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मानवता

अपने आप से दूर हो रहे लोग इंसानियत से अधिक आवश्यक हो रहे भोग अदालतों में टूटता भाई-बहन का प्यार अस्सी साल की नारी का बलात्कार पश्चिम की धुनों पर थिरकता यौवन चुनाव-दर-चुनाव बढ़ता प्रलोभन बेटियों को बेचकर ख़रीदा गया राशन धर्ममंचों से पढ़ा जा रहा राजनैतिक भाषण स्कूलों के...

रिक्शावाला

डरी-सहमी पत्नी और तीन बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता है रिक्शावाला। बच्चे रोज़ शाम खेलते हैं एक खेल जिसमें सीटी नहीं बजाती है रेल नहीं होती उसमें पकड़म-पकड़ाई की भागदौड़ न किसी से आगे निकलने की होड़ न ऊँच-नीच का भेद-भाव और न ही छुपम्-छुपाई का राज़ ….उसमें होती...

अनकहा

हम क़लम थामकर सोचते रह गए भाव आँसू बने, आँख से बह गए इक ग़ज़ल काग़ज़ों पर उतर तो गई दर्द दिल के मगर अनकहे रह गए ✍️ चिराग़...

कवि

एक जन्म की साधना या तपस्या कुछ रातों की व्यक्ति को नहीं बनाती है कवि। कविता के रूप में शब्दों को संजाने के लिये करनी पड़ती है तपस्या जन्मों तक तब कहीं जाकर कठिनाई से जन्मता है कवित्व। जानते हो? कवि के सामने रखी दवात में नहीं होती है स्याही ख़ून होता है। वही ख़ून जो जलता...

क्या हम हिन्दुस्तानी हैं?

क्या आपने हिन्दुस्तान को देखा है ग़रीबी से सिसकती जान और भूख से निकलते प्राण को देखा है? …ज़रूर देखा होगा बरसात में फुटपाथ पर भीगता हुआ हिन्दुस्तान जिसे पास भीगने को सिर है पर छिपने को घर नहीं है। जिसने अपने चीथड़ों के एक-एक रेशे को उधड़ते हुए देखा है। क्या आपने...
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