Protected: कुंभकर्ण
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देश की बौद्धिक सम्पदा, दो हिस्सों में बंट रही है। एक ओर वे लोग हैं जिन्होंने बहुत वर्षों से News Channels देखना बंद कर दिया है। ये लोग Social Media के माध्यम से देश का तापमान महसूस करने की कोशिश करते हैं। इनके लिए Trending Keywords ही Current Affairs बन जाते हैं।
सोशल मीडिया के जिस Influencers के पास अधिक Subscribers हैं, उनकी सोच ही इस तबके की सोच बन जाती है। सूचनाएं बटोरने आए जिज्ञासु ही इनके viewers हैं और इन्हीं व्यूअर्स की संख्या, इन्फ्लुएंसर्स की ताकत है।
इसी चक्र को साधते हुए खेल की तरह शुरु हुआ सोशल मीडिया आज बड़े से बड़े जनसमूह की सोच का Remote बन गया। दुनिया के अनेक देशों में सोशल मीडिया ने जनक्रांतियां खड़ी की हैं।
दुनिया भर के राजनैतिक दलों, सरकारों, विचारधाराओं, समाजसेवियों और यहां तक कि जन-आन्दोलनों ने भी सोशल मीडिया की ताक़त को समझते हुए ज़मीन पर काम करने से अधिक सोशल मीडिया की post को important समझने की प्रवृत्ति पाल ली।
दूसरी ओर है main stream media अर्थात् चौबीस घण्टे के news channels. पिछले डेढ़-दो दशकों में अचानक इनका दर्शक और पाठकवर्ग तेज़ी से कम हुआ। इसके पीछे एक बड़ा कारण तो यह है कि जो समय TV Screen पर व्यतीत होता था, वह अब mobile screen पर ख़र्च होने लगा। लोगों का Screen time बढ़ गया लेकिन टेलीविज़न की स्क्रीन के लिए लोगों के पास टाइम नहीं बचा। उधर OTT ने भी सीधे न्यूज़ चैनल्स देखने की आदत छुड़वा दी।
चौबीस घण्टे के चैनल्स को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि जिन Set top Box के लिए वे जनता को प्रेरित कर रहे थे, उन्हीं सेट टॉप बॉक्स के कारण जनता उनसे दूर हो जाएगी।
बहरहाल, तकनीक की कवायदों के साथ-साथ यह भी हुआ कि youtube और Facebook जैसे माध्यमों ने प्रापकों को ही संप्रेषक बना डाला। अब ख़ुद दर्शकों के अपने यूट्यूब चैनल्स बन गए। Reels बनाने की होड़ ने हर व्यक्ति के मन में संचार माध्यमों से कमाने की ललक जगा दी।
और रही-सही कसर पूरी कर दी, न्यूज़ चैनल्स में राजनैतिक हस्तक्षेप ने। जब जनता स्वयं विज्ञापनों के माध्यम से होनेवाली कमाई का गणित समझने लगी तो उसे यह भी समझ आ गया कि चैनल्स पर प्रसारित होनेवाली ख़बरों को कैसे दिखाने पर उनके अर्थ कैसे बदल सकते हैं। कैसे जनता को एंगेज करके विज्ञापन कमाए जाते हैं। कैसे endorsement को ख़बर कहकर दिखाया जा सकता है।
जनता का इस पूरे विपणन प्रबंधन को समझना, मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।
लेकिन एक तबका अभी भी मेन स्ट्रीम मीडिया से चिपका हुआ है। वह अभी भी देश के दो दर्जन News Anchors को ही देश का असली युगदृष्टा समझकर उनका Bulletin नियम से देखते हैं। इस तबके की सोच का रिमोट उन लोगों के पास है, जिनका आर्थिक, प्राशासनिक अथवा राजनैतिक दबाव उन दो दर्जन न्यूज़ एंकर्स के मालिकों पर है। जन की भावना का सम्मान करने के स्थान पर ये लोग जन की भावना को अपने नियामकों के स्वार्थानुरूप मोड़ने में सफल होते हैं।
गड्ढे में भरे पानी को भीषण बाढ़ कैसे दिखाना है, यह कैमरा जानता है। किस एंगल पर कैमरा रखने से रैली हाउसफुल दिखाई देगी और किस एंगल पर कैमरा रखने से रैली असफल दिखेगी। इसकी ट्रेनिंग कैमरामैन को हो जाती है।
लेकिन हर मोबाइल में कैमरा आ जाने से इन प्रशिक्षित कैमरा पर्सन्स का काम थोड़ा कठिन हो गया है। यह सत्य है कि सोशल मीडिया पर दिखाए गए सौ सच, मेनस्ट्रीम मीडिया के एक झूठ के आगे बौने रह जाते हैं। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया पर देखे गए एक Raw वीडियो के माध्यम से मेनस्ट्रीम मीडिया के हज़ार HD Videos की विश्वसनीयता में डेंट तो लग ही जाता है।
यह दौर पत्रकारिता के लिए पुनर्विचार का एक अवसर है। व्यावसायिक तथा पारिवारिक विवशताओं का सम्मान करते हुए मैं यह स्वीकार करने को तैयार हूं कि अपने कॉर्पोरेट हाउसेस के निर्देश का पालन करते हुए उन्हें कई बार ‘शाम’ को ‘रात’ कहना पड़ सकता है। लेकिन जब ईयरपीस में ‘भरी दोपहर’ को ‘रात’ कहने का निर्देश आए तो एक पल के लिए कान से ईयरपीस हटाकर अपने ज़मीर की आवाज़ सुन लेना अंततः स्वयं उनके भी हित में होगा।
✍️ चिराग़ जैन
पिछले दो-तीन दिनों से पुलिस और जनता के मध्य के संबंधों की जैसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं, उनसे हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था के चेहरे पर ग्रहण लग रहा है।
किसी सभ्य तथा विकासोन्मुखी व्यवस्था में पुलिस और जनता के मध्य परस्पर विश्वास का सम्बंध होता है। दोनों एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो समाज के दो पैरों की भूमिका निबाहते प्रतीत होते हैं।
एक पैर जब दूसरे पैर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा होता है तब वह दरअस्ल दूसरे पैर के आगे आने का रास्ता बना रहा होता है। इसी समन्वय पर समाज ‘चलता’ है।
किन्तु ये दोनों पैर यदि आपस में उलझना प्रारंभ कर दें तो समाज को लड़खड़ाने से कोई नहीं बचा सकता।
ये दोनों ही पैर एक दूसरे के इतने समीप रहते हैं कि चलने की प्रक्रिया में इनमें परस्पर घर्षण की घटनाएँ स्वाभाविक हैं।
ट्रैफिक पुलिस के जवानों के साथ होनेवाली झड़पें, पैट्रोलिंग करते जवानों के साथ होनेवाली कहासुनी, किसी पुलिसकर्मी के भ्रष्टाचार की वीडियो और ऐसी ही अन्य जो दुर्घटनाएं सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं, वे इसी घर्षण का प्रमाण हैं।
विपरीत परिस्थितियों में अधिकारियों की डाँट, पारिवारिक चुनौतियों, नकारात्मक परिवेश और प्रोटोकॉल के दायित्व निबाहते हुए पब्लिक के बीच ड्यूटी करते पुलिसवालों की मनोदशा में चिड़चिड़ापन शुमार होना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर अपनी किसी तात्कालिक समस्या से त्रस्त नागरिक का बिलखते हुए, भन्नाए हुए, अकड़ते हुए या चिल्लाते हुए थाने आना भी स्वाभाविक है।
यहाँ तक नागरिकों और पुलिस के मध्य के संबंधों में कुछ नया नहीं है। लेकिन 19 जुलाई 2026 के बाद से दिल्ली में छात्र-आंदोलनस्थल से दोनों ओर की जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं वे स्वाभाविक नहीं हैं।
सोशल मीडिया, पुलिस को क्रूर सिद्ध करने पर उतारू है और मेन स्ट्रीम मीडिया, आंदोलनकारियों को गुंडा बताने पर तुला है।
हिंसा कहीं से भी शुरू हो, वह समाज के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकती। पुलिसकर्मियों की लाठी से पिटकर बिलखते-चिल्लाते युवा भी समाज के भविष्य के लिए प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं और आंदोलनकारियों की भीड़ में फंसकर हांफता हुआ पुलिसकर्मी भी सामाजिक सौहार्द की सबसे कमज़ोर गाँठ को स्पर्श कर चुका है।
आंदोलन को लेकर सरकार की अपनी कुछ रणनीति हो सकती है। आंदोलन को लेकर विपक्ष की भी अपनी सोच हो सकती है। विधायिका और राजनीति को सड़कों पर उतरे इस जनसमूह को राजद्रोही घोषित करना है या जागरूक नागरिक -यह सियासत का विषय है लेकिन इस सियासी शतरंज में यदि समाज हार गया तो दो बादशाहों को जिताने के लिए बाइस मोहरे कुर्बान हो जाएंगे।
आंदोलन लोकतंत्र का फ्यूल पंप है। यहाँ से पाथेय लेकर लोकतंत्र जनहित की राह पर तेज़ी से दौड़ता है। आंदोलन के फ्यूल की माइलेज हर बार गाड़ी की क्वालिटी के अनुरूप बदल सकती है।
लेकिन ईंधन भरवाते समय पेट्रोल टैंक का फटना ख़तरनाक है। इसलिए पुलिस और जनता दोनों को ही स्मरण रखना होगा कि अराजकता की राह पर बढ़ा एक भी कदम समाज को गहरे अंधकार में धकेल देगा।
आंदोलनकारियों को षड्यंत्रकारी, राष्ट्रद्रोही, धर्मविरोधी, ग़द्दार और आतंकवादी कहना सरकारों की प्रवृत्ति रही है। आपातकाल के दौरान सत्ता के आलोचकों पर ‘राजद्रोह’ के चार्ज लगे। विपक्ष तो विपक्ष, विपक्ष की विचारधारा तक को समर्थन देनेवाले जेलों में भर दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने अधिकारों की मांग करनेवाले ‘दंगाई’, ‘उपद्रवी’ और ‘अपराधी’ घोषित किए गए। अन्ना आंदोलन और बाबा रामदेव के धरने के प्रति सत्ता का नज़रिया अभी स्मृतियों से ग़ायब नहीं हुआ है। किसान आंदोलन, खिलाड़ियों के धरने और मजदूरों के आंदोलन के प्रति सरकारी नीतियों के ज़ख़्म तो अभी तक हरे हैं।
इसलिए किसी भी जन आंदोलन का समर्थन करो या विरोध… यह ध्यान रहे कि आपका निर्णय किसी लामबंद मीडिया, किसी राजनैतिक दल अथवा किसी विचारधारा के influence से प्रभावित न हो।
और आंदोलनस्थल पर खड़े हर आंदोलनकारी को और हर सुरक्षाकर्मी को यह याद रखना चाहिए कि सरकार पराई हो सकती है; षड्यंत्र विदेशी हो सकते हैं; लेकिन देश आपका अपना है।
✍️ चिराग़ जैन
20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र की मनोदशा का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है। जून 2026 में आरंभ हुए कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को जनता का कितना समर्थन मिला, कितना नहीं मिला -यह सही-सही कह पाना तो मेरे लिए संभव नहीं है। किन्तु सोनम वांगचुक को धरनास्थल से उठाए जाने की घटना ने जनता को कितना उद्वेलित किया, यह पूरी दुनिया ने साफ-साफ देखा।
जिस युवापीढ़ी में लोकप्रिय होने की होड़, पूरी दुनिया की राजनीति का प्रमुख लक्ष्य बन चुका है, उसी युवापीढ़ी की आवाज़ को अनसुना करने की भूल राजनीति को नहीं करनी चाहिए थी। स्कूल-कॉलेजों में पढ़नेवाली जिन ऊर्जारश्मियों के बूते देश की आंखों में भविष्य के स्वप्न झिलमिलाते हैं, उन्हीं पर आंसूगैस के गोले छोड़ते समय प्रशासन की कोरें भीग जानी चाहिए थीं।
जिन सुकोमल पीढ़ियों को पोषित करके देश को अपने बुढ़ापे की लाठी तैयार करनी थी, उन्हीं पर लाठीचार्ज करते हुए प्रशासन की टांगें कांप जानी चाहिए थीं।
सोशल मीडिया के वीडियो गवाह हैं कि जब नीली वर्दीधारी पांच-छह सशस्त्र जवान अभद्रभाषा बोलते हुए एक अकेले नौजवान पर बलप्रयोग कर रहे थे, तब उस नौजवान ने प्रतिहिंसा नहीं की। उल्टे उसने गांधी की राह पकड़ी और सचमुच दूसरा गाल आगे करके उन लाठी बरसानेवालों को शर्मिंदा कर दिया। यह दृश्य गवाह है कि गांधी इस देश की शिराओं में आज भी ज़िन्दा हैं।
20 जुलाई 2026 के तमाम दृश्यों को आप ध्यान से देखेंगे तो आपको पुलिस की आंखों में आंखें डालकर चुनौती देते हुए ‘भगतसिंह’ दिखाई देंगे। 20 जुलाई 2026 के वीडियो दोबारा खंगालेंगे तो आपको वह भारत फिर से दिखाई देगा, जो किसी भी तरह के अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना अपना नैतिक कर्तव्य समझता है।
20 जुलाई 2026 को क्नॉट प्लेस की सड़कों ने लाला लाजपतराय को भी याद किया और बटुकेश्वर दत्त को भी। चीत्कार के स्वर में पुलिसवालों को लताड़ती लक्ष्मीबाई भी दिखीं। ‘हम क्या आपके बच्चे नहीं हैं’ -बिलखकर ऐसे मासूम प्रश्नों से पुलिस की वर्दी में खड़ी महिलाओं को नज़रें छुपाने पर विवश करती बेटियां भी दिखीं।
दुनिया ने चाहे जो कुछ देखा हो, लेकिन बर्बर प्रशासनिक आदेशों का पालन करने पर विवश पुलिसकर्मियों के चेहरे पर अनेक बार मुझे मनुष्यता के पदचिन्ह दिखे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन देश के लिए इन अर्थों में भी विशेष था कि इसमें आनेवाले किसी भी ‘स्टार’को कल अपने-आपको अपनी ख़ुद की नज़रों में स्टार बनाए रखने के लिए उन हज़ारों-लाखों ‘ट्विंकल लिटिल स्टारों’ की ज़रूरत थी, जो जंतर-मंतर पर पुलिस की लाठियां और झिड़कियां खा रहे थे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन मेरे लिए इसलिए पूर्ण सफल है कि युवा पीढ़ी का नाम आते ही अराजकता की आशंका जतानेवाले प्रशासन के पास कल इस पीढ़ी को अराजक सिद्ध करने का कोई उपाय न मिल सका। न कोई नेता, न कोई संगठन, न कोई स्पांसर, न कोई व्यवस्था… केवल एक जुनून। केवल एक जज़्बा। केवल एक अपनत्व। केवल एक देश।
जब-जब सत्ता ने विरोध के स्वर को दुश्मन मानने की भूल की है, तब-तब जनता को सड़क की राह पकड़नी पड़ी है। मैं इस देश का एक नागरिक होने के नाते अपनी विधायिका से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि यह जनता आपको प्यार करती है, इसीलिए अपने भविष्य का नियामन आपके हाथों में सौंपकर निश्चिंत होना चाहती है। सब जानते हैं कि ये देश बहुत बड़ा है। सब जानते हैं कि डेढ़ सौ करोड़ लोगों के भविष्य की नीतियां बनाने में आपसे कुछ चूक हो सकती है।
इस चूक की ओर ध्यान आकृष्ट करने के जनप्रयासों को कान देकर सुनने की ज़रूरत है। विरोध के स्वर कर्कश ज़रूर होते हैं लेकिन उनके अंत से सौहार्द और समर्थन का महानाद खोज लेनेवाला ही महानायक होता है।
✍️ चिराग़ जैन