Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कब तक झुलसोगे इन झूठी सुविधाओं के अंगारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में
जेठ तपा तो गर्म दुपहरी जब तन झुलसाने लगती है
तब गुमटी वाली इक अम्मा प्याऊ बैठाने लगती है
मिट्टी के मटके का पानी, तांबे के लोटे में भरती
ओक बनाकर, होंठ भिंगोकर, अंतर्मन तक शीतल करती
अंतर्मन नत हो जाता है उस बुढ़िया के आभारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में
पेड़ तले इक खाट बिछी है, थकन मिटानी हो तो आओ
डाल पके आमों की रुत है, जितना मन हो उतना खाओ
उन बागों में मोबाइल का टॉवर गायब हो जाता है
माथे पर जो शोर मचा है, पल भर में ही खो जाता है
इस सुख का कोई विज्ञापन कब छपता है अखबारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
गर्मी अपनी पर आई हुई है। तमाम भागदौड़ के बावजूद सड़कों पर एक वीराना पसरा हुआ है। ज्यों-ज्यों सूर्य धरती के निकट आता है त्यों-त्यों धरती का तापमान बढ़ता जाता है। जन्मों का प्यासा सूरज, चलते-फिरते लोगों की दैहिक जलराशि से प्यास बुझाने का उपक्रम कर रहा है। मनुष्य पसीना बहा-बहाकर आसमान को बारिश का स्मरण करा रहे हैं।
जेठ के कुकृत्य से बदहवास सड़कों को अमलतास की ओढ़नी से ढाँपकर मौसम अपना पाप छुपाने के प्रयास कर रहा है। उधर गुलमोहर भी अपने लाड़ले मौसम के ऐब छुपाने के लिए लीपापोती करने में पूरा ज़ोर लगाए हुए है। बालमखीरा के दरख़्तों पर झूमर जैसे फूल लटकाकर ध्यान भटकाया जा रहा है। लेकिन नीम, कच्ची निम्बोलियों जैसा कड़वा सच बोलकर अपने फूल की तरह बरस पड़ता है। आम के बौर में केरियाँ फूटने लगी हैं। मौसम के आवारा थपेड़े और तूफानों के बेग़ैरत झोंके इन मासूम आम्बियों को तब तक छू-छूकर गुज़रते रहते हैं जब तक वे हार कर टूट न जाएँ। इस सारी बेईमानी को देखकर हवाएँ आग-बबूला हो चली हैं। बहते पसीने को शांत करने के लिए जो झोंका गात को स्पर्श करता है वह पसीने के नीचे त्वचा की एक परत झुलसा जाता है। ऊमस ने ऊर्जा का कोष रिक्त कर दिया है।
सड़क किनारे शिकंजी, कुल्फी, पानी, कोल्डड्रिंक, छाछ और चुस्की बेचनेवाले पेट के लिए अपने तन को तपाकर कंचन कर रहे हैं। वातानुकूलित वाहनों और पक्के मकानों के भीतर का तापमान स्वर्ग की अनुभूति करा रहा है इसलिए बाहर का नर्क और गहराता जा रहा है। ग़रीबों के बच्चे पेट की आग बुझाने के लिए सड़कों पर रोज़गार तलाश रहे हैं और अमीरों के बच्चे मोबाइल के जीपीएस पर वॉटर पार्क तलाश रहे हैं।
शाम ढलते-ढलते मौसम अपनी ज़िद्द छोड़कर कुछ देर को सुहाना होने लगता है, लेकिन जल्द ही वह मूड बदलकर वापस अड़ियल हो जाता है। प्रकृति हीटर चलाकर भूल गई है और हमने अपनी कृत्रिम सुविधाओं के ब्लोवर से इस प्रकोप को कई गुना बढ़ा दिया है। महानगरों के निस्तेज चेहरे और भी क्लान्त हो गए हैं। गाँव की चौपाल से आए झोंके महानगरों के ऊपर से अट्टहास करके गीत गाते हुए बहे जाते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
महीना जून का है तिश्नगी हद से गुज़रती है
ज़मीं दो बून्द पानी के लिए भी आह भरती है
ख़ुदाया तल्ख़ हैं तेवर हवाओं के मग़र फिर भी
कोई खिलने पे आ जाए तो हर डाली सँवरती है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
रेत का साम्राज्य है बस
हो चुके हैं घाट बेबस
पर्वतों पर जल नहीं है
दूर तक बादल नहीं है
चल रहे हैं रेत पर, तपती दुपहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
पत्थरों के आख़िरी कण तक नहीं है बून्द जल की
याद रख पाए नमी को इस जतन में आँख छलकी
आँख के नीचे बची है शेष, झरनों की निशानी
पाँव के छाले सुनाते हैं जलाशय की कहानी
खेत से उठती हर इक आवाज़ बहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
स्रोत सूने हो गए हैं, बस्तियों में हैं शिकारी
थक चुका सागर तरस कर, प्यास जीती, आस हारी
जोड़ रखती थीं धरा को, वे जड़ें बिखराव में हैं
इक सदी का दर्द जीवित इन जड़ों के घाव में है
मर गया कलरव नदी की पीर लहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
श्रम जलाशय खोजता है रेत से सूखे क्षणों में
पीढ़ियाँ घिरने लगी हैं आग के आकर्षणों में
फूँक दे जो ज़िन्दगी को, अब न ऐसा स्वप्न पालो
हो सके तो नौनिहालों को झुलसने से बचा लो
हर नमी को सोखता सूरज सुनहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
ओ रे बदरा बरस
बन के सावन सरस
राह धरती ने कबसे तकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की
हल ने काटी चिकौटी बहुत
पर धरा में नमी ही न थी
ख़ूब टपका पसीना मगर
प्यास में कुछ कमी ही न थी
प्रश्न बढ़ते रहे
हल सिसकते रहे
एड़ियाँ फट गईं खेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
हिमशिखर का धवल कारवां
कौन जाने कहाँ लुट गया
पर्वतों पर लकीरें बनीं
और झरनों का दम घुँट गया
स्रोत सूखे सभी
घाट रूखे अभी
हर नदी हो गई रेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
गीत बरखा नहाने चला
तो पसीना-पसीना हुआ
प्रीत जिस डाल पर झूलती
उसका हर पात झीना हुआ
गुलमुहर झर चुका
नीम का सर झुका
हाय मुरझा गई केतकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की
जब तू आया तेरी राह में
घास का इक गलीचा सजा
मेंढ़कों ने धमक छेड़ दी
पत्तियों पर तराना बजा
फूल के संग झरी
नीम ने रसभरी
इक निम्बोली तुझे भेंट की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
✍️ चिराग़ जैन