना कौन देखता था तुम्हारी ओर?
तुमने उसे ही गिरा दिया
ज़मीन पर!
देखो कैसा बिछ गया है बेचारा!
अनवरत निहारता
तुम्हारी ओर।
तुम मुँह फेरे खड़े हो!
ठूँठ कहीं के!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
क़ामयाबी की आस्तीनों में
मेरी शोहरत से जल गए दुश्मन
दोस्तों में बदल गए दुश्मन
क़ामयाबी की आस्तीनों में
हाय धोखे से पल गए दुश्मन
✍️ चिराग़ जैन
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