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नए घर में

नए फ्लैट की दीवारों पर धीरे-धीरे उभर रहा है हमारा घर माॅड्यूलर किचन के खोपचों से आँख बचाकर एक कोने में पालथी मारकर बैठ गया है सरसों के तेल का पीपा सभी नए कंटेनरों के बीच चुपके से जा छुपी है युगों पुरानी हींग की डिब्बी! बरसों से इकट्ठे हुए शो-पीस चहक कर जा बैठे हैं...

बचपन नहीं जाता

अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता चुभन ही क्यों बहुत...

लव इन दिल्ली-यूनिवर्सिटी

मौरिस नगर के नुक्कड़ों को आज भी याद हैं हज़ारों निशब्द प्रेम कहानियाँ जिनका पूरा सफ़र तय होकर रह गया आँखों-आँखों में ही। लेकिन अब ये प्रेम कहानियाँ ऐसी ख़ामोशी से नहीं बनतीं। अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ लिखकर अपने अधिकार जान गया है प्रेम। अब लोक-लाज और पिछड़े हुए समाज से...

दिल्ली

वे भी दिन थे जब पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ अकारण ही मुस्कुरा देती थीं नज़र मिलने पर अजनबियों से भी। दरियागंज की हवेलियाँ अक्सर देखा करती थीं एक कटोरी को देहरी लांघकर इतराते हुए दूसरी देहरी तक जाते कुछ दशक पहले तक। शाहदरा के बेतरबीब मकान चिलचिलाती धूप में अक्सर दरवाज़ा...

बचपन

हँसी-ख़ुशी के वो लमहे हज़ार बचपन के कभी तो लौटते दिन एक बार बचपन के नहीं, दिमाग़ न थे होशियार बचपन के तभी तो दिन थे बहुत ख़ुशगवार बचपन के बड़े हुए तो बहुत लोग मिल गए लेकिन बिछड़ चुके हैं सभी दोस्त-यार बचपन के जो जिस्म को नहीं दिल को सुक़ून देते थे बहुत अजीब थे वो रोज़गार बचपन...
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