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संक्रमण काल

चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और हद ये है पुरुष प्रधान...

शरद पूर्णिमा

घर में आंगन न रहे, खीर के प्याले न रहे वो अंधेरे नहीं मिलते, वो उजाले न रहे चांद के पास अभी भी है ख़ज़ाना लेकिन वो लुटाए तो कहाँ, लूटने वाले न रहे ✍️ चिराग़...

क्या कर लेगा ऊलाला

सौम्य धुनों से क्या जीते रीमिक्सों का गड़बड़झाला ओरिजनल से पस्त रहेगा, हर नकली-शकली वाला जब महफ़िल में गुंजित होगी, बच्चन जी की मधुशाला क्या कर लेंगी शीला-मुन्नी, क्या कर लेगा ऊलाला ✍️ चिराग़...

बाज़ार की अफ़वाह और अफ़वाह का बाज़ार

दीवाली, दशहरा, रक्षाबंधन ये सब हमारे लिए त्यौहार हैं लेकिन कुछ लोगों के लिए सिर्फ व्यापार हैं हर साल की तरह इस साल भी दीवाली आई, इस साल भी हुआ लक्ष्मी जी का पूजन आतिशबाज़ी और घरों की सफ़ाई, लेकिन इस साल हमने मिठाई नहीं खाई। बचपन में इतनी मिठाई आती थी इतनी मिठाई आती थी...

पुरवा

एक बादल ने सरे-शाम भिगोई पुरवा सुब्ह फूलों से लिपट फूट के रोई पुरवा उसने ओढ़ा हुआ होगा कोई ग़म का बादल यूँ ही मदमस्त नहीं होती है कोई पुरवा हाय ये शहर बहुत रूखा हुआ जाता है अबकी गाँवों ने क्या सरसों नहीं बोई पुरवा तेरे दामन से क्यों उठती है महक ममता की छू के आई है क्या...
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