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राम जी के ‘ट्रस्ट’ का सवाल है

राममंदिर में चोरी की ख़बर सुनकर पूरा देश स्तब्ध रह गया। जो त्रस्त थे, उन्होंने माथा पकड़ लिया और जो व्यस्त थे उन्होंने मोबाइल। आपदा में अवसर तलाशनेवाले विरोधियों ने तुरंत लिखा- “जो भगवान अपने मंदिर की रक्षा नहीं कर पाए, वो हमारी रक्षा क्या कर पाएंगे!”
यह लगभग ऐसा ही तर्क था कि जिस दीपक के तले अंधेरा है, वो कमरे में कैसे रौशनी कर सकेगा!
हमारे यहाँ कोई भी अपराध होते ही अपराधी बाद में पकड़े जाते हैं, बातें पहले पकड़ी जाती हैं। कोई घटना में राजनीति ढूँढता है तो कोई धर्म। किसी को जातीय एंगल दिखता है तो किसी को ज्योतिषीय।
जब तक चोर बेचारा चोरी के माल की बैलेंस शीट भी नहीं बना पाता, तब तक बुद्धिजीवी लोग उसकी चोरी के दर्जनों दार्शनिक ग्रंथ छाप देते हैं।
चोरी के बाद प्रशासन पूरा विचार-विमर्श करने के बाद एक फिक्स बयान देता है- “जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।”
ऐसा लगता है कि चोर यह सुनकर घबरा जाएगा और कहेगा, “अरे! अब तो जाँच बैठ गई। चलो, सामान वापस कर आते हैं।”
जाँच कमेटियों को सबसे पहले सीसीटीवी कैमरे खंगालने होते हैं। यह विज्ञान द्वारा निर्मित एकमात्र ऐसा यंत्र है जिसके पास इतना विवेक है कि क्या देखना है और क्या नहीं देखना है। इसीलिए आरती, प्रसाद-वितरण, भक्तों की भीड़ और यहाँ तक कि किसी भावुक श्रद्धालु की आँखों में उतर आई नमी तक की फुटेज इन कैमरों में एचडी क्वालिटी में दिख जाती है लेकिन जैसे हो चोर अपना एक्शन शुरू करता है, उसी क्षण कैमरे अपनी आँखें मूंद लेते हैं। क्योंकि कैमरों की टीचर ने उन्हें बचपन में ही सिखा दिया था कि “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो!”
बाद में पुलिस एक धुंधली तस्वीर दिखाकर कहती है—”यही संदिग्ध है।” तस्वीर देखकर लगता है कि आदमी नहीं, कोई बादल का टुकड़ा भाग रहा है।
चोरी में जितनी मेहनत चोर नहीं करता, उससे अधिक मेहनत न्यूज़ चैनल करते हैं। भारी भरकम संगीत के साथ चीखती हुई आवाज़ में एंकर पूछता है- “आख़िर कौन है इस चोरी का मास्टर माइंड?” यदि चोर टीवी देख रहा हो तो डरकर नहीं, सिरदर्द से आत्मसमर्पण कर दे।
इनके बाद प्रकट होते हैं विशेषज्ञ। विशेषज्ञों के विश्लेषण और सुझाव, माहौल को मनोरंजक बनाने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। कुछ लोग डिबेट में शोर मचाते रहते हैं और कुछ लोग शोर मचानेवालों को शांत कराते रहते हैं। बिना किसी निष्कर्ष के डिबेट का स्लॉट पूरा हो जाता है और हम विज्ञापन देखने लगते हैं।
जो लोग रामजी के आगे सिर झुकाकर फोटो डालते रहे, वे ही अब कंधे उचकाते हुए कैमरे से मुँह छुपा रहे हैं। रामभरोसे जीनेवाले देश में राम का ‘ट्रस्ट’ कठघरे में है।
प्रश्न यह नहीं है कि “ऐसा कैसे हो गया?” प्रश्न यह है कि “ऐसा होने क्यों दिया?”
अपराधी चाहे जो भी हो, एक बात सुनिश्चित है कि इस बार रावण ने साधु का नहीं, सेवक का वेश बनाया है। इस बार चोरी पंचवटी में नहीं, अयोध्या में हुई है।
राम जी की प्रतिष्ठा तो अक्षुण्ण है लेकिन अगर किसी निजी स्वार्थ के लिए चोरी के मामले में बेईमानी हुई तो भगवान अपने भक्तों पर ‘ट्रस्ट’ नहीं कर पाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

विदूषकों से प्रदूषकों तक

हमारा समाज मुद्दतों से गालियों को यत्र-तत्र प्रयोग करके व्यर्थ करता रहा है। पहली बार एक पूरी पीढ़ी ने इन मूल्यवान शब्दों की कीमत समझकर इनका बाकायदा एक प्रोफेशन के रूप में सदुपयोग करना सीखा है। गालियों के बूते बाकायदा एक ऐसी विधा डेवलप हुई है, जिसमें छोटे-बड़े, लड़के-लड़की, अपने-पराये और सभ्य-असभ्य जैसे भेदभाव के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। इसे कहते हैं असली समानता का अधिकार।
इन महान कलाकारों को सरस्वती जी से तो आशीर्वाद मिल नहीं सकता, इसीलिए इन्होंने महाभारत के शिशुपाल को अपना ‘आराध्य’ मान लिया है। उसी के चरित्र का अनुसरण करते हुए ये लोग, न मौका देखते हैं न दस्तूर, बेहिचक जमकर गालियां बकते हैं। माइक हाथ में आते ही इन्हें लगता है कि यदि गालियां न बकी गईं तो शायद इनका आराध्य इनसे नाराज़ हो जाएगा।
पैसे देकर, टिकट ख़रीदकर इनके शो देखनेवाले श्रोतागण भी इनकी गालियां सुनकर खूब ठहाके लगाते हैं। कंटेंट पर तालियां बजें या न बजें लेकिन गालियों पर तो तालियां बजती ही बजती हैं।
श्रोतादीर्घा में बैठी पब्लिक अपने उपहास पर, अपने परिवारवालों के उपहास पर और अपने प्रोफेशन के उपहास पर इतने प्रसन्न होते हैं, जैसे किसी ने उन्हें नोबेल पुरस्कार दे दिया हो।
हम vulg पहुंच गए। सेंसरबोर्ड जैसे संस्थान भी इन्हें कुछ नहीं कहते, क्योंकि यदि इनकी स्क्रिप्ट में से उन्होंने कुछ एडिट करने की कोशिश की तो अंत में केवल विराम-चिन्ह ही शेष बचेंगे।
मैं इन आधुनिक स्टैंडअप कॉमेडियन्स को समाज-सुधारक मानता हूं। क्योंकि इन्होंने उन शब्दों का उद्धार किया है, जिन्हें असभ्य कहकर अभी तक समाज में तिरस्कृत समझा जाता था। इन्होंने लाज-शर्म और लिहाज के घूंघट में जी रहे विषयों को सार्वजनिक मंच पर ले आने का साहस किया है। और चूंकि चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम, इसीलिए इन महान आत्माओं ने अपने माता-पिता, अपने भाई, अपने दोस्तों और अपनी बहन तक के नितांत निजी क्षणों को धड़ल्ले से सबके सामने सुनाया।
मर्यादा की लीक पर चलते हुए अभी तक भारतीय समाज बाप-बेटी और भाई-बहन के संबंधों को जीता रहा था, उन्हें लगभग निर्वस्त्र करते हुए तलियों और ठहाकों का विषय बनाया गया। जिस तरह की बातचीत को ‘शर्मनाक’ कहकर अभी तक समाज लानत भेजता रहा था, उन्हीं को ‘गर्व’ का विषय सिद्ध करनेवाले ये युगदृष्टा एक नये युग का सूत्रपात कर रहे हैं।
कविता से हास्य उत्पन्न करनेवाले हास्य कवि, चुटकुलों से हंसानेवाले हास्य कलाकार, मिमिक्री के बूते हंसी परोसनेवाले मिमिक्री आर्टिस्ट और हावभाव से लोगों का तनाव दूर करनेवाले हास्य अभिनेताओं ने अभी तक समाज को असली हंसी से दूर रखा। इन नए हास्य अवतारों ने हास्य का पूरा परिदृश्य बदलकर रख दिया।
अपने आपको आधुनिक कहनेवाले इन शिशुपाल-पुत्रों को याद रखना चाहिए कि जिस समाज को तुम कायर मान बैठे हो, वह दरअस्ल कृष्ण की तरह मौन रहकर तुम्हारे अपराधों की गिनती कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

क्रिकेट से अधिक मनोरंजक होते हैं लोकल रवि शास्त्री

आपको अगर क्रिकेट का पूरा मज़ा लेना है तो स्टेडियम में जाने की बजाय किसी लोकल टाइप की क्रिकेट अकादमी में जाकर टीवी पर क्रिकेट का मैच देखिए। इसमें भी सावधानी यह कि आपको मैच नहीं देखना है, आपको तो मैच देख रहे लड़कों और उन लड़कों के गुरुजी को देखना है।
इस सिचुएशन में एक खेल तो स्टेडियम में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण टीवी पर किया जाता है। और एक खेल लोकल क्रिकेट अकादमी के लोकल गुरुजी के मन में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण उनकी भाव भंगिमाओं और हरकतों में हो रहा होता है। मुहल्ले के लड़कों को इकट्ठा करके ख़ुद को रवि शास्त्री समझनेवाले गुरुजी को क्रिकेट मैच देखते हुए देखना, मैच से अधिक मनोरंजक होता है।
वे टीवी के सामने ठीक इस मुद्रा में बैठते हैं जैसे भारत की टीम इलेवन का कोच पवेलियन में बैठकर अपने लड़कों की परफॉर्मेंस देख रहा हो। जब तक मैंच चलता है ये श्रीमान क्रिकेटगुरु टीवी स्क्रीन से साढ़े तीन फीट दूर अपनी कुर्सी पर स्थापित हो जाते हैं। इनकी तशरीफ़ सीडान कार की डिक्की की तरह थोड़ी पीछे की ओर निकल आती है। पीठ, टांगों से लगभग पचहत्तर डिग्री का एंगल बनाते हुए आगे को झुकती है लेकिन रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहती है। पीठ के ऊपरी छोर के बाद गर्दन कुछ ऐसे आगे को निकल आती है जैसे कोई राहु अपने केतु से अलग होकर हवा में लटक रहा हो। होंठ गोलाकार होकर कुछ चूसने की मुद्रा में यथासंभव आगे बढ़ जाते हैं और आंखें चुम्बक की तरह टीवी स्क्रीन पर चिपक जाती हैं। दोनों कुहनियां उनके भारी कंधों का बोझ उठाए हुए घुटनों पर दबाव बनाती हैं और उंगलियां पूरी टीम की चिंता में आपस में उलझती रहती हैं।
किसी भारतीय खिलाड़ी से कैच छूट जाए तो इस लोकल रवि शस्त्री की नाक सिकुडती है और सहसा उसके मुंह से ‘आइला’ या ‘शिट’ टाइप का कोई शब्द निकल पड़ता है। फिर वह अपने छोकरों की ओर देखकर सांत्वना देते हुए ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं’ की ध्वनि के साथ अपने मैच्योर होने का प्रदर्शन करता है।
अच्छा शॉट लगने पर जब वह गर्वानुभूति के साथ आंखें मिचमिचा कर प्रसन्न होता हुआ ‘वेलडन वीरू वेलडन’ बोलता है, तो ऐसा लगता है कि किसी पट्ठे का दांव देखकर उस्ताद पहलवान की आत्मा मडोना बन गई हो।
भारतीय बल्लेबाज किसी बॉल पर बीट हो जाए तो लोकल रवि शास्त्री के चेहरे पर गहरी चिंता और भय का मिश्रित प्रभाव प्रकट होता है और वह जैसे-तैसे अपने होश संभालकर बोल पाता है, ‘क्या कर रहा है सचिन यार, थोड़ा संभलकर!’
पूरे खेल के दौरान इन गुरुजी का ब्लड प्रेशर ‘रनिंग बिटीवन द विकेट्स’ करता ही रहता है। ‘यॉर्कर डाल यार’, ‘स्ट्राइक दे’, ‘प्रेशर मत ले’, ‘आराम से’ और ‘गुड शॉट’ कहते हुए गुरुजी लगातार मैच में बने रहते हैं।
शुक्र है विज्ञान का, कि टीवी के सामने बैठकर बोलनेवालों की आवाज़ स्टेडियम में खेल रहे खिलाड़ियों के कानों तक नहीं पहुंच पाती। वरना वैभव सूर्यवंशी तय नहीं कर पाते कि उन्हें पहले बॉल को पीटना है या क्रिकेटप्रेमियों को।
एक कमेंट्री टीवी पर चल रही होती है और एक-एक कमेंट्री हर लोकल रवि शास्त्री कर रहा होता है।
पूरी दुनिया में किसी भी खेल के प्रशंसक होते हैं लेकिन हमारे देश में क्रिकेट के दीवाने होते हैं। हमारे यहां क्रिकेटर्स को खिलाड़ी नहीं, डायरेक्ट भगवान मानने की परंपरा है। ये और बात है कि जब वही क्रिकेटिया भगवान आउट ऑफ फॉर्म हो जाता है, तो हम उस भगवान के घर-वर तोड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। हमारे यहां क्रिकेटरों के लिए यह कहावत बहुत सूट करती है कि ‘एक गेंद पर निखरे इज्जत, एक गेंद पर होवे हुज्जत।’
इन दिनों वैभव सूर्यवंशी का प्रदर्शन देखकर सोशल मीडिया पर किसी ने उसे भविष्य का विश्वविजेता बताया तो किसी ने उसे अगला प्रधानमंत्री तक घोषित कर दिया। एक ज्योतिषी बता रहे थे कि इसकी राशि पर आज बृहस्पति गोचर कर रहे हैं, इसे अच्छा खेलना ही था। मैंने माथा पीट लिया, पूरा देश वैभव को बधाई दे रहा है, जबकि असली मेहनत पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर बैठा बृहस्पति कर रहा था।
हम भारतीय भावनाओं में जीते हैं। खेल का मैदान हो या असल जीवन, जब तक तथ्य और सत्य बेचारे पैदल चलते-चलते हांफते हुए सबके सामने पहुंचते हैं, उससे काफी पहले भावनाएं दौड़कर मंच पर पहुंच जाती हैं और तांडव मचा चुकी होती हैं।

✍️ चिराग़ जैन

पेपर लीक की महान परम्परा

चूंकि हमें लीक पर चलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए हम पेपर लीक कराने में कीर्तिमान बनाने लगे हैं। हम उस सिस्टम के ख़िलाफ़ हैं, जिसमें परीक्षाओं की घोषणा होते ही विद्यार्थियों की नींद उड़ जाए और अध्यापक तथा अधिकारी मज़े की नींद सोते रहें।
हमने अनवरत मेहनत और लगन से एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसमें परीक्षा की तिथि घोषित होते ही अधिकारी जागने लगते हैं। कुछ अधिकारी इस चिंता में जागते हैं कि कहीं पेपर लीक न हो जाएं। और कुछ अधिकारी इस जुगाड़ में जागते हैं कि पेपर लीक हो जाए।
जैसे ‘रस्सी के आने-जाने से सिल पर निशान पड़ जाते हैं’ वैसे ही हमारे विद्यार्थियों को भी व्यवस्था ने यह विश्वास दिलाया है कि परीक्षा हो या न हो, पेपर ज़रूर लीक होगा। मानसून के आने में देरी हो सकती है, गर्मी-सर्दी-बरसात के शिड्यूल में परिवर्तन हो सकता है। लेकिन पेपर के लीक होने का मौसम किसी सूरत नहीं टल सकता। परीक्षा टल सकती है पर लीकेज नहीं टलेगी।
परीक्षा घोषित होते ही परीक्षार्थियों में शर्त लगती है, ‘बताओ पेपर ठीक होगा या लीक होगा?’ सट्टा बाज़ार में ‘ठीक होगा’ मुफ़्त में भी कोई दांव नहीं लगा रहा है और ‘लीक होगा’ के दांव की कीमत आसमान छूने लगी है।
हमें याद है, हमारे समय में परीक्षाएं किसी युद्ध से कम नहीं होती थीं। परीक्षा की तैयारियों के लिए छात्र-छात्राएं अपने घर-परिवार के ब्याह-शादियों का मोह छोड़कर मन-मसोसकर किताबों से चिपके रहते थे। सड़ी गर्मी में दूर-दूर पड़नेवाले परीक्षा केन्द्रों पर जैसे-तैसे पहुंचते थे। और उसके बाद परीक्षा केन्द्र पर इतनी सघन चैकिंग होती थी, मानो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष हमारे परीक्षा केन्द्र में घुसे बैठे हों। जेब से चूरण की पुड़िया तक निकलवा ली जाती थी।
इतनी सघन सुरक्षा के बीच पेपर लीक करानेवाले धुरंधरों को अंडरकवर एजेंट बनाकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए। ये लोग देश की धरोहर हैं। इनकी प्रतिभा का सही उपयोग करने की ज़रूरत है।
पूरी धरती को काग़ज़ बनाकर, सातों समुद्रों को स्याही बना लिया जाए तो भी इन हुनरमंद लोगों के हुनर का बखान करना मुमकिन नहीं होगा। इसलिए मैं आजकल सीधे मोबाइल पर टाइप करने लगा हूं। कौन काग़ज़ और स्याही का टंटा पाले।
डिजिटल क्रांति से याद आया। हमारे यहां परीक्षा का फॉर्म भरते समय वेबसाइटों का सर्वर हांफने लगता है। तीन घंटे की फिल्म सवा दो मिनिट में डाउनलोड करनेवाले वाईफाई को भी दो पेज का फॉर्म भरने में तीन बार हार्टअटैक आ जाता है। पेमेंट गेटवे की कुशलता ऐसी है कि पेमेंट कटने के बाद नेटवर्क प्रॉब्लम उत्पन्न होती है और ट्रांज़िक्शन फेल हो जाती है। फिर कैप्चा कोड डालकर यह सिद्ध करना होता है कि हम रोबोट नहीं हैं।
फॉर्म भरने का किला फ़तह करने के बाद परीक्षार्थी फिंगर क्रॉस करके भगवान से मनाते हैं कि हे भगवान इस बार पेपर लीक न हो। परीक्षा करानेवाली एजेंसियां पेपर को किसी अनजान टापू पर किसी अंधेरी गुफ़ा में रखकर निश्चिंत हो जाती हैं। लेकिन परीक्षा के एक दिन पहले ही यह गोपनीय दस्तावेज, व्हाट्सएप्प पर फ्री डिलीवरी की तरह विचरण करने लगता है।
जिस देश में दूध की डिलीवरी फेल हो जाती है। रिटेल एप्लीकेशन्स की डिलीवरी लेट हो जाती है। लेकिन ‘पेपर लीक वॉरियर्स’ समय के इतने पाबन्द हैं कि आंधी आए या तूफ़ान इनके नेटवर्क कभी फेल नहीं होते। इसे कहते हैं डिजिटल क्रांति का सही उपयोग।
पेपर लीक होने के बाद जांच समितियों का गठन होता है। प्रभावित छात्र-छात्राएं बिलखते हुए प्रदर्शन करते हैं। अखबारों में बेरोज़गारी के आंकड़े छापे जाते हैं। टेलीविज़न पर बहस होती हैं कि कांग्रेस के शासन में ज़्यादा पेपर लीक हुए या भाजपा के ज़माने में। शोर-शराबा होता है। हंगामा मचने लगता है। लेकिन हमारी योग्य जांच समितियां बड़े सलीके से इस हंगामे को ठण्डे बस्ते में डाल देती हैं।
कुछ दिनों में परीक्षा में पूछे जानेवाले प्रश्न बदलने लगेंगे।
प्रश्न 1. वर्ष 2025 मे कुल कितने राज्यों में पेपर लीक हो पाया?
प्रश्न 2. यदि एक पेपर 10 लाख रुपये में लीक हुआ है, तो नीचेवाले बिचौलियों और उपरवाले साहबों के कमीशन के बाद मुख्य कर्मवीर को कितना मुनाफ़ा होगा?
प्रश्न 3. क्या महाभारत काल में पितामह भीष्म ने अर्जुन को अपनी मृत्यु का रहस्य बताकर पेपरलीक की महान परंपरा का प्रादुर्भाव किया था?
प्रश्न 4. जब पेपरलीक की प्रक्रिया कुछ दिनों में सम्पन्न हो जाती है, तो इसके दोषियों को सज़ा मिलने में दस-बीस साल क्यों लग जाते हैं?
वह दिन दूर नहीं जब परीक्षा की तैयारी करते परीक्षार्थी से उसका बेटा कहेगा, ‘इतनी टेंशन न लो यार पापा, भरोसा रखो, इस बार फिर पेपर लीक होगा।’

✍️ चिराग़ जैन

महँगाई को डायन मत कहो प्लीज़

महंगाई के लिए सरकार को कोसने का चलन पुराना हो गया। ज़रा सी महँगाई क्या बढ़ी कि राशन-पानी लेकर सरकार पर चढ़ गए। अब समय बदल रहा है।
अब ऐसी बातों पर लाइक और कमेंट नहीं आते। इसलिए कुछ अलग ढंग से सोचो। महँगाई के लिए सरकार को नहीं, विपक्ष को कोसो।
सरकार तो कब से कह ही रही थी कि ईंधन के दाम बढ़ने के कोई चांस नहीं हैं। ये विपक्षी नेता ही हैं जो बार-बार कहते थे कि वोटिंग ख़त्म होते ही दाम बढ़ जाएंगे।
कितनी बार कहा है, शुभ-शुभ बोला करो। चौबीस घंटे में एक बार जिह्वा पर सरस्वती बैठती है। अब ले लो मजे। हो गई ना ये मनहूस बात सच्ची!
सरकार का एक-एक मंत्री, एक-एक नुमाइंदा दिन-रात यही बात दोहराता रहा कि दाम नहीं बढ़ेंगे। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।
समझदारी इसी में है कि जो हो गया उसे स्वीकार कर लो। बीती ताहि बिसार के आगे की सुध लेय। अंतिम सत्य यही है कि दाम बढ़ चुके हैं। इतिहास गवाह है, बढ़े हुए दाम कभी कम नहीं होते। इसलिए रोना-पीटना करके कंगाली में आटा गीला मत करो, बल्कि इस बात में दिमाग़ लगाओ की इन बढ़े हुए दामों को चुकाना कैसे है।
विपक्ष आपको बरगलाने के लिए तैयार बैठा है। अरे भई, सिलेंडर महंगा हो गया तो क्या राजघाट पर जाकर डांस करोगे? किराये महंगे हो गए तो क्या बैलगाड़ी पर दफ्तर जाने का ड्रामा करेंगे? यह आचरण आपको शोभा नहीं देता।
ईश्वर ने क्या हमें खाने-पीने और घूमने-फिरने के लिए यह अनमोल मनुष्य जीवन दिया है। अरे भाई, इतनी सड़ी गर्मी में बाहर निकलोगे तो लू लग जाएगी। अपने घर में रहो। टीवी पर बढ़िया-बढ़िया मनोरंजक कार्यक्रम देखो।
अब आप रोना रोने लगो कि प्याज महंगी हो रही है। दरअसल ये सोच ही गलत है। विपक्ष चाहता है कि आप प्याज के दामों की तुलना प्याज के ही दाम से करें। ये भी कोई बात हुई।
प्याज का सदुपयोग करना आपको नहीं आता और कोस रहे हैं सरकार को। विपक्ष ने इतने साल तक आपको यही सिखाया कि प्याज दिखे तो उसे खा जाओ। प्याज कोई खाने की चीज है, अरे प्याज तो गर्मी के मौसम में जेब में रखकर घूमने की चीज है।
लेकिन विपक्ष ये बात आपको नहीं बताएगा, क्योंकि अगर आपने प्याज जेब में रखकर गर्मी का इलाज ढूँढ लिया तो हज़ारों रुपये के एसी कौन खरीदेगा।
विपक्ष तो है ही नकारात्मक। इसे सरकार के हर निर्णय में बुराई ही दिखती है। अरे भाई, कॉमर्शियल सिलेंडर महंगा करने से अब लोग घर का शुद्ध खाना खाएंगे। ये किसी को दिखाई नहीं देता।
घर की रोटी छोड़कर बाहर ढाबों में, होटलों में, ठेले पर लार गिराते फिरना कोई सभ्य लोगों का काम है। हाँ, कभी-कभार झालमुड़ी खा ली, कभी एकाध लिट्टी-चोखा खा लिया तो दस-बारह रुपये खर्च हो भी गए तो कौन सी आफ़त आ जाएगी।
‘रूखी-सूखी खाय के ठण्डा पानी पी’ -यही निरोगी जीवन का मूल सिद्धांत है। ऊटपटांग तला-भुना खाओगे तो बीमार पड़ जाओगे। बीमार पड़ोगे तो अस्पताल जाना पड़ेगा, दवाइयां खानी पड़ेंगी। फिर शोर मचाओगे, कि दवाएं महंगी हैं।
ऐसे कर्म ही क्यों करते हो कि तुम्हें दवाई खरीदनी पड़े। सरकार बेचारी कहाँ तक हथेली लगाएगी।
बस एक बात ध्यान रखो। महँगाई केवल एक भ्रम है। असली बात ये है कि विपक्ष आपको बीमार करना चाहता है, और सरकार आपको स्वस्थ रखना चाहती है।

✍️ चिराग़ जैन

रहिमन काग़ज़ राखिए…

कई बार ऐसा महसूस होता है कि धरती पर हमारा जन्म ही केवल काग़ज़ सम्भालने के लिए हुआ है। आपके पास काग़ज़ हैं, तो सब कुछ है। आपके पास घर है, लेकिन घर के काग़ज़ नहीं हैं तो भले ही आप महल में रह रहे हो, सरकार के लिए आप बेघर हो। लेकिन सड़क पर रहनेवाले बेघर के नाम की, किसी मकान की रजिस्ट्री अगर सरकारी बाबू को मिल गई तो फिर वो लाख सिर पटक ले, उसे बेघर नहीं माना जाएगा।
कोई पैदा हुआ तब माना जाता है, जब उसके पैदा हो जाने का काग़ज़ बरामद हो जाए। ऐसे ही कोई मरा हुआ भी तब माना जाता है जब नगर निगम उसके मरण का दस्तावेजीकरण कर देता है। और ये मरने का काग़ज़ हासिल करने के लिए भी बहुत काग़ज़ लगाने पड़ते हैं। भले ही नगर निगम का पूरा महकमा किसी की शवयात्रा में सशरीर शामिल हुआ हो, भले ही स्वयं यमराज किसी के मरने की गवाही देने उपस्थित हो जाएं, लेकिन काग़ज़ लगाए बिना मरण प्रमाण-पत्र नहीं मिलेगा। उल्टे कोर्ट, यमराज को अपने यमराज होने के कागज़ प्रस्तुत करने का आदेश भी दे सकता है। आखिर हर चीज़ का कोई सिस्टम होता है।
मनुष्य जाति ज्यों-ज्यों विकसित हुई, त्यों-त्यों इन काग़ज़ों को सम्भालनेवाले लोग, पेशे और विभाग भी विकसित हुए। चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, अभिलेखागार जैसी संज्ञाएं काग़ज़ के महत्व का प्रमाण हैं।
आम आदमी के लिए आवश्यक है कि वह काम से ज्यादा काग़ज़ पर ध्यान दे। आम आदमी हमेशा काग़ज़ों से घबराया रहता है। लेकिन सिस्टम कभी काग़ज़ से नहीं घबराता। उसे अच्छी तरह पता है कि कब कौन सा काग़ज़ मिलना चाहिए और कब कौन सा काग़ज़ नहीं मिलना चाहिए।
आपको बैंक में खाता खोलने के लिए पैन कार्ड, आधार कार्ड, बायोमैट्रिक और गवाही जैसे पर्याप्त काग़ज़ देने पड़ते हैं। फिर भी आप काग़ज़ का महत्व भूल न जाओ, इसलिए बैंक समय-समय पर आपका केवाईसी करता है। इस प्रक्रिया में आप उन्हीं कागज़ों की एक और कॉपी नत्थी करते हैं। बैंक नयी कॉपी को पुराने काग़ज़ से मिलाकर सन्तुष्ट होता है कि उसके कस्टमर का काग़ज़ी चरित्र बिल्कुल नहीं बदला है। इस प्रक्रिया के पूर्ण हुए बिना आप अपने खाते से अपना ही पैसा नहीं निकाल सकते हैं। किन्तु जब आपके साथ कोई डिजिटल फ्रॉड हो जाए तो अपराधी ने आपके खाते से पैसा किस खाते में ट्रांसफर किया। किस जगह से उसे निकाला गया। किस ब्रांच में उसका केवाईसी हुआ, कहाँ उसने साक्षात आकर बायोमैट्रिक किया और किसने उसके अस्तित्व की गवाही दी- पुलिस को ये काग़ज़ नहीं मिलते। अर्थात्‌ आपके खाते में से आपको पैसा निकालना है, तो केवाईसी ज़रूरी है, लेकिन कोई प्रतिभाशाली जेबकतरा आपके बैंक खाते से पैसा बिना केवाईसी के निकाल सकता है।
बीमा एजेंट जब बीमा करने आता है तब वह बीमित व्यक्ति का परिचित होता है। तब उसे किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं होती। ‘अरे भाईसाहब, मैं बैठा हूँ ना’ और ‘आप फ़िकर मत करो’ जैसे मंत्रोच्चार से वह नागरिक के माथे पर बीमातिलक लगा देता है। लेकिन जैसे ही उस नागरिक को इंश्योरेंस के क्लेम की ज़रूरत पड़ती है, तब अचानक वह परिचित एजेंट ‘सिस्टम’ बन जाता है। और सिस्टम के लिए तो काग़ज़ लगाने ही पड़ते हैं।
किसी नागरिक की छवि आयकर इंस्पेक्टर की आँखों में उतर जाए, तो उसके परदादा ने बचपन में उसे जो चवन्नी दी होती है, उसको भी गैरकानूनी नकद लेनदेन साबित कर दिया जाता है। लेकिन ईमानदारी से टैक्स देने के बाद बचे हुए पैसे हड़पकर, जब कोई बिल्डर घर नहीं देता तो वकीलों को बिल्डर की बेईमानी सिद्ध करने में दस-दस साल लग जाते हैं।
काग़ज़ जब चाहे प्रकट हो जाता है, जब चाहे विलीन हो जाता है। यह काग़ज़ की लीला है। इसलिए आपका पेट भरे या न भरे, काग़ज़ का पेट भरते रहो। क्योंकि रहीम ने कहा है- “रहिमन काग़ज़ राखिए…”
✍️ चिराग़ जैन

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