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देवप्रयाग की वह सुबह

जुलाई 2014 की घटना है। कोटेश्वर से कवि-सम्मेलन करके प्रज्ञा विकास और मैं सुबह-सुबह ऋषिकेश के लिये रवाना हुए। सर्दियां ठीक से शुरू नहीं हुई थीं, लेकिन पहाड़ों की अपनी ताज़गी सुबह-सुबह हल्की ठण्ड का अहसास करा रही थी। पहाड़ की घुमावदार सड़क पर हरे पानी की धारा के साथ-साथ...

ठौर ना पाया

कौन कहता है नदी सागर को प्यारी हो गयी ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी टूटकर बिखरी कहीं जब भी, तभी झरना बना पत्थरों ने गोद में लेकर कहा- ‘मरना मना’ सिर झुकाकर बढ़ चली पर चाल भारी हो गयी ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी घाट तक पहुँची, उलझकर रह गयी संसार में...
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