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कला का मुँह काला कर दिया जाए

“कला का मुँह काला कर दिया जाए” -ये हुक्म अपने आप को दिया है कलयुग के कुकर्मियों ने। कोलाहल पर किलोल की विजय न हो जाए। अपनी महत्वाकांक्षाओं को मनोरंजन के सत्य भाषण से बचाने के लिए सियासत रोज़ नए पैंतरे खेल रही है। कोई मुज़फ्फरनगर के दंगों पर बोलने लगे तो...

मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून

ख़ुद को ख़ुदा के बन्दे और जेहादी कहने वाले खूंखारों ने ख़ुदा की इबादत और ख़ुदा से मुहब्बत का पैग़ाम देने वाली एक बेहतरीन आवाज़ को ख़ामोश कर दिया। रूह से उठने वाला वो अलाप जो सुनने वालों को सीधे रूहानियत के गलियारों तक लिए जाता था, वो अलाप स्वयंभू जेहादियों पर एक धिक्कार के...

क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी

क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी संबंधों के तार तोड़ के क्या तुम ख़ुद तक लौट सकोगी अपनेपन की बाग़ छोड़ के मेरे संदेशों की दस्तक तुम सुनकर भी ध्यान नहीं दो मेरे स्वर के आकर्षण को अपने मन में मान नहीं दो नदिया, नदिया ही रहती है चाहे निकले धार मोड़ के क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी...

अपशब्दों का सत्र

तुमने कड़वे शब्द कहे हैं, कैसे इस सच को झुठलाऊँ समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ वाणी कड़वी, मन खट्टा है और कसैला रूप-लवण है किस आसन पर रख पाओगी, प्यार भरा जो मीठा क्षण है कण-कण में विष व्याप्त हुआ है, किस कण पर अमृत टपकाऊँ समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या...

पिता

अब कवि सम्मेलन में आना-जाना मेरे लिए सामान्य हो चुका है। एक काम जैसा अनुभव रह गया है कवि सम्मेलनीय यात्राओं का। लेकिन आज भी मेरे घर लौटने पर मेरी अटैची से जब कोई प्रतीक चिन्ह मिलता है तो वे लपक कर उसे उठा लेते हैं और उसका एक एक अक्षर आद्योपान्त पढ़ जाते हैं। जब किसी...
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