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चरित्र निर्माण के विवेकहीन पाठ्यक्रम

बचपन में हमें जो कहानियाँ पढ़ाई गयी हैं; उनके झोलझाल को समझने में पूरी ज़िन्दगी कन्फ्यूज़ हो गयी है। कबूतर और बहेलिये की कहानी ने हमारे दिमाग़ में भरा कि हमें सबकी मदद करनी चाहिए। तो सारस और केकड़े वाली कहानी ने बताया कि जिसकी मदद करोगे, वही तुम्हें मार डालेगा। बन्दर और...

झाँसी की रानी

उन हाथों में बिजली की तेज़ी थी; तलवारों से पूछो दुर्गा का साक्षात रूप थी; युग के हरकारों से पूछो आँखों में अंगार, पीठ पर ममता लेकर ऊँचाई से कैसे कूदी थी इक रानी; जाकर दीवारों से पूछो हिम्मत की राहों में जब भी आईं तो चुक गयी दीवारें कैसे कूदेगी अम्बर से रानी; उत्सुक भयी...

दो साल बाद कवि सम्मेलन

दो साल के घनघोर निठल्लेपन के बाद मुझे कवि-सम्मेलन का आमंत्रण मिला तो मैं फूला नहीं समा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल न होता तो उस दिन मेरा आयतन दो गज की सीमा को पार कर गया होता। जिस मोबाइल की घण्टी से भी रेमडिसिवर की बदबू आने लगी थी, उससे फिर से होटल से उठाए हुए...

अनुवाद : परिकल्पना और वस्तुस्थिति

चूँकि उड़ने के लिए पंख फैलाने आवश्यक होते हैं, इसलिए उड़ते हुए पक्षी का आकार, बैठे हुए पक्षी के आकार से बड़ा हो जाता है। भाषा का आकार विस्तृत करके उसे सुदूर यात्रा के योग्य बनाने के लिए ‘अनुवाद’ पंखों की भूमिका निर्वाह करता है। अनुवाद, भाषा के ज्ञानकोष को समृद्ध करता है।...

अब उसकी कुछ आस नहीं है

सूखी हुई नदी के तट पर नौका लेकर आने वाले जिस कलकल को ढूंढ रहा है अब उसकी कुछ आस नहीं है चलते-चलते बहा पसीना, ठहर-ठहर कर नदिया सूखी तू होता जाता था लथपथ, वो होती जाती थी रूखी लहर-लहर लहरा-लहरा कर तुझको पास बुलाने वाले जिस आँचल को ढूंढ रहा है अब उसकी कुछ आस नहीं है माना...
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