Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
पहले तुमको निहत्था बताया
फिर हाथ से कमान ले उड़े
कहने भर को पीएम थे पर बोल न पाए मनमोहन
हाथ हिलाना दूर, होंठ तक खोल न पाए मनमोहन
अपने ही घर में प्रतिभा का मोल न पाए मनमोहन
अपना ऑर्डिनेंस फटने पर डोल न पाए मनमोहन
उनके होंठों पे ताला लगाया
ये पूरा हिन्दुस्तान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
आंदोलन पर लाठी बरसी, कंघी बेची गंजे को
सीबीआई तोता बन गई ऐसा कसा शिकंजे को
अपनी ही बंदूक की गोली धांय लगी है पंजे को
जाने किस-किस बेचारे की हाय लगी है पंजे को
तुमने सोतों पे डंडा चलाया
ये सपनों की दुकान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
ऊंचाई का अहम न करते तो झुक जाना ना पड़ता
ठोकर पर संभले होते, घुटनों पर आना ना पड़ता
अपनों से मिलते-जुलते तो मान गंवाना ना पड़ता
दूर-दूर तक जनता के दर चलकर जाना ना पड़ता
अपने हाथों ही अवसर गंवाया
ये सत्ता का गुमान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
कोई ईसी के झाड़ा लगाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
ओ ज़रा शेषन सा ओझा बुलाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
इसको नोटिस, उसको नोटिस, असर नहीं है कोई
जाति-धर्म के जुमले उछले, भारत माता रोई
संविधान के कहे मुताबिक द्वंद नहीं हो पाया
आज तलक भी नमो प्रसारण बन्द नहीं हो पाया
इसके हाथों में संटी थमाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
सारे ही दल करते फिरते हैं अपनी मनमानी
वोटर को धमकी देने की सबने मन में ठानी
कहीं कोई प्रत्याशी ही अनुशासन तोड़ रहा है
सब सहकर भी चुप है ये ईसी है या अडवाणी
इसके कमरे की घण्टी बजाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
हर प्रत्याशी की हसरत को अच्छी तरह टटोले
कोई भले किसी दल का हो सबका चिट्ठा खोले
ईसी जी के अनुशासन का डंडा हर दल पर हो
ईवीएम से अपना पत्ता कट जाने का डर हो
ज़रा सख्ती से वोटिंग कराओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Mann To Gomukh Hai, Poetry
चन्द्रमा ठहरो ज़रा
सूरज अभी डूबा कहाँ है
तुम दमक का दंभ भरना बाद में।
जब तुम्हारे चाटुकारों का
जुगनवी दल
फुदकने के लिए अंधियार पा ले
और लाखों बून्द जैसी तारिकाएँ
जब घड़ी भर टिमटिमा लें
तब दिखना नूर अपनी चांदनी का
रात में सोए हुओं को
और रोते श्वान, गीदड़,
उल्लुओं को।
रात के आकाश में बिखरे पड़े
बूंदी के दानों में
किसी लड्डू से तनकर बैठ जाना।
रात भर हँसना
सड़क पर लड़खड़ाते मद्यपों पे
और जी भर भागना
खाली सड़क पर
तेज सरपट दौड़ती
कुछ गाड़ियों के साथ।
तब तलक रुक कर निहारो
दूर पश्चिम में
दिवाकर की दमकती
आख़िरी किरणों से बिखरे रंग।
देख लो,
दिन भर मनाकर रौशनी का जश्न
कैसा जा रहा निस्संग।
वो अभी दिन भर के टूटे
कामगारों की
थकन लेकर गया है।
चंद्रमा ठहरो ज़रा
सूरज अभी डूबा कहाँ है।
✍️ चिराग़ जैन