Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
मार्किट ठंडा
घर-घर मंदा
जेब सभी की ख़ाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
कोरोना की दहशत ऐसी अबकी गिफ्ट नहीं आये
इसके डिब्बे उसके घर में होकर शिफ्ट नहीं आये
ख़ूब घुमंतू सोन पापड़ी घर पर बैठी ठाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
कोरोना ने लक्ष्मी जी को कैसा क्वारंटाइन किया
धनतेरस के धन्वंतरि ने पूरा सिस्टम जॉइन किया
आतिशबाजी के जलने से पहले जली पराली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
एनजीटी ने पॉल्यूशन का बढ़ता ग्राफ दिखाया है
फ्यूल कॉस्ट ने महँगाई को रस्ता साफ़ दिखाया है
हेल्थ मिनिस्ट्री ने एक्टिव केसों की लिस्ट निकाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
भारत की पूर्णता का भान करने के लिए
वेद की ऋचाओं का सुज्ञान भी ज़रूरी है
मंदिरों की संध्या आरती के सुर मुख्य हैं तो
मस्जिदों से उठती अजान भी ज़रूरी है
कातिक, असौज, माघ, सावन भी अहम हैं
मीठी ईद वाला रमज़ान भी ज़रूरी है
नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर, ईसामसीह
राम भी ज़रूरी, रहमान भी ज़रूरी है
मीरा का मुरारी, जसोदा का नंदलाल और
राधिका के सांवरे से कंत भी समान हैं
जन्म से मरण तक कोई-सा भी पंथ रहे
आदि भी समान और अंत भी समान हैं
बैरागी, फ़क़ीर, ब्रह्मचारी, त्यागी, पीर, बाबा
सिद्ध, ऋषि-मुनि, साधु-संत भी समान हैं
यंत्र भी समान, तंत्र-मंत्र भी समान और
भीतर से सारे धर्मग्रंथ भी समान हैं
झाड़-फूंक वाले टोने-टोटके भी अपने हैं
जड़ी-बूटी वाला वो इलाज भी हमारा है
शंख फूंकने से बाँसुरी की तान तक दक्ष
शस्त्र भी हमारा और साज भी हमारा है
शोणित के पान की परंपरा हमारी ही है
क्षमादान करता रिवाज़ भी हमारा है
गंगा जी का तट मणिकर्णिका हमारा ही है
जमुना किनारे बना ताज भी हमारा है
युध्द से विरक्त हो के संत जो बना था वीर
मौर्यवंशी शासक महान भी हमारा है
भोज, अकबर, शेरशाह, रणजीत, हर्ष,
महाराणा, पौरुष, चौहान भी हमारा है
भारतीय दर्शन जान के सुदर्शन
शून्य पे जो बोला था वो ज्ञान भी हमारा है
भारत हमारा, आर्यावर्त भी हमारा ही है
इंडिया हमारा, हिंदुस्तान भी हमारा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Doha, Poetry
उत्सव से ऐसे करो, जीवन का शृंगार।
ज्यों मावस की रात में, दीपक का उजियार।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
गाँव का
पुराना मकान
कच्चा-पक्का फ़र्श
दीमक लगी जर्जर चौखट
और
देहरी के दोनों ओर
चिकनाई के
दो गोल निशान!मुद्दत हुई
हर साल
दीपावली पर
दीपक जलाते थे दो हाथ।
फिर
अपने पल्लू की ओट में छिपाकर
हवा के झोंके से बचाते हुए
दीवार की आड़ में
हौले से
देहरी पर
दो दीपक
धर आते थे दो हाथ।
न जाने क्यों
आज फिर से
जीवंत हो उठी है माँ!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
एक ख़बर- वाराणसी में गंगा आरती के दौरान बम धमाका!
टिप्पणी- कभी दीवाली मनाई हो तो पता चले, लक्ष्मी पूजन के समय आतिशबाज़ी नहीं की जाती।
✍️ चिराग़ जैन