Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
इक नेता जो देसी था
बरसों से कांग्रेसी था
छंटा छँटाया दाना था
पंजे का दीवाना था
कन्टीन्यूअस विधायक था
छुटभैयों का नायक था
जब दस जनपथ जाता था
टिकटें लेकर आता था
हाथ बांध कर खड़े-खड़े
उसने कई चुनाव लड़े
लहर देश में नई चली
हाथ से कुर्सी गई चली
तबियत बहुत उदास हुई
राज्यसभा की प्यास हुई
सारे घोड़े खोल गया
मन की चाहत बोल गया
जा पहुंचा एआईसीसी
किन्तु वहाँ की एबीसी
उसे समझ पर भार मिली
लंबी एक कतार मिली
कई धुरंधर खड़े मिले
प्रभु चरणों में पड़े मिले
सूख गई सपनों की लेक
सीटें कम थी लोग अनेक
पार्टी में कुछ पद मिलता
तो उसका चेहरा खिलता
पर इसमें भी लोचा था
उसने सिर को नोचा था
कुछ दिन बाद उछाव हुआ
मध्यावधि चुनाव हुआ
पुनः टिकट का गिफ्ट मिला
मुरझाया सा फेस खिला
गया मुहर्रम ईद जगी
काडर से उम्मीद जगी
लेकिन किस्मत रूठ गयी
सब उम्मीदें टूट गयी
लोकल लीडर ठेल गए
गुपचुप गुपचुप खेल गए
परिणामों में कमल खिले
भितरघात के ज़ख्म मिले
इन ज़ख्मों को सिलने में
राहुल जी से मिलने में
साल महीने बीत गये
आस के सागर रीत गए
अब वो बिल्कुल ठाली था
हारा हुआ मवाली था
उसने हार नहीं मानी
पुनः जीतने की ठानी
छूछक, मुंडन, गौने में
पत्तल, कुल्हड़, दोने में
हर पंगत में खाता था
सबके दुःख में जाता था
जमकर जनसंपर्क किया
ग्रास रूट का वर्क किया
फिर चुनाव सिर पर आए
सारे लीडर हर्षाए
ठीक इलेक्शन से पहले
टीम सलेक्शन से पहले
ट्रैक्टर मांगा रेल मिली
अमित शाह की मेल मिली
जीवन का अद्भुत क्षण था
भजपा का आमंत्रण था
किन्तु वफ़ा को ढाल किया
राहुल जी को कॉल किया
थककर चूर हुआ भाई
लेकिन बात न हो पाई
आख़िर वो मजबूर हुआ
पंजे का लव दूर हुआ
हाथ के हाथों छला गया
बीजेपी में चला गया
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए और मीडिया की मौज हो गई। भाजपाई बता रहे हैं कि पार्टी को अपने ख़ून-पसीने से सींचनेवाले किसी नेता को साइड लाइन करना नैतिकता नहीं है। यह बयान सुनते ही शत्रुघ्न सिन्हा, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और के एन गोविंदाचार्य जैसे ढेर सारे नाम स्मृतियों में तैर गए। कांग्रेसी बता रहे हैं कि जो दल बदल रहा है वह तुम्हारा भी सगा नहीं होगा। यह बयान सुनते ही नवजोत सिंह सिद्धू, बी डी शर्मा, घनश्याम तिवारी और जनार्दन सिंह गहलोत जैसे नाम ठठाकर हँसने लगे।
भाजपाइयों को कांग्रेस का इतिहास याद आ गया और वे सीताराम केसरी, नरसिम्हा राव और डॉ प्रणब मुखर्जी के अपमान की गाथाएँ सुनाने लगे। ये गाथाएँ सुनकर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी की आँखें डबडबा आईं।
कांग्रेस में दो लीडरों के आगे सबकी प्रतिभा को दबाने की परंपरा रही। भाजपा में भी प्रतिभाशाली नेतृत्व को सलीक़े से साइड लाइन करने के अनगिन उदाहरण मिल जाएंगे।
प्रश्न कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, पीडीपी, जदयू, राजद, द्रमुक, अद्रमुक, झामुमो या अन्य किसी दल का है ही नहीं। यह शुद्ध रूप से सत्ता की लड़ाई है, जिसमें विचारधारा, नैतिकता, राष्ट्रहित, जनहित, धर्म, सम्प्रदाय, विदेशनीति, अर्थनीति जैसे तमाम शब्द खिलवाड़ की तरह प्रयोग किये जाते हैं।
राजनीति का एक ही सिद्धांत है, हमारे साथ रहो, नहीं तो हमसे गाली खाओ। यह सिद्धांत सभी का है। बेशर्मी और ढिठाई से प्रवक्ता बनकर चैनल्स पर बैठनेवाले रीढ़विहीन लोगों के घर में दर्पण की उपस्थिति निषेध होती है। राजनीति की चौखट पर क़दम रखते ही लाज के चीर स्वतः उतार फेंकने होते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के दल बदल लेने से कुछ नहीं बदलेगा। चैनल जब कभी सिंधिया परिवार के इतिहास पर बहस करेंगे तो भाजपा और कांग्रेस के प्रवक्ता आपस में संवाद बदल लेंगे। ड्रामा वैसा ही चलेगा। अब कांग्रेस झाँसी की रानी के साथ हुए विश्वासघात पर सिंधिया परिवार को ग़द्दार बनाने पर तुल जाएगी और भाजपा सुभद्राकुमारी चौहान को कम्यूनिस्ट घोषित करके उस कविता और उस दौर के इतिहास को साज़िश करार दे देगी।
तमाशा चलता रहेगा। लीडर अवसर देखकर दल बदलते रहेंगे। आलाकमान समय की नज़ाक़त को देखते हुए सुखरामों को गले लगाते रहेंगे। कार्यकर्ता तो बेचारा जमूरा है। आज उसे कहा जाएगा कि हमने सिंधिया से कुट्टा कर ली है। और कार्यकर्ता फेसबुक पर उसके नाम की गारी गाने लगेगा। कल उसे कहा जाएगा कि अब हमने उससे अब्बा कर ली है और कार्यकर्ता उसके नाम की बधाई गाने लगेगा।
विधायकों को रिजॉर्ट में क़ैद करके ईद के बकरों की तरह ख़रीदने की परंपरा पुष्ट हो रही है और कार्यकर्ता चुनाव के दिन लाइन में लगकर वोट देने की अपील करते रहेंगे। आदर्श नागरिक लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए व्हील चेयर तक पर लदकर वोट डालने जाएगा और समझदार लीडर उसके वोट को हथियार बनाकर लोकतंत्र की टांगें काट डालेगा।
न्यायालय अपील होने तक प्रतीक्षा करेगा और राजनीति क़ानूनी ख़ामियों का लाभ उठाकर न्याय को फाँसी पर लटकाते रहेंगे। कार्यपालिका नपुंसक ख़सम की तरह ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत पर जिस रात की जो दुल्हन होगी, उसी के तलवे चाटती रहेगी। और मीडिया इस पूरे दंगल में अपनी हाट बिछाकर टीआरपी बटोरती रहेगी।
जनता चुपचाप देखेगी। क्योंकि जनता ने कसम खाई है –
हम, भारत के लोग…!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
बार-बार हारने के बाद भी आखिरकार
राहुल जी जीतने लगे हैं हर चाल में
उन्नीस में थोड़ा देख-भालकर फेंकियेगा
खुद ही न फँस जाओ जुमलों के जाल में
कांग्रेसियों को भी संभलकर चलना है
डूबने न लग जाओ, अगले उछाल में
गाय, गधे, घोड़े छोड़कर अब यह सोचो
ऊँट किस करवट बैठे नए साल में
✍️ चिराग़ जैन
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राहुल भैया बिना बात ही नाराज़ हो गए। स्वयंसेवकों ने औरतें आगे कर केवल यह याद दिलाने की क़ोशिश की थी कि ये उम्र मंदिर जाने की नहीं, घर बसाने की है। लेकिन स्वयंसेवकों को भी समझना चाहिये था कि जो आदमी बैंकॉक से भी केवल योग कर के लौटा हो उसका संयोग भगवान भी नहीं करा सकता।
✍️ चिराग़ जैन
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अमित शाह – “अबे ओये, हिंदी में बोल”
मोदी – “इसकी भाषा समझने से अच्छा है कि मैं भारतीय रेल की समस्याएं समझ लूँ।”
बाबा रामदेव – “आप पतंजलि की बुलेट ट्रेन क्यों नहीं चलवाते।”
केजरीवाल – “बुलेट में भी ईवन-ऑड सिस्टम लाएंगे। एक दिन दूसरा, चौथा, छठा, आठवां डिब्बा चलेगा; और दूसरे दिन पहला, तीसरा, पांचवां, सातवां औए नौवां। सन्डे को केवल इंजन चलेगा।”
राहुल गांधी – “मम्मी, शिन चैन के भाषण में मोदी जी गाने क्यों सुन रहे हैं।”
✍️ चिराग़ जैन