Chirag Jain Writings, Doha, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जीवन बाती से जुड़े, पुरुषार्थों की आग।
हर आंगन संदीप्त हो, जाय अंधेरा भाग ॥
दिव्य-दिव्य हों कल्पना, दिव्य-दिव्य हों रंग।
दिव्य अल्पनाएँ बनें, हों सब दिव्य प्रसंग ॥
पावन पुष्पों से गुँथें, ऐसे बन्धनवार।
जिन्हें लगाकर सज उठें, सबके तोरणद्वार ॥
भोर समीरों में घुलें, गेंदे के मकरंद।
सांझ ढले कर्पूर की, हर दिसि भरे सुगन्ध ॥
लक्ष्मी का अवतार हो, हाथ लिए संतोष।
जिससे खाली हो सकें, सभी लालसा कोष॥
पथ पर हो दीपावली, मन में हो मकरंद।
वाणी में मिष्ठान्न हो, जीवन में आनंद॥
मन दशरथ, केकैयी कुमति, देह अयोध्या धाम।
तृष्णा इक वनवास है, सुख के क्षण श्रीराम॥
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जब तक तुम संग थीं
मैंने नहीं तलाशी कोई ख़ुशी
नहीं खोजी कोई मुस्कान
नहीं ढूँढ़ी कोई हँसी
…ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
अब तलाशता फिरता हूँ
एक-मासूम सी ख़ुशी
अपने दिल के लिये।
एक कोमल-सी मुस्कान
अपने होंठों के लिये।
एक गीली-सी हँसी
अपने चेहरे के लिये।
और एक पावन-सी चमक
अपनी आँखों के लिये।
लेकिन रीती ही रह जाती है
तलाशों का जल भरने के लिए बढ़ती
छोटी-सी अंजुरी।
दूर तक यात्रा करने के बाद
पलकों के भीतर
लौट आती हैं गीली निगाहें
और देर तक इंतज़ार करने के बाद
थककर बैठ जाता हूँ मैं।
हाय राम!
खुशियों को भी
अभी व्यस्त होना था!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Purushottam
रावण के व्यक्तित्व में, कुछ तो होगी बात
जिसे मारने जन्म लें, तीन लोक के नाथ
✍️ चिराग़ जैन