आवरण से आचरण तक
आवरण मात्र हैं वस्त्र
आचरण नहीं!
क्योंकि राम
वैभव में भी
राम ही रहे
और
वन में भी
राम ही रहे
लेकिन रावण
वल्कल पहन कर भी
नहीं हो सका
साधु!
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
आवरण मात्र हैं वस्त्र
आचरण नहीं!
क्योंकि राम
वैभव में भी
राम ही रहे
और
वन में भी
राम ही रहे
लेकिन रावण
वल्कल पहन कर भी
नहीं हो सका
साधु!
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मैंने नाव से सीखा है
कि
तरने की प्रक्रिया
प्रारंभ होती है
उतरने से!
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मिट्टी में
क्षमता होती
बीज की प्रवृत्ति बदलने की
तो
एक ही गुरुकुल में
एक ही गुरु से पढ़कर
सभी शिष्य युधिष्ठिर बन जातेे
कोई दुर्योधन न बना होता
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मैं
जिससे डरता हूँ
उसे डर बना रहता है हमेशा
कि कहीं
मैं उससे डरना
बंद न कर दूँ।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सोचा था
मन को
गंगा जैसा पावन करके आएंगे
लेकिन
लौटे हैं
गंगा को
मन जैसा मैला करके!
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
दीपक ने दिखाया-
“मौन रहकर काम करो
दीर्घायु हो जाएगा
उजियारा।”
पटाखे ने सिखाया-
“धमाका करो
शोर मचाओ!
रौशनी से ज़्यादा ज़रूरी है
रौशनी की गूँज।”
मैं समझ गया
कि मानवता
क्यों रोकना चाहती है युद्ध
क्यों सजाना चाहती है आरती।
✍️ चिराग़ जैन
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