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जोधपुर का भव्य विवाहोत्सव

जोधपुर जंक्शन से ट्रेन दिल्ली की ओर रवाना हो रही है। दो दिन तक लगातार उत्सव से ऊर्जा बटोरकर अब ज़िंदगी की गाड़ी फिर अपने फिक्स रूटीन पर दौड़ने को तैयार है।
कवि-सम्मेलन को एक परिवार की तरह जीनेवाली पीढ़ी के एक शानदार पुरोधा, मेरे अग्रज श्री शैलेश लोढ़ा जी की बिटिया स्वरा के विवाह समारोह का संयोग बना।
अपनत्व और अधिकार के साथ बेटी के पिता ने अपने कवि-परिवार के अग्रजों, अनुजों और मित्रों को निमंत्रण भेजा। जोधपुर शहर में आयोजन हुआ। अपने व्यवहार और दोस्ती के लिये जाने जानेवाले शैलेश जी के अतिथियों की सूची में कवियों के अतिरिक्त राजनीति, मीडिया, अभिनय, उद्योग, खेल और अध्यात्म जगत् के तमाम सितारे सम्मिलित थे।
हर शख्स अपने यश का पदवेश द्वार पर छोड़कर नितांत सहज रूप में बेटी-दामाद को आशीष देने के लिए उपस्थित दिखा।
अन्य क्षेत्रों के सितारों ने कवियों के साथ और कवियों ने अन्य सितारों के साथ जमकर फोटोबाज़ी की दो-तीन दिन की डेस्टिनेशन वेडिंग में सबके प्रवास का बेहतरीन प्रबंध था। जोधपुर के आलीशान होटलों में सभी के ठहरने की बेहतरीन व्यवस्था थी। अलग-अलग कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग वेन्यू थे, सो सब अतिथियों के लिए पर्याप्त गाड़ियों की व्यवस्था रही।
इतने सारे अतिथि, इतने सारे VIP’s, इतने सारे सेलिब्रिटी, इतने सारे फंक्शन… और किसी भी शख़्स को रत्तीभर भी असुविधा नहीं हुई।
जोधपुरी शान के रंग में रंगा यह विवाहोत्सव मॉनसून की दस्तक और मौसम की भयानक उमस से भी प्रभावित नहीं हुआ।
छोटी-छोटी बातों का प्रबंधन की दृष्टि से पूरा ध्यान रखा गया। हर फंक्शन अपनी किस्म में अनूठा था किन्तु कवि होने के नाते दो बातें मेरे मन को छू गईं। प्रथम विवाह वाले दिन पूर्वान्ह बेला में ‘अक्षर स्वर’ शीर्षक से एक फंक्शन हुआ, जिसमें सुमित्रानंदन पंत से लेकर, बालकवि वैरागी, प्रो अशोक चक्रधर और श्री सुरेन्द्र शर्मा सरीखे कवियों के शब्दों से स्वरा-और-शाश्वत को आशीष मिल रहा था।
द्वितीय, जयमाला के उपरांत स्वरा के सवर्गीय दादाजी का जो वीडियो चला, उसने मन को भावुक कर दिया।
जोधपुर के उमेद भवन पैलेस में सोमवार की शाम को मुख्य विवाह समारोह था। जैसे ही घराती अपने अपने सिर पर साफा बंधवाकर उमेद भवन के भव्य लॉन में पहुँचे तो ऐसा लगा जैसे किसी कल्पनालोक को धरती पर उतार लिया गया हो। प्रकाश और फूल सभी आयोजनों में होते ही हैं किंतु उनका जो संयोजन था, उसके सलीके ने इस आयोजन को विशिष्ट बना दिया था। रजनीगंधा, श्वेत गुलाब और मोतिया की हृदयस्पर्शी महक… हरे लॉन पर सफेद रंग की पवित्रता का contrast और उस सफ़ेदी में एकाकार होती हुई रौशनी…
अलकापुरी का जैसा वर्णन शास्त्रों में मिलता है, उससे लगभग मिलता-जुलता मंडप, इत्मीनान से एक-एक रीति की व्याख्या करते हुए साथ फेरे, पार्श्व में महामंत्र नवकार, और वैदिक मंत्रोच्चार की अनुगूंज…
उमेद भवन के आकाश में आतिशबाज़ी की झिलमिल थी और धरती पर सितारे जगमगा रहे थे। ऐसा लगता था, मानो सितारों से भरा एक टुकड़ा आसमान अपने दो नक्षत्रों के एक हो जाने का आनंद मना रहा हो। मानो एक अदद आकाशगंगा हँसी और किलोल के मूड में हो।
सबके नाम गिनाना तो मेरे लिए सम्भव नहीं है फिर भी स्मृति की सीमाओं में जिनके नाम यकायक कौंधते हैं उनमें सर्वश्री लक्ष्यराज सिंह, विकी कौशल, राकेश बेदी, गजराज राव, रज़ा मुराद, राजीव ठाकुर, परितोष त्रिपाठी, सुदेश भोंसले, मनोज मुन्तशिर, सुधीर चौधरी, सौरभ द्विवेदी, अमीश देवगन, चित्रा त्रिपाठी, इरफ़ान पठान, मनहर उधास, भजनलाल शर्मा, प्रो अशोक चक्रधर, सुरेन्द्र शर्मा, अरुण जैमिनी, डॉ विष्णु सक्सेना, डॉ सर्वेश अस्थाना, पार्थ नवीन, अशोक चारण, संदीप शर्मा, संजय झाला, डॉ प्रवीण शुक्ल, डॉ भुवन मोहिनी, मुमताज़ नसीम, मनीषा शुक्ला, अंजुम रहबर, गजेंद्र प्रियांशु, मनिका दुबे, स्वयं श्रीवास्तव, गोविंद राठी, मुकेश गौतम, संजय खत्री, ऋतु गोयल, चेतन चर्चित, शशिकांत यादव, साक्षी तिवारी, अजातशत्रु समेत तमाम परिचित चेहरे लगातार मौजूद रहे और फिर मुख्य समारोह में बाबा रामदेव, डॉ कुमार विश्वास, मदन राठौड़ा, जगदीश शर्मा, अनामिका अम्बर, सौरभ सुमन और रमेश मुस्कान की उपस्थिति से चार चांद लग गए।
शैलेश भैया में जो स्वाभाविक मित्रता है, उसका आलीशान प्रतिबिंब इस अविस्मरणीय विवाह समारोह में दिखा। स्वरा और शाश्वत के चेहरे पर अनवरत खिली हुई प्रसन्नता ने लोढ़ा परिवार को थकने नहीं दिया।
कहते हैं आनंद भविष्य का पाथेय है। ईश्वर से यही आकांक्षा है कि पिछले 3 दिन में जितनी आनंद वृष्टि हुई है, उससे स्वरा और शाश्वत का दाम्पत्य पल्लवित हो तथा इन दोनों का जीवन अनवरत उत्सवमयी बना रहे।

✍️ चिराग़ जैन

समय के चक्रव्यूह का अथक जोधा : शैलेश लोढा

वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग करके कवि सम्मेलन का प्रारूप टीवी के अनुरूप बनाने का प्रयोग किया गया। प्रयोग बहुत सफल तो नहीं रहा लेकिन यहाँ से यह बात सिद्ध हो गई कि बिना स्वरूप परिवर्तन के कवि-सम्मेलन को अधिक समय तक टीवी पर दिखाना सम्भव नहीं है।
इस talent hunt में मैं भी एक प्रतिभागी था, निर्णायक मंडल में थे श्री ओमप्रकाश आदित्य, डॉ बशीर बद्र और उर्वशी ढोलकिया। एंकर थे शैलेश लोढा और तनाज़ करीम। शंभू शिखर, पवन आगरी और रमेश मुस्कान सरीखे कवि भी इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे।
मेरा शैलेश भाई से पहला परिचय पहले हो चुका था, लेकिन इस शो के सेट पर उनकी लगभग सनकी धुन ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
इसके बाद मैंने अनेक बार शैलेश भाई से मुलाकात की। हर समय शरारत से भरे रहना और हर क्षण सतर्क रहने का उनका कौशल देखकर, उन्हें और अधिक जानने की जिज्ञासा जी उठी।
समान्य दृष्टि से उन्हें समझ पाना सम्भव नहीं है। उनसे जब मिलो, वे किसी अलग मानसिकता अथवा दार्शनिक अवस्था में मिलते हैं। मुंबइया जीवन की रूखी व्यावसायिकता से घिरे हुए जब उन्हें कवि सम्मेलन का कोई पुराना साथी मिल जाता है तो वे एक झटके में ग्लैमर और सेलिब्रिटिज्म का कोट उतारकर, कवि सम्मेलन के देसी गमछे से मेकअप पोंछ डालते हैं। इस अनुष्ठान के उपरांत वे जोधपुर के बेहद भावुक और सरल इंसान बन जाते हैं। इस अवस्था में वे सिर से पाँव तक खालिस ‘दोस्त’ होते हैं। इस समय उन पर अधिकार जताया जा सकता है, इस समय उनसे बेतकल्लुफ बातचीत की जा सकती है, इस समय उनके साथ ‘जी लगदा यार फकीरी में’ का अनुभव लिया जा सकता है।
इसी समय में वे अपने सर्वाधिक ख़ूबसूरत पल जी रहे होते हैं। इस समय वे सर्वाधिक निश्चिंत होते हैं।
लेकिन इस निश्चिंतता में कोई ख़लल न पड़े, इसलिए इस निश्चिंत महफ़िल को संजोने में वे कई बार आवश्यकता से अधिक चौकन्ने रहने का प्रयास करते हैं। दोस्तों पर वे संदेह नहीं करते, लेकिन किसी को दोस्ती के दायरे तक लाने से पहले अच्छी तरह विचार अवश्य करते हैं।
उनकी भावुक आँखों में उतरी पनीली लकीरों में मुझे भावुकता के हाथों छले जाने के उनके कटु अनुभवों को कई बार लाली बिखेरते देखा है।
अतीत की यादों का सूरज जब आँखों में उगता है तो कड़वाहट से आंखें लाल हो जाती हैं और भावुकता से नम!
मैंने नमी और लाली के इस क्षितिज पर अपनी व्यस्तता से जूझकर अपने लिए मुट्ठी भर समय जीत लाने वाले शैलेश लोढा को हर बार दिल से प्यार किया है, और अपने मन की महफ़िल के सम्मोहन से मुख मोड़कर अपनी व्यस्तता के घने जंगल की ओर दौड़ जाने वाले शैलेश लोढा का जी भर आदर किया है।

✍️ चिराग़ जैन

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