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ख़ुदशनास

यूँ न समझो उदास बैठा हूँ आज मैं ख़ुदशनास बैठा हूँ मुझसे कोई अभी न बात करो मैं अभी अपने पास बैठा हूँ ✍️ चिराग़...

असंतोष

जिस कुर्सी की एक कील मुझे बहुत चुभती थी; उसी कुर्सी पर किसी और का बैठना मुझे कील से ज़्यादा चुभता है। ✍️ चिराग़...

मन बोलता है

जब सब पंछी मौन हो गए कलरव के स्वर गौण हो गए जीवन की रफ़्तार सो गई दिन पर रात सवार हो गई ऐसा एकाकी पल पाकर मन हमको झकझोर उठा जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा कितनी इच्छाएँ प्यासी थीं, कितने काम अधूरे निकले डुगडुगियों पर नाच रहे थे, हम तो एक जमूरे निकले कर को...

ख़ुद से मुख़ातिब

कितना आसान है दुनिया को ग़लत ठहराना थोड़ा चालाक रवैया ज़रा-सी अय्यारी झूठ को सच बना देने का क़रामाती गुर थोड़ी कज़बहसी थोड़ी ज़िद्द ज़रा-सी लफ़्फ़ाज़ी तेज़ आवाज़ औ’ मुद्दों को घुमाने का हुनर चन्द सिक्कों से ख़रीदे हुए दो-चार गवाह और इक इन्तहा बेअदबी की ढिठाई की…. ….कितना...

गुनाह

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं क़ुसूरवार हूँ, कोई गुनाहगार नहीं मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है मुझे किसी के फ़ैसले का इन्तज़ार नहीं ✍️ चिराग़...
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