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दिल्ली के चुनाव परिणाम

चुनाव आयोग इस बात पर एक्शन ले कि केजरीवाल ने यह बात छुपाए रखी कि मुहल्ला क्लीनिकों में बीजेपी का इलाज किया जा रहा है

झाड़ू को धुआँदार सफ़ाई की बधाई
कमल को कुछ नई पाँखुरियाँ खुलने की बधाई
और हाथ को हाथ न हिलाने की बधाई

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Delhi Election Result

दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाम एक खुला पत्र

श्री मान अरविंद केजरीवाल जी
मुख्यमंत्री
दिल्ली सरकार

सरजी!
हमें इस बात का भान है कि आप जब से सरकार में आए हैं, तब से पूरी क़ायनात आपके खि़लाफ़ हो गई है। पूरे देश की राजनीति, नौकरशाही और व्यवस्था सिर्फ इसी प्रयास में है कि आपको कुर्सी से कैसे हटाया जाए।
स्वयं प्रधानमंत्री आपके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। उधर राज्यपाल ने आपके सुख-चैन की सुपारी दे रखी है। यहाँ तक कि ईश्वर भी आप ही से चिढ़कर स्मॉग भेजने लगा है। और तो और आपकी ईमानदारी और लोकप्रियता से जलकर किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, योगेंद्र यादव, शाज़िया इल्मी, कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा और ख़ुद अन्ना हज़ारे तक अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के पूरा न होने पर आपको अकेला छोड़ गए हैं।
दिल्ली पुलिस, डीडीए जैसे महत्वपूर्ण विभाग साज़िशन आपके नियंत्रण से बाहर रखे गए हैं। महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में आपको निमंत्रित न करके अपमानित किया जाता है। आपकी सरकार के आयोजनों को सुरक्षा का अड़ंगा लगाकर अनुमति नहीं दी जाती। मीडिया के सारे बेईमान मिलकर आपके खि़लाफ़ हो गए हैं। और रही-सही कसर आपका स्वास्थ्य पूरी कर देता है। कभी मानसिक तो कभी शारीरिक स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी आपका खासा समय व्यतीत हो जाता है।
इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए हिम्मत तो नहीं हो रही किन्तु एक मतदाता होने के नाते मैं आपको सूचित करना अपना अधिकार समझता हूँ कि जिस केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री होने का आप लुत्फ़ उठा रहे हैं, वह दिल्ली इन दिनों बहुत समस्याओं से घिरी हुई है।
आपकी गाड़ियों का क़ाफ़िला जिन चौराहों से दनादन दौड़ता हुआ निकलता है, उन चौराहों पर किन्नरों की उपस्थिति आपकी सरकार की नपुंसकता का मज़ाक उड़ाते हुए आपके मतदाताओं को सरेआम लूटती है। पुलिसवाले यह नंगा नाच देखते हैं और ख़ामोशी से स्टॉप लाइन क्रॉस करनेवालों से पैसे वसूलते रहते हैं।
डीटीसी के ड्राइवर ढिठाई से यातायात नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी लम्बी-चौड़ी बस से आम आदमी को खदेड़कर यह संदेश देते हैं कि सरकार ने आम आदमी को कीड़ा-मकौड़ा समझ लिया है, जिसकी जान की किसी को कोई परवाह नहीं है।
पार्किंग वाले 20 रुपये घंटे को पचास रुपये करने पर आमादा हैं और अनधिकृत पार्किंग में धड़ल्ले से गाड़ियों की वसूली की जा रही है। कानूनी निष्क्रियता का इतना अंधेरा छा गया है कि सिग्नल पर लालबत्ती का रंग लोगों को दिखना बंद हो गया है।
रेहड़ी-पटरीवाले आपके संरक्षण में घटोत्कच्छ की भाँति पूरी सड़क घेरने लगे हैं और रोड टैक्स चुकानेवाले वाहन चालक रोड ढूंढ रहे हैं। टूटी हुई सड़कें और टूटती जा रही हैं।
आपको झुग्गी-झोंपड़ियों में अपने राजनैतिक भविष्य का सूर्य दिखाई देता है और मध्यमवर्गीय दिल्ली अपनी ख़ामोशी का परिणाम झेलती जा रही है। सरकारी विज्ञापन आपकी सरकार को रामराज्य घोषित करना चाहते हैं किंतु उन विज्ञापनों को पढ़नेवाला दिल्लीवासी उनमें सिस्टम की बेशर्मी और ढिठाई पढ़ता है।
अगले वर्ष चुनाव है सरजी! दिल्ली की क़ानून व्यवस्था और यातायात व्यवस्था चरमरा चुकी है। यदि इन खंडहरों पर ढंग से लीपापोती नहीं की गई तो पोलिंग बूथ जाने के लिए घर से निकला आपका वोटर ट्रैफिक जाम में फँसकर रह जाएगा।

-आपका दिल्लीवासी
✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली महापुराण

कलयुग में आपिये और भाजपाइयों के दो समूह थे। दिल्ली नगरी में संसदपुरी और विधानसभापुरी पर शासन करने हेतु दोनों परस्पर दूसरे को असुर और स्वयं को सुर सिद्ध करने में निमग्न रहते थे। मीडिया माइलेज के संघर्ष में वे जनहित तथा राष्ट्रहित के अस्त्र एक-दूसरे पर चलाते रहते थे। इन अस्त्रों के आघात से इनके सरकारी सिक्योरिटी गार्ड इन्हें बचा लेते थे और अपनी विशेष सिद्धि के बल पर इनकी दिशा आम आदमी की ओर मोड़ देते थे। एक दिन दोनों दल मीडिया नामक त्रिदेव के पास गए। मीडिया ने उन्हें राजनीति के सागर का मंथन करने का उपाय सुझाया। दिल्ली की राजनीति के सागर में मुद्दों का सुमेरु स्थापित किया गया जिसे मीडिया ने कश्यपावतार लेकर अपनी पीठ पर धारण किया। भाजपाइयों ने ज़ी न्यूज़, इण्डिया टीवी और दूरदर्शन जैसे चैनल्स की पूँछ पकड़ी। आपियों के हिस्से एबीपी, एनडीटीवी और आईबीएन 7 जैसे फन आए इस कारन मंथन के दौरान बेचारे आपियों को ज़हरीले डंक का भी सामना करना पड़ता था।
मंथन प्रारम्भ हुआ तो सबसे पहले उसमें से एक एलजी निकले। मीडिया ने वे एलजी टाइम पास के लिए दिल्ली में नियुक्त करवा दिए। उसके बाद दिल्ली पुलिस का अवतरण हुआ। उसे भाजपाइयों को दे दिया गया। फिर डीडीए निकली। उसे भी भाजपाई ले उड़े। आपियों के सरदार ने मीडिया प्रभु से शिकायत की कि मंथन से निकलने वाले सभी रत्न भाजपाई हड़प रहे हैं। यह अन्याय है।
मीडिया प्रभु ने उन्हें आश्वस्त किया कि अब जो भी कुछ निकलेगा उसे आपियों को सौंपा जाएगा। पुनः मंथन आरम्भ हुआ। अबकी बार सागर में से एक सीडी निकली। मीडिया प्रभु ने अपने हाथों से वह सीडी आपिये दल के एक मंत्री के नाम लिख दी।
मंथन आगे बढ़ा। सागर में से अचानक हालाहल निकलने लगा। पूरी दिल्ली ज़हरीले धुंए से घिर गई। प्राणिमात्र का श्वास लेना दूभर हो गया। न्यायालय, NGT और प्रशासन; तीनों से इस धुएँ को ग्रहण करने की अनुनय की गई किन्तु तीनों ने “I DONT SMOKE” बोलकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
सभी आपिये और भाजपाई अपनी-अपनी वातानुकूलित गाड़ियों में जा घुसे। शेषनाग का दम घुँटने लगा। उधर सागर विष उगल रहा था, इधर आपिये और भाजपाई परस्पर विषवमन कर रहे थे।
धुएँ से मीडिया की आँखें लाल होने लगी। खाँसी कर-कर के पूरी जनता स्वयं को मुख्यमंत्री समझने लगी थी। चुनाव् आयोग के महादेव ने धूम्रपान करने की बजाय पंजाब चुनाव का बिगुल बजाने का निर्णय लिया। इससे मीडिया प्रभु का ध्यान दिल्ली के धूम्रपान से पंजाब के विषपान की ओर मोड़ दिया। और दिल्ली की जनता को धुएँ के साथ अपनेहाल पर छोड़ दिया।

✍️ चिराग़ जैन

संदीप कुमार की सीडी

हाईकमान : संदीप कुमार जी, आपने जिस तरह की सेल्फ़ी ली हैं, उनसे आपको डर नहीं लगा?
संदीप कुमार : प्यार करने वाले कभी डरते नहीं, जो डरते हैं वो प्यार करते नहीं।
हाईकमान : तुम्हें कुछ करना था तो चुपचाप कर लेते, इसका ढिंढोरा पीटने की क्या ज़रूरत थी?
संदीप कुमार : प्यार किया कोई चोरी नहीं की, छुप-छुप आहें भरना क्या।
✍️ चिराग़ जैन

संदीप कुमार की सीडी पर इतना हंगामा करना बेमानी है।
उसने तो केवल विशाल डडलानी को यह बताया है कि नग्न होने और नंगा होने में क्या अंतर है।
✍️ चिराग़ जैन

इस बीच संदीप कुमार ने अरविन्द केजरीवाल को फोन करके बोला – “अब तो यक़ीन आगया कि मैंने वो फोटुएं राशन कार्ड पर चिपकाने के लिए खींची थी!”
✍️ चिराग़ जैन

संदीप कुमार को ज़्यादा दुःख इस बात का है कि शूटिंग की लोकेशन इतनी थर्ड क्लास थी कि पूरी इज़्ज़त का कचरा हो गया। पीछे दीवार में आले बने हुए हैं, और उन पर अख़बार बिछा रखे हैं। ढंग का वॉलपेपर नहीं खरीद सकते थे! लीचड़ कहीं के।
क्या सोचेगी जनता हमारे बारे में। इतना बड़ा मंत्री और ऐसे कोठरी जैसे कमरे में.. छि:-छि:! धिक्कार है। अरे हमें बता दिए होते। कोई होटल-शोटल बुक करा लेते। मंत्री आदमी हैं भई, किसकी मजाल जो हमें रोक दे।
और ऊ कौन ससुरा कैमरामैन! उसकी तो…! ऐसे कोई शूटिंग की जाती है। इसे शूटिंग कहते हैं? एक भी फ्रेम ढंग का नहीं है। किसी में ऑब्जेक्ट गायब है तो किसी में फोकस। कैमरा लगातार हिल रहा है। तरीके से काम किया होता तो बाक़ायदा ट्राइपॉड पर सेट करवा के मल्टीकैमरा शूट कराया होता अपने मल्टीटास्क का। एकाध ट्रॉली शॉट और लग जाते तो बस हो जाता। लेकिन नहीं, छुप के करेंगे। और कर लो छुप के।
वो तो हमारी शक्ल देखकर कुछ न्यूज़ चैनलवालों ने खरीद भी ली, वरना किसी और को हीरो लिए होते तो एक फूटी कौड़ी न मिलनी थी इस घटिया प्रोडक्शन को।
बड़े आए हैं कैमरामैन बनने। जाइए पहले कैमरा पकड़ना सीखिये। तब तक हम “महिला एवं बाल विकास” की फाइलें निपटाते हैं। बहुत काम पेंडिंग हो गया है। यूं समझ लो एक फ़ाइल के टाइम में दो-दो निपटानी पड़ रही हैं। …इतने पर भी लोग गाल बजाते हैं कि केजरीवाल के मंत्री काम नहीं करते।

✍️ चिराग़ जैन

मुफ्तख़ोरी

हर बार इन्हें मुफ्त के सपने न दिखा तू
इक बाद बदल डाल ये किस्मत का लिखा तू
ये मुफ्तख़ोरी देश को बर्बाद न कर दे
ऐ राजनीति इनको कमाना भी सिखा तू

✍️ चिराग़ जैन

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