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जब आपको लगे कि संसार दुःखों का सागर है…! जब आपको लगे कि आपका ब्लड प्रेशर लो हो रहा है तो केवल एक काम कीजिए- किसी भी कम्पनी के ग्राहक सेवा केंद्र को फोन मिला लीजिए।
इसके बाद आपको संसार के कण-कण में व्याप्त कष्ट बौने लगने लगेंगे। आपका रक्तचाप इतना ऊपर चला जाएगा कि आप ख़ुद उसे नीचे लाने की दवाई खाने लगेंगे।
जिसने आईवीआर का आविष्कार किया है, वह ज़रूर कोई ध्यानी योगी रहा होगा। जो दुनिया के समस्त मनुष्यों को ध्यान का अनुभव करवाना चाहता होगा।
इसीलिए आईवीआर की ओर से जब विकल्प चुनने का मेन्यू पढ़ा जाता है तब सुननेवाला एकाग्रचित्त होकर इस मुद्रा में बैठ जाता है जैसे कोई धनुर्धर पूरी तन्मयता से अपने लक्ष्य पर निशाना साध रहा हो। क्योंकि धनुर्धर जानता है कि यदि निशाना चूक गया, तो उधर से मधुर आवाज़ में आकाशवाणी होगी “क्षमा करें, आपने ग़लत विकल्प चुना है, कृपया दोबारा प्रयास करें”।
आईवीआर पर समाधान ढूँढना ठीक ऐसा है जैसे भूसे में सूई खोजना। बीच-बीच में सूई आपकी हथेली को चूमकर उम्मीद बनाए रखेगी लेकिन हाथ आएगा केवल भूसा।
इस करेले में नीम का तड़का तब लगता है जब आप मशीन से उकताकर किसी मनुष्य से बात करने का विचार करते हैं। यह विकल्प इतना दुर्लभ है जैसे सागर से अमृत निकालना।
किन्तु दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के बल पर आपने सागर मंथन प्रारंभ कर ही दिया तो अमृतघट से पहले इतना कुछ निकलेगा कि आप ख़ुद अमृत की खोज करना भूल जाएंगे। आपकी स्थिति उस प्राणी जैसी हो जाएगी जो अमर होने की इच्छा में मर जाता है।
और अगर आपने ढीठ होकर अमृतकलश हासिल कर ही लिया और आपको “हमारे ग्राहक सेवा प्रतिनिधि से बात करने के लिए नौ दबाएँ” के गोल्डन वर्ड्स सुनाई दे ही गए तो इस अमृत कलश का ढक्कन खोलना एक अलग कलेश है।
नौ दबाते ही एक अनहद संगीत बजना शुरू होगा, जिसमें हर थोड़ी देर में एक मीठी मशीनी आवाज़ सुनाई देगी- “आपका कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है, कृपया प्रतीक्षा करें।”
महाराज सगर के पुत्रों ने ढेर होकर युगों तक प्रतीक्षा की थी, किंतु आईवीआर के शिकंजे में फँसा प्राणी प्रतीक्षा करते-करते ढेर हो जाता है।
आप स्वयं को ‘महत्वपूर्ण’ मानते हुए भागीरथ की भाँति तपस्या करते रहते हैं। फोन इसलिए नहीं काटते क्योंकि फोन काटते ही अब तक की गई साधना व्यर्थ हो जाएगी।
फाइनली आपके पेशेंस की कठिन परीक्षा लेने के बाद अनहद का संगीत बंद होता है। रिसीवर उठने की खड़खड़ी होती है और उधर से एक अदद मनुष्या का दिव्य स्वर सुनाई देता है। नमस्कार, मैं मोनिका आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आप मेले में खोए हुए बच्चे की तरह माँ से मिलने पर रोना चाहते हैं। उसे बताना चाहते हैं कि उस तक पहुँचने के लिए आपने कितने महान कष्ट झेले हैं।
लेकिन मोनिका मशीन की तरह बोलती है “आपको हुई असुविधा के लिए मैं क्षमा चाहूंगी मिस्टर जैन। बताइए मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ।”
आपको लगा जैसे मजनू पूरा रेगिस्तान पार करके भूखा-प्यासा लैला के पास पहुँचा, लेकिन लैला ने उससे पानी तक नहीं पूछा और रूखे बेहद रूखे स्वर में पूछा- “बताओ, क्यों आए हो?”
आप खून का घूंट पीकर याद करते हो कि आपने ये फोन मिलाया क्यों था! जब तक आपको याद आता है तब तक कठिन तपस्या से प्रकट हुई देवी विलीन हो चुकी होती है, फोन कट चुका होता है और आप संसार चक्र में घूमते प्राणी की भाँति दोबारा कस्टमर केयर का नंबर डायल करने लगते हो।
चिराग़ जैन

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‘चार पैग व्हिस्की, दो बोतल बीयर, ओ माई डियर, हैप्पी न्यू ईयर’ -बचपन में ग्रीटिंग कार्ड पर इस गोत्र की शायरी लिखी जाती थीं।
‘आपकी सारी प्रॉब्लम होंगी फिक्स, ख़ुशी-ख़ुशी बीतेगा ट्वेंटी ट्वेंटी-सिक्स’; ‘नीचे से निकला आलू, 2026 चालू’ और ‘ऊपर से गिरा बम, 2025 ख़तम’ -इन महान कविताओं से इस बार भी नये साल की शुरुआत हो ही गई।
देश के एक महान कवि ने मुझे दो साहित्यिक पंक्तियों से नववर्ष की बधाई दी। ‘गाय दूध देती है लात मारकर, हैप्पी न्यू ईयर आँख मारकर।’ इन महान पंक्तियों में जो आँख मुझे मारी गई थी, वो अभी तक मेरी आँख में खटक रही है। मैंने उनका संदेश पढ़ा और सूर-कबीर से लेकर तुलसी और ग़ालिब तक को श्रद्धांजलि अर्पित कर दी।
पहले के ज़माने में शुभकामनाएं देने में पैसे और समय दोनों ख़र्च होते थे। ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदने या बनाने के लिए परिश्रम करना पड़ता था। फिर उसे पोस्ट करने डाकखाने तक जाना भी पड़ता था। इसलिए उसी को शुभकामनाएं दी जाती थीं, जिससे कुछ ख़ास लगाव हो।
अब हमारे हाथ में मोबाइल है। अब हम रजाई में पड़े-पड़े ही हज़ारों लोगों को शुभकामनाएं भेज देते हैं। एआई की मदद से रेडीमेड पोस्टरों पर अपना खूबसूरत चेहरा चिपकाकर हम थोक के भाव पर्सनल शुभकामनाएं भेजते हैं।
31 दिसंबर की दोपहर से ही हम अपने-अपने मोबाइल से शुभकामनाएं दागने लगते हैं। चारों ओर शुभकामनाओं की बाढ़ आ जाती है। सबके इनबॉक्स लबालब भर जाते हैं। व्हाट्सएप बल्क मैसेजिंग को स्पैम समझकर अकाउंट रेस्ट्रिक्ट कर देता है। अब इन पश्चिमी लोगों को क्या पता कि त्योहार कैसे मनाए जाते हैं।
रेस्ट्रिक्शन के साथ ही व्हाट्सएप का बिज़नेस पैकेज परचेज़ करने का ऑफर आने लगता है। तब हम भारतीयों को समझ आता है कि त्योहार की आड़ में पैसे कैसे कमाए जाते हैं।
पूरा त्योहार शुभकामनाओं के उत्तर देते हुए ही बीत जाता है। धूमधाम से मनाए जानेवाले त्योहार अब कॉपी-पेस्ट से मनने लगे हैं।
शुभकामनाओं की आमद इतनी स्पीड से होती है कि उन्हें बिना पढ़े ही ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ लिखना पड़ता है।
पिछले वर्ष एक जनवरी को ही मेरे एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया था। मैंने क्लिपबोर्ड पर ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ की मुहर बना रखी थी। शोक संदेश का डिजाइनर मैसेज भी एआई से तैयार करके भेजा गया था। मैंने भी उसे बिना डाउनलोड किए उसके नीचे अपना क्लिपबोर्ड चिपका कर भेज दिया। तब से पूरा साल बीत गया, वे मेरी नमस्ते का भी जवाब नहीं देते।
डिजिटली भेजी गई सामग्री को यदि सच में डाउनलोड करना संभव होता तो इस एक जनवरी को मैंने लगभग तीन चार क्विंटल केक और चॉकलेट खा लिया होता।
मैंने एक बेकरी पर जाकर केक और चॉकलेट से उनके हालचाल पूछे। उन्होंने भी एआई की एक रेडीमेड शायरी पढ़कर अपना दर्द बयान किया- ‘आग लगे इस डीप फेक को, नये साल में भी कोई नहीं पूछ रहा केक को।’
मोबाइल की स्क्रीन पर घिसते-घिसते हमारे नसीब की रेखाएँ मिट गई हैं। जिन हाथों से हम हाथ मिलाते थे, वे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। जिन आँखों से हम अपनों को देखते थे, वे मोबाइल में गड़ी हुई हैं। हम अपने-अपने हिस्से का नकलीपन निभा रहे हैं। और हमें ग़लतफ़हमी है कि हम त्योहार मना रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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मेरे एक परिचित हैं, जो पिछले कुछ महीनों से ख़ुद को सेलिब्रिटी मान बैठे हैं। अब वे दिन भर भीतर ही भीतर सेलिब्रिटी होने के भाव से भरकर अपने आसपास के सभी मनुष्यों को तुच्छ समझते हुए विचरते हैं और रात होने पर शेष विश्व को टुच्चा समझते हुए व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ सो जाते हैं।
उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है उनके परिवेश को इस बात की भनक तक नहीं है कि वे सेलिब्रिटी बन चुके हैं। उनके घरवाले, उनके दोस्त, उनके रिश्तेदार तथा उनके पड़ोसी अभी भी उन्हें मनुष्य समझकर उनसे सामान्य व्यवहार करते हैं।
स्वयं को सामान्य समझा जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वे इस बदतमीज़ी का बदला लेने के लिए वे तुरंत अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक शायराना स्टेटस पोस्ट करते हैं, जिसका भावार्थ लगभग यह होता है कि, ‘ज़ालिम ज़मानेवालो, आज तुम मेरी कद्र मत करो लेकिन एक दिन तुम मुझसे मिलने को तरस जाओगे।’
चूँकि शेष विश्व को वे ख़ुद से बात करने लायक नहीं समझते इसलिए समय बिताने के लिए वे सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी लोगों की प्रोफाइल, रील तथा स्टेटस देखते रहते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि सचमुच का सेलिब्रिटी बनने के लिए ऐसे स्टेटस डालना ज़रूरी होता है। वे यह बात मानने को तैयार नहीं हैं कि ऐसे स्टेटस डालने से पहले सचमुच का सेलिब्रिटी बनना आवश्यक होता है।
सेलिब्रिटीपना सीखने के चक्कर में वे टीपने में पारंगत हो गए हैं। पिछले दिनों उन्होंने देखा कि एक फिल्मस्टार ने अपनी किचन में मटर छीली। मटर छीलने की उसकी रील पर मिलियन व्यू देखकर हमारे स्वयंभू सेलिब्रिटी ने नहा-धोकर चकाचक पैंट-शर्ट पहनी, बालों को सूतकर बहाया, चेहरे पर थोड़ी लीपा-पोती की और रील बनाने निकल पड़े। शूटिंग की लोकेशन भी सेम थी, बस ज़रा-सा अन्तर ये था कि फिल्मस्टार की रसोई थोड़ी आलीशान किस्म की थी, और हमारे लोकल सेलिब्रिटी की रसोई की दीवार पर चिकनाई के स्वाभाविक निशान थे। फिल्मस्टार की रील किसी ने चुपके से बनाई थी और हमारे सेलिब्रिटी ने बाकायदा कॉलर माईक लगाकर शूटिंग करवाई थी। हमारे सेलिब्रिटी इतने स्वार्थी नहीं हैं कि मटर छीलने की गोपनीय रेसिपी से अपने विराट फैन क्लब को वंचित रखें इसलिए उन्होंने मटर छीलने जैसे वीरोचित कर्म की पूरी रेसिपी भी अपने फैन्स को बताई।
सेलिब्रिटी को अपने फैंस का ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए हमारे लोकल ब्रांड सेलिब्रिटी हर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय विषय पर किसी विद्वान की वीडियो सुनते हैं और फिर उसे अपने मुखारविंद से दोबारा रिकार्ड करके अपने फैंस क्लब के सामने विद्वान बनने का अभिनय करते हैं।
जब कोई उनके स्टेटस पर आकर समर्थन या विरोध नहीं करता, तो वे विनम्रतापूर्वक स्वयं दूसरों के स्टेटस पर अबूझ टाइप के कमेंट्स करके ध्यानाकर्षण का प्रयास करते फिरते हैं।
कई महीनों के अथक प्रयासों के बाबजूद जब उनके फैंस क्लब की संख्या में वृद्धि नहीं हो पाई तो वे सपत्नीक सेलिब्रिटी बनने निकल पड़े। खाना खाने से लेकर आने-जाने तक वे अपनी हर गतिविधि की रील बनाते हैं और हर रील में अपनी पत्नी को गले लगाकर अपने फैंस को अपने खुशनुमा दाम्पत्य की झलक दिखाते रहते हैं।
पिछले दिनों उनके कुनबे में कोई बुजुर्ग दिवंगत हो गए। हमारे सेलिब्रिटी ने इस दुःख की घड़ी में भी अपने फैंस को नहीं भुलाया। अपने बाबाजी की मृत्यु का दुःख मनाने से पहले उन्होंने लाश का चेहरा खोलकर उसकी फोटो खिंची। फिर उसे तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। ताकि उनका कोई भी फैन अंतिम दर्शन से वंचित न रह जाए। इस पोस्ट के बाद वे दिन भर रील डालकर अपने विराट फैन क्लब को यह बताते रहे कि सेलिब्रिटी रो रहा है।
सबको गाइज, दोस्तों और भाइयों कहकर संबोधित करते हुए वे अथक साधना कर रहे हैं। इतने महीनों में वे अपने परिवार को यह समझाने में सफल हो गए हैं कि एक दिन वे सोशल मीडिया के ज़रिये पूरे संसार में फेमस हो जाएंगे। शायद इसी कारण कल जब वे टूथपेस्ट करते हुए रील बना रहे थे तब उनकी पत्नी कैमरा लेकर वॉशबेसिन के सामने दम साधे खड़ी थी, और बाकी पूरा परिवार मुँह पर टेप लगाए चुपचाप बैठा था, कि कहीं कोई शोर हुआ तो इतनी महत्वपूर्ण रील की ऑडियो क्वालिटी ख़राब न हो जाए।
✍️ चिराग़ जैन
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छोटी बहू के
घूंघट न काढ़ने की आदत
सासू को अखरती है
और बड़ी बहू
लम्बे से घूंघट में मोबाइल छिपाकर
आराम से
वीडियो काॅल करती है
✍️ चिराग़ जैन
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हम अक्सर राजनीति से नाराज़ रहते हैं कि राजनीति असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए फालतू के विवादों में क्यों उलझाती है; हमें स्वयं से भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि हम भी वास्तविक विषयों से भटककर फालतू विवादों में क्यों उलझते हैं।
राहुल गांधी गुरुद्वारे गए, मोदी जी मंदिर गए, फलाने जी ने दलित के घर खाना खाया, फलाने जी ने फलाने जी को जूता मारा, फलाने जी चीते ले आए, फलाने जी ने मोटरसाइकिल चलाई… क्या मतलब है हमारा इन सबसे? हमने भी तो इन्हीं सब पर पोस्ट लिख लिखकर सोशल मीडिया के ट्रेंड सेट किए हैं!
जितने लोगों ने भाजपा को साम्प्रदायिक सिद्ध करने के लिए ट्वीट किए हैं, उतने लोग यदि देश की सड़कों की बदहाली का सवाल उठाते तो राजनीति को हिन्दू-मुस्लिम छोड़कर सड़कों की मरम्मत के लिए विवश होना पड़ता। जितने लोगों ने राहुल गांधी को ‘पप्पू’ घोषित करने के लिए पोस्ट की हैं, उतने लोग यदि चिकित्सा व्यवस्था की हालत अपनी पोस्ट में बयां करते तो हर राजनैतिक दल के घोषणा पत्र में चिकित्सा तंत्र का उपचार प्रथम वरीयता पर होता। जितने ट्वीट केजरीवाल का मज़ाक बनाने पर पोस्ट हुए हैं, उसका कुछ अंश भी बदबूदार रेल्वे कम्पार्टमेंट, बास मारते प्लेटफॉर्म और ढीठ हो चुके कर्मचारियों पर होने लगते तो हम व्यवस्था को स्वस्थ रेल्वे उपलब्ध कराने के लिए विवश कर सकते थे।
लेकिन वास्तविकता यह है कि हमें स्वयं अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की कोई चिंता नहीं है। हमें भी राजनीति के खेल-तमाशे में बड़ा मज़ा आता है। इसीलिए राजनेताओं को भी अपना मज़ाक़ बनानेवालों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि वे जानते हैं कि जितनी देर हम राजनीति का मखौल बना रहे होते हैं, उतनी देर हम दरअस्ल अपनी ही परिस्थितियों की खिल्ली उड़ा रहे होते हैं।
✍️ चिराग़ जैन