Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
देश की बौद्धिक सम्पदा, दो हिस्सों में बंट रही है। एक ओर वे लोग हैं जिन्होंने बहुत वर्षों से News Channels देखना बंद कर दिया है। ये लोग Social Media के माध्यम से देश का तापमान महसूस करने की कोशिश करते हैं। इनके लिए Trending Keywords ही Current Affairs बन जाते हैं।
सोशल मीडिया के जिस Influencers के पास अधिक Subscribers हैं, उनकी सोच ही इस तबके की सोच बन जाती है। सूचनाएं बटोरने आए जिज्ञासु ही इनके viewers हैं और इन्हीं व्यूअर्स की संख्या, इन्फ्लुएंसर्स की ताकत है।
इसी चक्र को साधते हुए खेल की तरह शुरु हुआ सोशल मीडिया आज बड़े से बड़े जनसमूह की सोच का Remote बन गया। दुनिया के अनेक देशों में सोशल मीडिया ने जनक्रांतियां खड़ी की हैं।
दुनिया भर के राजनैतिक दलों, सरकारों, विचारधाराओं, समाजसेवियों और यहां तक कि जन-आन्दोलनों ने भी सोशल मीडिया की ताक़त को समझते हुए ज़मीन पर काम करने से अधिक सोशल मीडिया की post को important समझने की प्रवृत्ति पाल ली।
दूसरी ओर है main stream media अर्थात् चौबीस घण्टे के news channels. पिछले डेढ़-दो दशकों में अचानक इनका दर्शक और पाठकवर्ग तेज़ी से कम हुआ। इसके पीछे एक बड़ा कारण तो यह है कि जो समय TV Screen पर व्यतीत होता था, वह अब mobile screen पर ख़र्च होने लगा। लोगों का Screen time बढ़ गया लेकिन टेलीविज़न की स्क्रीन के लिए लोगों के पास टाइम नहीं बचा। उधर OTT ने भी सीधे न्यूज़ चैनल्स देखने की आदत छुड़वा दी।
चौबीस घण्टे के चैनल्स को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि जिन Set top Box के लिए वे जनता को प्रेरित कर रहे थे, उन्हीं सेट टॉप बॉक्स के कारण जनता उनसे दूर हो जाएगी।
बहरहाल, तकनीक की कवायदों के साथ-साथ यह भी हुआ कि youtube और Facebook जैसे माध्यमों ने प्रापकों को ही संप्रेषक बना डाला। अब ख़ुद दर्शकों के अपने यूट्यूब चैनल्स बन गए। Reels बनाने की होड़ ने हर व्यक्ति के मन में संचार माध्यमों से कमाने की ललक जगा दी।
और रही-सही कसर पूरी कर दी, न्यूज़ चैनल्स में राजनैतिक हस्तक्षेप ने। जब जनता स्वयं विज्ञापनों के माध्यम से होनेवाली कमाई का गणित समझने लगी तो उसे यह भी समझ आ गया कि चैनल्स पर प्रसारित होनेवाली ख़बरों को कैसे दिखाने पर उनके अर्थ कैसे बदल सकते हैं। कैसे जनता को एंगेज करके विज्ञापन कमाए जाते हैं। कैसे endorsement को ख़बर कहकर दिखाया जा सकता है।
जनता का इस पूरे विपणन प्रबंधन को समझना, मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।
लेकिन एक तबका अभी भी मेन स्ट्रीम मीडिया से चिपका हुआ है। वह अभी भी देश के दो दर्जन News Anchors को ही देश का असली युगदृष्टा समझकर उनका Bulletin नियम से देखते हैं। इस तबके की सोच का रिमोट उन लोगों के पास है, जिनका आर्थिक, प्राशासनिक अथवा राजनैतिक दबाव उन दो दर्जन न्यूज़ एंकर्स के मालिकों पर है। जन की भावना का सम्मान करने के स्थान पर ये लोग जन की भावना को अपने नियामकों के स्वार्थानुरूप मोड़ने में सफल होते हैं।
गड्ढे में भरे पानी को भीषण बाढ़ कैसे दिखाना है, यह कैमरा जानता है। किस एंगल पर कैमरा रखने से रैली हाउसफुल दिखाई देगी और किस एंगल पर कैमरा रखने से रैली असफल दिखेगी। इसकी ट्रेनिंग कैमरामैन को हो जाती है।
लेकिन हर मोबाइल में कैमरा आ जाने से इन प्रशिक्षित कैमरा पर्सन्स का काम थोड़ा कठिन हो गया है। यह सत्य है कि सोशल मीडिया पर दिखाए गए सौ सच, मेनस्ट्रीम मीडिया के एक झूठ के आगे बौने रह जाते हैं। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया पर देखे गए एक Raw वीडियो के माध्यम से मेनस्ट्रीम मीडिया के हज़ार HD Videos की विश्वसनीयता में डेंट तो लग ही जाता है।
यह दौर पत्रकारिता के लिए पुनर्विचार का एक अवसर है। व्यावसायिक तथा पारिवारिक विवशताओं का सम्मान करते हुए मैं यह स्वीकार करने को तैयार हूं कि अपने कॉर्पोरेट हाउसेस के निर्देश का पालन करते हुए उन्हें कई बार ‘शाम’ को ‘रात’ कहना पड़ सकता है। लेकिन जब ईयरपीस में ‘भरी दोपहर’ को ‘रात’ कहने का निर्देश आए तो एक पल के लिए कान से ईयरपीस हटाकर अपने ज़मीर की आवाज़ सुन लेना अंततः स्वयं उनके भी हित में होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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पिछले दो-तीन दिनों से पुलिस और जनता के मध्य के संबंधों की जैसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं, उनसे हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था के चेहरे पर ग्रहण लग रहा है।
किसी सभ्य तथा विकासोन्मुखी व्यवस्था में पुलिस और जनता के मध्य परस्पर विश्वास का सम्बंध होता है। दोनों एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो समाज के दो पैरों की भूमिका निबाहते प्रतीत होते हैं।
एक पैर जब दूसरे पैर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा होता है तब वह दरअस्ल दूसरे पैर के आगे आने का रास्ता बना रहा होता है। इसी समन्वय पर समाज ‘चलता’ है।
किन्तु ये दोनों पैर यदि आपस में उलझना प्रारंभ कर दें तो समाज को लड़खड़ाने से कोई नहीं बचा सकता।
ये दोनों ही पैर एक दूसरे के इतने समीप रहते हैं कि चलने की प्रक्रिया में इनमें परस्पर घर्षण की घटनाएँ स्वाभाविक हैं।
ट्रैफिक पुलिस के जवानों के साथ होनेवाली झड़पें, पैट्रोलिंग करते जवानों के साथ होनेवाली कहासुनी, किसी पुलिसकर्मी के भ्रष्टाचार की वीडियो और ऐसी ही अन्य जो दुर्घटनाएं सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं, वे इसी घर्षण का प्रमाण हैं।
विपरीत परिस्थितियों में अधिकारियों की डाँट, पारिवारिक चुनौतियों, नकारात्मक परिवेश और प्रोटोकॉल के दायित्व निबाहते हुए पब्लिक के बीच ड्यूटी करते पुलिसवालों की मनोदशा में चिड़चिड़ापन शुमार होना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर अपनी किसी तात्कालिक समस्या से त्रस्त नागरिक का बिलखते हुए, भन्नाए हुए, अकड़ते हुए या चिल्लाते हुए थाने आना भी स्वाभाविक है।
यहाँ तक नागरिकों और पुलिस के मध्य के संबंधों में कुछ नया नहीं है। लेकिन 19 जुलाई 2026 के बाद से दिल्ली में छात्र-आंदोलनस्थल से दोनों ओर की जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं वे स्वाभाविक नहीं हैं।
सोशल मीडिया, पुलिस को क्रूर सिद्ध करने पर उतारू है और मेन स्ट्रीम मीडिया, आंदोलनकारियों को गुंडा बताने पर तुला है।
हिंसा कहीं से भी शुरू हो, वह समाज के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकती। पुलिसकर्मियों की लाठी से पिटकर बिलखते-चिल्लाते युवा भी समाज के भविष्य के लिए प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं और आंदोलनकारियों की भीड़ में फंसकर हांफता हुआ पुलिसकर्मी भी सामाजिक सौहार्द की सबसे कमज़ोर गाँठ को स्पर्श कर चुका है।
आंदोलन को लेकर सरकार की अपनी कुछ रणनीति हो सकती है। आंदोलन को लेकर विपक्ष की भी अपनी सोच हो सकती है। विधायिका और राजनीति को सड़कों पर उतरे इस जनसमूह को राजद्रोही घोषित करना है या जागरूक नागरिक -यह सियासत का विषय है लेकिन इस सियासी शतरंज में यदि समाज हार गया तो दो बादशाहों को जिताने के लिए बाइस मोहरे कुर्बान हो जाएंगे।
आंदोलन लोकतंत्र का फ्यूल पंप है। यहाँ से पाथेय लेकर लोकतंत्र जनहित की राह पर तेज़ी से दौड़ता है। आंदोलन के फ्यूल की माइलेज हर बार गाड़ी की क्वालिटी के अनुरूप बदल सकती है।
लेकिन ईंधन भरवाते समय पेट्रोल टैंक का फटना ख़तरनाक है। इसलिए पुलिस और जनता दोनों को ही स्मरण रखना होगा कि अराजकता की राह पर बढ़ा एक भी कदम समाज को गहरे अंधकार में धकेल देगा।
आंदोलनकारियों को षड्यंत्रकारी, राष्ट्रद्रोही, धर्मविरोधी, ग़द्दार और आतंकवादी कहना सरकारों की प्रवृत्ति रही है। आपातकाल के दौरान सत्ता के आलोचकों पर ‘राजद्रोह’ के चार्ज लगे। विपक्ष तो विपक्ष, विपक्ष की विचारधारा तक को समर्थन देनेवाले जेलों में भर दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने अधिकारों की मांग करनेवाले ‘दंगाई’, ‘उपद्रवी’ और ‘अपराधी’ घोषित किए गए। अन्ना आंदोलन और बाबा रामदेव के धरने के प्रति सत्ता का नज़रिया अभी स्मृतियों से ग़ायब नहीं हुआ है। किसान आंदोलन, खिलाड़ियों के धरने और मजदूरों के आंदोलन के प्रति सरकारी नीतियों के ज़ख़्म तो अभी तक हरे हैं।
इसलिए किसी भी जन आंदोलन का समर्थन करो या विरोध… यह ध्यान रहे कि आपका निर्णय किसी लामबंद मीडिया, किसी राजनैतिक दल अथवा किसी विचारधारा के influence से प्रभावित न हो।
और आंदोलनस्थल पर खड़े हर आंदोलनकारी को और हर सुरक्षाकर्मी को यह याद रखना चाहिए कि सरकार पराई हो सकती है; षड्यंत्र विदेशी हो सकते हैं; लेकिन देश आपका अपना है।
✍️ चिराग़ जैन
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जब आपको लगे कि संसार दुःखों का सागर है…! जब आपको लगे कि आपका ब्लड प्रेशर लो हो रहा है तो केवल एक काम कीजिए- किसी भी कम्पनी के ग्राहक सेवा केंद्र को फोन मिला लीजिए।
इसके बाद आपको संसार के कण-कण में व्याप्त कष्ट बौने लगने लगेंगे। आपका रक्तचाप इतना ऊपर चला जाएगा कि आप ख़ुद उसे नीचे लाने की दवाई खाने लगेंगे।
जिसने आईवीआर का आविष्कार किया है, वह ज़रूर कोई ध्यानी योगी रहा होगा। जो दुनिया के समस्त मनुष्यों को ध्यान का अनुभव करवाना चाहता होगा।
इसीलिए आईवीआर की ओर से जब विकल्प चुनने का मेन्यू पढ़ा जाता है तब सुननेवाला एकाग्रचित्त होकर इस मुद्रा में बैठ जाता है जैसे कोई धनुर्धर पूरी तन्मयता से अपने लक्ष्य पर निशाना साध रहा हो। क्योंकि धनुर्धर जानता है कि यदि निशाना चूक गया, तो उधर से मधुर आवाज़ में आकाशवाणी होगी “क्षमा करें, आपने ग़लत विकल्प चुना है, कृपया दोबारा प्रयास करें”।
आईवीआर पर समाधान ढूँढना ठीक ऐसा है जैसे भूसे में सूई खोजना। बीच-बीच में सूई आपकी हथेली को चूमकर उम्मीद बनाए रखेगी लेकिन हाथ आएगा केवल भूसा।
इस करेले में नीम का तड़का तब लगता है जब आप मशीन से उकताकर किसी मनुष्य से बात करने का विचार करते हैं। यह विकल्प इतना दुर्लभ है जैसे सागर से अमृत निकालना।
किन्तु दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के बल पर आपने सागर मंथन प्रारंभ कर ही दिया तो अमृतघट से पहले इतना कुछ निकलेगा कि आप ख़ुद अमृत की खोज करना भूल जाएंगे। आपकी स्थिति उस प्राणी जैसी हो जाएगी जो अमर होने की इच्छा में मर जाता है।
और अगर आपने ढीठ होकर अमृतकलश हासिल कर ही लिया और आपको “हमारे ग्राहक सेवा प्रतिनिधि से बात करने के लिए नौ दबाएँ” के गोल्डन वर्ड्स सुनाई दे ही गए तो इस अमृत कलश का ढक्कन खोलना एक अलग कलेश है।
नौ दबाते ही एक अनहद संगीत बजना शुरू होगा, जिसमें हर थोड़ी देर में एक मीठी मशीनी आवाज़ सुनाई देगी- “आपका कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है, कृपया प्रतीक्षा करें।”
महाराज सगर के पुत्रों ने ढेर होकर युगों तक प्रतीक्षा की थी, किंतु आईवीआर के शिकंजे में फँसा प्राणी प्रतीक्षा करते-करते ढेर हो जाता है।
आप स्वयं को ‘महत्वपूर्ण’ मानते हुए भागीरथ की भाँति तपस्या करते रहते हैं। फोन इसलिए नहीं काटते क्योंकि फोन काटते ही अब तक की गई साधना व्यर्थ हो जाएगी।
फाइनली आपके पेशेंस की कठिन परीक्षा लेने के बाद अनहद का संगीत बंद होता है। रिसीवर उठने की खड़खड़ी होती है और उधर से एक अदद मनुष्या का दिव्य स्वर सुनाई देता है। नमस्कार, मैं मोनिका आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आप मेले में खोए हुए बच्चे की तरह माँ से मिलने पर रोना चाहते हैं। उसे बताना चाहते हैं कि उस तक पहुँचने के लिए आपने कितने महान कष्ट झेले हैं।
लेकिन मोनिका मशीन की तरह बोलती है “आपको हुई असुविधा के लिए मैं क्षमा चाहूंगी मिस्टर जैन। बताइए मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आपको लगा जैसे मजनू पूरा रेगिस्तान पार करके भूखा-प्यासा लैला के पास पहुँचा, लेकिन लैला ने उससे पानी तक नहीं पूछा और रूखे बेहद रूखे स्वर में पूछा- “बताओ, क्यों आए हो?”
आप खून का घूंट पीकर याद करते हो कि आपने ये फोन मिलाया क्यों था! जब तक आपको याद आता है तब तक कठिन तपस्या से प्रकट हुई देवी विलीन हो चुकी होती है, फोन कट चुका होता है और आप संसार चक्र में घूमते प्राणी की भाँति दोबारा कस्टमर केयर का नंबर डायल करने लगते हो।
चिराग़ जैन

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‘चार पैग व्हिस्की, दो बोतल बीयर, ओ माई डियर, हैप्पी न्यू ईयर’ -बचपन में ग्रीटिंग कार्ड पर इस गोत्र की शायरी लिखी जाती थीं।
‘आपकी सारी प्रॉब्लम होंगी फिक्स, ख़ुशी-ख़ुशी बीतेगा ट्वेंटी ट्वेंटी-सिक्स’; ‘नीचे से निकला आलू, 2026 चालू’ और ‘ऊपर से गिरा बम, 2025 ख़तम’ -इन महान कविताओं से इस बार भी नये साल की शुरुआत हो ही गई।
देश के एक महान कवि ने मुझे दो साहित्यिक पंक्तियों से नववर्ष की बधाई दी। ‘गाय दूध देती है लात मारकर, हैप्पी न्यू ईयर आँख मारकर।’ इन महान पंक्तियों में जो आँख मुझे मारी गई थी, वो अभी तक मेरी आँख में खटक रही है। मैंने उनका संदेश पढ़ा और सूर-कबीर से लेकर तुलसी और ग़ालिब तक को श्रद्धांजलि अर्पित कर दी।
पहले के ज़माने में शुभकामनाएं देने में पैसे और समय दोनों ख़र्च होते थे। ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदने या बनाने के लिए परिश्रम करना पड़ता था। फिर उसे पोस्ट करने डाकखाने तक जाना भी पड़ता था। इसलिए उसी को शुभकामनाएं दी जाती थीं, जिससे कुछ ख़ास लगाव हो।
अब हमारे हाथ में मोबाइल है। अब हम रजाई में पड़े-पड़े ही हज़ारों लोगों को शुभकामनाएं भेज देते हैं। एआई की मदद से रेडीमेड पोस्टरों पर अपना खूबसूरत चेहरा चिपकाकर हम थोक के भाव पर्सनल शुभकामनाएं भेजते हैं।
31 दिसंबर की दोपहर से ही हम अपने-अपने मोबाइल से शुभकामनाएं दागने लगते हैं। चारों ओर शुभकामनाओं की बाढ़ आ जाती है। सबके इनबॉक्स लबालब भर जाते हैं। व्हाट्सएप बल्क मैसेजिंग को स्पैम समझकर अकाउंट रेस्ट्रिक्ट कर देता है। अब इन पश्चिमी लोगों को क्या पता कि त्योहार कैसे मनाए जाते हैं।
रेस्ट्रिक्शन के साथ ही व्हाट्सएप का बिज़नेस पैकेज परचेज़ करने का ऑफर आने लगता है। तब हम भारतीयों को समझ आता है कि त्योहार की आड़ में पैसे कैसे कमाए जाते हैं।
पूरा त्योहार शुभकामनाओं के उत्तर देते हुए ही बीत जाता है। धूमधाम से मनाए जानेवाले त्योहार अब कॉपी-पेस्ट से मनने लगे हैं।
शुभकामनाओं की आमद इतनी स्पीड से होती है कि उन्हें बिना पढ़े ही ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ लिखना पड़ता है।
पिछले वर्ष एक जनवरी को ही मेरे एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया था। मैंने क्लिपबोर्ड पर ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ की मुहर बना रखी थी। शोक संदेश का डिजाइनर मैसेज भी एआई से तैयार करके भेजा गया था। मैंने भी उसे बिना डाउनलोड किए उसके नीचे अपना क्लिपबोर्ड चिपका कर भेज दिया। तब से पूरा साल बीत गया, वे मेरी नमस्ते का भी जवाब नहीं देते।
डिजिटली भेजी गई सामग्री को यदि सच में डाउनलोड करना संभव होता तो इस एक जनवरी को मैंने लगभग तीन चार क्विंटल केक और चॉकलेट खा लिया होता।
मैंने एक बेकरी पर जाकर केक और चॉकलेट से उनके हालचाल पूछे। उन्होंने भी एआई की एक रेडीमेड शायरी पढ़कर अपना दर्द बयान किया- ‘आग लगे इस डीप फेक को, नये साल में भी कोई नहीं पूछ रहा केक को।’
मोबाइल की स्क्रीन पर घिसते-घिसते हमारे नसीब की रेखाएँ मिट गई हैं। जिन हाथों से हम हाथ मिलाते थे, वे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। जिन आँखों से हम अपनों को देखते थे, वे मोबाइल में गड़ी हुई हैं। हम अपने-अपने हिस्से का नकलीपन निभा रहे हैं। और हमें ग़लतफ़हमी है कि हम त्योहार मना रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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मेरे एक परिचित हैं, जो पिछले कुछ महीनों से ख़ुद को सेलिब्रिटी मान बैठे हैं। अब वे दिन भर भीतर ही भीतर सेलिब्रिटी होने के भाव से भरकर अपने आसपास के सभी मनुष्यों को तुच्छ समझते हुए विचरते हैं और रात होने पर शेष विश्व को टुच्चा समझते हुए व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ सो जाते हैं।
उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है उनके परिवेश को इस बात की भनक तक नहीं है कि वे सेलिब्रिटी बन चुके हैं। उनके घरवाले, उनके दोस्त, उनके रिश्तेदार तथा उनके पड़ोसी अभी भी उन्हें मनुष्य समझकर उनसे सामान्य व्यवहार करते हैं।
स्वयं को सामान्य समझा जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वे इस बदतमीज़ी का बदला लेने के लिए वे तुरंत अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक शायराना स्टेटस पोस्ट करते हैं, जिसका भावार्थ लगभग यह होता है कि, ‘ज़ालिम ज़मानेवालो, आज तुम मेरी कद्र मत करो लेकिन एक दिन तुम मुझसे मिलने को तरस जाओगे।’
चूँकि शेष विश्व को वे ख़ुद से बात करने लायक नहीं समझते इसलिए समय बिताने के लिए वे सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी लोगों की प्रोफाइल, रील तथा स्टेटस देखते रहते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि सचमुच का सेलिब्रिटी बनने के लिए ऐसे स्टेटस डालना ज़रूरी होता है। वे यह बात मानने को तैयार नहीं हैं कि ऐसे स्टेटस डालने से पहले सचमुच का सेलिब्रिटी बनना आवश्यक होता है।
सेलिब्रिटीपना सीखने के चक्कर में वे टीपने में पारंगत हो गए हैं। पिछले दिनों उन्होंने देखा कि एक फिल्मस्टार ने अपनी किचन में मटर छीली। मटर छीलने की उसकी रील पर मिलियन व्यू देखकर हमारे स्वयंभू सेलिब्रिटी ने नहा-धोकर चकाचक पैंट-शर्ट पहनी, बालों को सूतकर बहाया, चेहरे पर थोड़ी लीपा-पोती की और रील बनाने निकल पड़े। शूटिंग की लोकेशन भी सेम थी, बस ज़रा-सा अन्तर ये था कि फिल्मस्टार की रसोई थोड़ी आलीशान किस्म की थी, और हमारे लोकल सेलिब्रिटी की रसोई की दीवार पर चिकनाई के स्वाभाविक निशान थे। फिल्मस्टार की रील किसी ने चुपके से बनाई थी और हमारे सेलिब्रिटी ने बाकायदा कॉलर माईक लगाकर शूटिंग करवाई थी। हमारे सेलिब्रिटी इतने स्वार्थी नहीं हैं कि मटर छीलने की गोपनीय रेसिपी से अपने विराट फैन क्लब को वंचित रखें इसलिए उन्होंने मटर छीलने जैसे वीरोचित कर्म की पूरी रेसिपी भी अपने फैन्स को बताई।
सेलिब्रिटी को अपने फैंस का ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए हमारे लोकल ब्रांड सेलिब्रिटी हर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय विषय पर किसी विद्वान की वीडियो सुनते हैं और फिर उसे अपने मुखारविंद से दोबारा रिकार्ड करके अपने फैंस क्लब के सामने विद्वान बनने का अभिनय करते हैं।
जब कोई उनके स्टेटस पर आकर समर्थन या विरोध नहीं करता, तो वे विनम्रतापूर्वक स्वयं दूसरों के स्टेटस पर अबूझ टाइप के कमेंट्स करके ध्यानाकर्षण का प्रयास करते फिरते हैं।
कई महीनों के अथक प्रयासों के बाबजूद जब उनके फैंस क्लब की संख्या में वृद्धि नहीं हो पाई तो वे सपत्नीक सेलिब्रिटी बनने निकल पड़े। खाना खाने से लेकर आने-जाने तक वे अपनी हर गतिविधि की रील बनाते हैं और हर रील में अपनी पत्नी को गले लगाकर अपने फैंस को अपने खुशनुमा दाम्पत्य की झलक दिखाते रहते हैं।
पिछले दिनों उनके कुनबे में कोई बुजुर्ग दिवंगत हो गए। हमारे सेलिब्रिटी ने इस दुःख की घड़ी में भी अपने फैंस को नहीं भुलाया। अपने बाबाजी की मृत्यु का दुःख मनाने से पहले उन्होंने लाश का चेहरा खोलकर उसकी फोटो खिंची। फिर उसे तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। ताकि उनका कोई भी फैन अंतिम दर्शन से वंचित न रह जाए। इस पोस्ट के बाद वे दिन भर रील डालकर अपने विराट फैन क्लब को यह बताते रहे कि सेलिब्रिटी रो रहा है।
सबको गाइज, दोस्तों और भाइयों कहकर संबोधित करते हुए वे अथक साधना कर रहे हैं। इतने महीनों में वे अपने परिवार को यह समझाने में सफल हो गए हैं कि एक दिन वे सोशल मीडिया के ज़रिये पूरे संसार में फेमस हो जाएंगे। शायद इसी कारण कल जब वे टूथपेस्ट करते हुए रील बना रहे थे तब उनकी पत्नी कैमरा लेकर वॉशबेसिन के सामने दम साधे खड़ी थी, और बाकी पूरा परिवार मुँह पर टेप लगाए चुपचाप बैठा था, कि कहीं कोई शोर हुआ तो इतनी महत्वपूर्ण रील की ऑडियो क्वालिटी ख़राब न हो जाए।
✍️ चिराग़ जैन