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विदूषकों से प्रदूषकों तक

हमारा समाज मुद्दतों से गालियों को यत्र-तत्र प्रयोग करके व्यर्थ करता रहा है। पहली बार एक पूरी पीढ़ी ने इन मूल्यवान शब्दों की कीमत समझकर इनका बाकायदा एक प्रोफेशन के रूप में सदुपयोग करना सीखा है। गालियों के बूते बाकायदा एक ऐसी विधा डेवलप हुई है, जिसमें छोटे-बड़े, लड़के-लड़की, अपने-पराये और सभ्य-असभ्य जैसे भेदभाव के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। इसे कहते हैं असली समानता का अधिकार।
इन महान कलाकारों को सरस्वती जी से तो आशीर्वाद मिल नहीं सकता, इसीलिए इन्होंने महाभारत के शिशुपाल को अपना ‘आराध्य’ मान लिया है। उसी के चरित्र का अनुसरण करते हुए ये लोग, न मौका देखते हैं न दस्तूर, बेहिचक जमकर गालियां बकते हैं। माइक हाथ में आते ही इन्हें लगता है कि यदि गालियां न बकी गईं तो शायद इनका आराध्य इनसे नाराज़ हो जाएगा।
पैसे देकर, टिकट ख़रीदकर इनके शो देखनेवाले श्रोतागण भी इनकी गालियां सुनकर खूब ठहाके लगाते हैं। कंटेंट पर तालियां बजें या न बजें लेकिन गालियों पर तो तालियां बजती ही बजती हैं।
श्रोतादीर्घा में बैठी पब्लिक अपने उपहास पर, अपने परिवारवालों के उपहास पर और अपने प्रोफेशन के उपहास पर इतने प्रसन्न होते हैं, जैसे किसी ने उन्हें नोबेल पुरस्कार दे दिया हो।
हम vulg पहुंच गए। सेंसरबोर्ड जैसे संस्थान भी इन्हें कुछ नहीं कहते, क्योंकि यदि इनकी स्क्रिप्ट में से उन्होंने कुछ एडिट करने की कोशिश की तो अंत में केवल विराम-चिन्ह ही शेष बचेंगे।
मैं इन आधुनिक स्टैंडअप कॉमेडियन्स को समाज-सुधारक मानता हूं। क्योंकि इन्होंने उन शब्दों का उद्धार किया है, जिन्हें असभ्य कहकर अभी तक समाज में तिरस्कृत समझा जाता था। इन्होंने लाज-शर्म और लिहाज के घूंघट में जी रहे विषयों को सार्वजनिक मंच पर ले आने का साहस किया है। और चूंकि चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम, इसीलिए इन महान आत्माओं ने अपने माता-पिता, अपने भाई, अपने दोस्तों और अपनी बहन तक के नितांत निजी क्षणों को धड़ल्ले से सबके सामने सुनाया।
मर्यादा की लीक पर चलते हुए अभी तक भारतीय समाज बाप-बेटी और भाई-बहन के संबंधों को जीता रहा था, उन्हें लगभग निर्वस्त्र करते हुए तलियों और ठहाकों का विषय बनाया गया। जिस तरह की बातचीत को ‘शर्मनाक’ कहकर अभी तक समाज लानत भेजता रहा था, उन्हीं को ‘गर्व’ का विषय सिद्ध करनेवाले ये युगदृष्टा एक नये युग का सूत्रपात कर रहे हैं।
कविता से हास्य उत्पन्न करनेवाले हास्य कवि, चुटकुलों से हंसानेवाले हास्य कलाकार, मिमिक्री के बूते हंसी परोसनेवाले मिमिक्री आर्टिस्ट और हावभाव से लोगों का तनाव दूर करनेवाले हास्य अभिनेताओं ने अभी तक समाज को असली हंसी से दूर रखा। इन नए हास्य अवतारों ने हास्य का पूरा परिदृश्य बदलकर रख दिया।
अपने आपको आधुनिक कहनेवाले इन शिशुपाल-पुत्रों को याद रखना चाहिए कि जिस समाज को तुम कायर मान बैठे हो, वह दरअस्ल कृष्ण की तरह मौन रहकर तुम्हारे अपराधों की गिनती कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

धैर्य

हे अर्जुन,
सूर्यास्त को देखकर
न धैर्य छोड़ो,
न धनुष;
हो सकता है
सूर्य गया हो
जयद्रथ को बुलाने!

✍️ चिराग़ जैन

कृष्ण का तो चक्र भी ‘सुदर्शन’ है

नंदलला, कन्हैया, कान्हा, गिरिधर, मुरलीधर, गोपाल, मोहन, गोविन्द, मधुसूदन, केशव, रणछोड़, माधव, श्याम, वासुदेव, पीताम्बर… और भी दर्जनों संज्ञाएँ मिलकर थोड़ी-थोड़ी झलक भर दे पाती हैं एक कृष्ण की। और ये सब संज्ञाएँ कृष्ण के नाम भर नहीं हैं, अपितु ये सब नाम कृष्ण के जीवन के अलग-अलग किस्सों के शीर्षक हैं, जिनको एक क्रम में लगा देने से कृष्ण की कथा बन जाती है।

आश्चर्यजनक बात यह है कि इनमें से कोई भी किस्सा अपनी पूर्णता के लिए किसी अन्य किस्से पर निर्भर नहीं है, लेकिन फिर भी जब इन अलग-अलग मोतियों को एक सूत्र का पथ मिल जाए, तो ये सब मिलकर ‘एक’ हो जाते हैं।
यह इसलिए संभव हो पाता है कि कृष्ण, जीवन के प्रत्येक पल को भरपूर जीते हैं। हर क्षण में व्याप्त जीवन का रस भोगने में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि फिर उस क्षण को लादकर अगले क्षण तक ले जाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। क्षण तो दूर की बात है, उस क्षण की स्मृति भी अगले किसी क्षण तक यात्रा करने का साहस नहीं जुटा पाती। कृष्ण जहाँ हैं, वहाँ अपनी सम्पूर्ण चेतना के साथ हैं। यही कारण है कि कृष्ण कथा के पीछे नहीं भागते, उल्टे कथा ही कृष्ण के पीछे भागती प्रतीत होती है।
जीवन को पूर्णता से जी लेना ही वह तृप्तिबोध है, जो व्यक्ति को आकांक्षा, उत्कंठा और अपेक्षा से मुक्त कर देता है। कृष्ण की पूरी कथा में वे कहीं भी भाग्य से रुष्ट नहीं दिखाई देते। क्योंकि कृष्ण, समय की सूक्ष्मतम इकाई को भी, समय की नदिया से विलग करके जीना जानते हैं।
इसीलिए कृष्ण का कोई एक किस्सा, किसी दूसरे किस्से पर निर्भर नहीं है। नंदबाबा के घर मे पलता कन्हैया, पूरी तरह अपने बालसुलभ दृश्यों से कथा को अपने इर्द-गिर्द सम्मोहित कर लेता है। यहाँ बचपन के रस में कृष्ण इतने सराबोर हैं कि वीभत्स शत्रुओं का वध करने के लिए भी बालपना नहीं त्यागते। अपितु उसी सहजता से शत्रु को परास्त करते हैं, ज्यों कोई नवजात स्तनपान कर रहा हो; ज्यों पालने में किलोल करता कोई बालक हाथ-पैर चला रहा हो।
कृष्ण कालिया दाह में भी ‘गेंद’ के पीछे कूदते हैं और किसी अबोध बालक के समान ही भयानक विषधर के फन पर नृत्य करते हुए प्रकट होते हैं। यदि यहाँ बालपन छोड़कर कृष्ण, विजेता बन जाते तो वे कालिया पर नाचते हुए नहीं, बल्कि उसको मारते हुए कालिंदी से बाहर आते। यदि इसी दृश्य में कृष्ण पर्यावरण की चिंता करनेवाले ज्ञानी बन जाते तो उन्हें कालिया से भयभीत होना पड़ता, क्योंकि ज्ञान भय का सहोदर है। लेकिन कृष्ण न तो विजेता के अहंकार से युक्त हुए, न ज्ञानी के भय से… वे तो अबोध बालक के समान भयावह दृश्य में कलरव करते दिखाई देते हैं।
उधर गौवर्द्धन को तर्जनी पर रखनेवाले कृष्ण, एक किशोर होते बालक के समान ही जिज्ञासा से उत्पन्न कौतूहल में वह असंभव कार्य कर लेते हैं, जो अन्य किसी मनोदशा में संभव नहीं है। कैशोर्य के द्वार पर खड़ा बालक, अपने समाज की परंपरा पर प्रश्न उठा सकता है। चूँकि अभी वह आस्था की अनुत्तरित वीथियों में गुम नहीं हुए हैं, इसलिए वे पूजित की उपादेयता पर भी तर्कयुक्त प्रश्न उठा लेते हैं। क्योंकि वे तर्क से उत्पन्न ऊर्जा से संचालित हैं, इसीलिए वे किसी की सत्ता का अंधानुकरण करने के स्थान पर उसके भय को न केवल चुनौती देते हैं, अपितु उसका विकल्प उपस्थित करके उसके अनुयायियों को परंपरा की लीक तोड़ने के लिए तैयार भी कर लेते हैं।
कृष्ण के ये सब किस्से उद्वेग तथा उत्तेजना से दूषित नहीं हैं। इसीलिए कृष्ण ‘माधुर्य’ के अधिपति हैं। कृष्ण की बाँसुरी से लेकर उनके पांचजन्य तक सब मधुर हैं। कृष्ण का तो चक्र भी ‘सुदर्शन’ है। इसी कारण कृष्ण के व्यक्तित्व में प्रेम की अथाह संभावना मिलती है। बालसुलभ शरारतों की तरह माखन चुरानेवाले कृष्ण, इस चोरी के लिए गोपियों के कोप के नहीं, प्रेम के भाजन बनते हैं। प्रेम, कृष्ण के व्यक्तित्व का अद्र्धांग है। प्रेम से गढ़े गए व्यक्तित्व का रास भी स्तुत्य होता है। प्रेम से युक्त मनुष्य अश्लील हो ही नहीं सकता। वह तो पीताम्बर धारण किए किसी योगी की भाँति प्रेम की पावनता का भोग करता है। वह देह की सीमाओं के पार, प्रेम की विदेह सम्पदा का रसिया हो जाता है। क्योंकि वहाँ देह महत्त्वहीन है इसीलिए कृष्ण को स्त्रीवेश बना लेने में भी कोई आपत्ति नहीं होती। वहाँ स्त्री-पुरुष जैसा कुछ है ही नहीं, वहाँ तो कोरा प्रेम है। ऐसा प्रेम, जो होली के अलग-अलग रंगों की तरह एक-दूसरे में ऐसे मिल गए हैं कि सभी रंग अपनी पहचान छोड़कर एक नए रंग की सर्जना कर देते हैं, यही रंग प्रेम का रंग है, यही रंग कृष्ण का रंग है।
प्रेम से सिक्त कृष्ण को देखकर ऐसा लगता है कि अब इस कथा में कुछ शेष नहीं रहा। किन्तु कृष्ण यहीं नहीं रुकते। वे एक झटके में प्रेम का यह कुंजवन त्यागकर कत्र्तव्यपथ पर कदम बढ़ा देते हैं। समान्य बुद्धिवाले लोग कथा के इस बिंदु पर कृष्ण को निर्मोही कह सकते हैं। गोपियों के विरह से विचलित संसारी जीव इस बिंदु पर कृष्ण को क्रूर न कह दें इसीलिए कथाकार ने कृष्ण को गोकुल से मथुरा लिवा लाने के लिए जिसे भेजा है, उसका नाम ‘अक्रूर’ है।
कृष्ण का व्यक्तित्व ‘स्वीकार’ का व्यक्तित्व है। वे मन के विरुद्ध उत्पन्न परिस्थितियों को स्वीकार करने में अग्रणी रहते हैं। इसीलिए वे अपने भूतकाल के बोझ से अपने वर्तमान को प्रभावित नहीं होने देते। इसीलिए कंस का वध करनेवाले कृष्ण, गोकुल के कन्हैया से बिल्कुल अलग दिखाई पड़ते हैं। इसीलिए कंस सरीखे बलवान शासक को मार देनेवाले कृष्ण, कालयवन की छाती पर चढ़कर उसे परास्त नहीं करते, अपितु युगों की पोथियों से खोजकर वह युक्ति निकालते हैं, जिससे शत्रु के वरदान का कवच भेदन किया जा सके। कृष्ण, लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखते हैं किंतु मार्ग को भी निरर्थक नहीं होने देते। वे इस दृश्य में यह संदेश देते हैं कि किसी अपयश से बचने के लिए युद्ध हार जाने से श्रेष्ठ है कि ‘रणछोड़’ बनकर विजय प्राप्त की जाए।
कृष्ण की यही युक्तिसंगत चेतना उन्हें पूर्ण बनाती है। परम्परा से परे रहकर जीने की उनकी यही चेष्टा उन्हें अपराजेय बनाती है। कृष्ण अनप्रेडिक्टेबल हैं। कृष्ण की सोच का कोई मैथड ड्रॉ नहीं किया जा सकता। कृष्ण के एक्शन्स का कोई पैटर्न ड्राफ्ट नहीं किया जा सकता। कृष्ण सोच के ठीक विपरीत कार्य कर सकते हैं। युद्ध के मैदान में गीता बाँचना विश्व में विरोधाभास का उत्कृष्ट उदाहरण है। और गीता भी ऐसी-वैसी नहीं, समय की अजगरी धाराओं पर भी प्रासंगिक बने रहनेवाला अद्वितीय प्रवचन है गीता। गीता को पढ़ो तो आभास होता है कि युद्ध घटित हो सके इसके लिए गीता नहीं गढ़ी गई है, बल्कि गीता उत्सर्जित हो सके, इसके लिए युद्ध गढ़ा गया है। कुरुक्षेत्र की उपलब्धि अर्जुन का शौर्योपयोग नहीं है। कुरुक्षेत्र का प्राप्य युधिष्ठिर का राज्याभिषेक नहीं है। कुरुक्षेत्र का हासिल तो श्रीमद्भागवत गीता है।
सुदर्शन से युक्त होकर भी रथचक्र को अस्त्र बना लेने का कृत्य शत्रु के आत्मविश्वास पर आक्रमण है। कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि सुदर्शन उपलब्ध होने के बावजूद कोई रथ का पहिया उठाकर फेंकने लगेगा। जिस पर आक्रमण हुआ, उसने अपना पूरा अवधान सुदर्शन से बचने पर केंद्रित किया होगा। पहिये से बचने के लिए उसने कोई नीति ही नहीं बनाई होगी।
सुभद्रा विवाह, विदुर के घर भोज, मित्र का सारथी बनने की स्वीकृति… यह सब परंपराओं के विरुद्ध अपने व्यक्तित्व का स्वीकार विराट कर लेना है। कृष्ण अपने ही आचरण के ठीक विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं। युद्ध के उन्माद में अंधे हुए जा रहे पांडवों को टोकते हुए जो कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाते हैं, वही कृष्ण, युद्ध से विरक्त हो रहे अर्जुन को युद्धोन्मुख करते हैं। यह कृष्ण का अपनी बात से पलट जाने जैसा प्रतीत होता है, किंतु इस विरोधाभास में यह स्पष्ट है कि सही और गलत की परिभाषा समय-स्थान-परिस्थितियों के अनुरूप बदलती हैं। जब कृष्ण शांति का संदेश लेकर गए तब युद्ध रोकने के लिए विराट रूप धारण कर लिया। और जब सारथी बनकर कुरुक्षेत्र में आ पहुँचे तब युद्ध करवाने के लिए विराट हो गए। अर्जुन के रण छोड़ देने से कृष्ण के प्रति उनकी मित्रता पर कोई प्रभाव न पड़ता, क्योंकि कृष्ण तो स्वयं रणछोड़ हैं। किन्तु कृष्ण, अर्जुन के माध्यम से समाज का यह विवेक जागृत करना चाहते हैं कि एक्शन का अनुकरण करते समय कारण का संज्ञान न लिया जाए तो कृत्य ढोंग बन जाता है।
…फिलहाल यहीं विराम लेता हूँ। कन्हैया के अनुराग के वशीभूत किसी दिन मेरी मनसुखा सी लेखनी फिर नाची तो इस विषय पर और लिखूँगा।
✍️ चिराग़ जैन

बिरहन की होली

आँखन में कजरा धर राधा ने श्याम के रूप को नैन बसायो
श्याम ने बाँसुरी होंठ लगाय के राधा के होंठों पे साज सजायो
राधा ने श्याम को श्याम ने राधा को होरी की भोरी ही रंग लगायो
देह से देह रही बिरहा पर नेह से नेह नहीं बिसरायो

✍️ चिराग़ जैन

नृत्य : हर्ष का उत्कर्ष

सृष्टि के समस्त नाद की अनूदित कृति है नृत्य। सुर के अनुरूप गति, ताल के अनुरूप थाप, अर्थ के अनुरूप मुद्रा और भाव के अनुरूप भंगिमा; इन सबको एक साथ साधने का कौशल है नृत्य। नर्तक नटराज की प्रतिकृति है। शब्द से भंगिमा तक की यात्रा का सारथी नर्तक है।
देह के एक-एक अंग को अलग-अलग करके एक ही लय ताल में थिरकाना नर्तक का कौशल है। भृकुटि, नेत्र और दृष्टि… तीनों अलग-अलग होकर एक साथ नाचने लगती हैं। अधर, कपोल, ग्रीवा, कंधे, वक्ष, भुजाएँ, कलाई, हथेली, अंगुलियाँ, कटि, नितम्ब, चरण… सब नाचते हैं… विलग किन्तु एकाकार। मन बावरा होकर नाचता है। धरती एड़ी से टकराकर नूपुर में स्वर भरने लगती है।
शेष साज दूर खड़े नर्तक के स्पर्श को तरसते रहते हैं और नूपुर कलाकार के पैर पकड़कर नृत्य का अंग बन जाता है। नूपुर यह संदेश देता है कि आनन्द से एकाकार होना है, तो पैर ही पकड़ने होंगे। यदि पैर न पकड़े जाएँ तो आनन्द के दर्शन सम्भव हैं, स्पर्श नहीं। कृष्ण की बाँसुरी आनन्द उत्पन्न कर सकती है किंतु कृष्ण के नृत्य का अंग नहीं बन सकती। किन्तु मीरा के घुंघरू मीरा के साथ-साथ नाच सकते हैं। क्योंकि बाँसुरी ने अधर चुने और घुंघरुओं ने पग।
नृत्य स्वयं में एक दर्शन है। देह के विदेह होने की झाँकी है। वातावरण में घुल जाने का अनुभव है। मन के भीतर जुट आए उत्स का मूर्त रूप है। झिझक और संकोच से विरक्ति है नृत्य। सहजता का महापर्व है नृत्य। निश्छल हो जाने का उद्घोष है नृत्य। निस्पृह हो जाने की सूचना है नृत्य। आत्मा के अलंकृत और मन के झंकृत हो उठने का पल है नृत्य। हर्ष के उत्कर्ष का अनुवाद है नृत्य। यही कारण है कि जिसने उसे पा लिया, वह नाचने लगा। नाचने के लिए कुछ पा लेने की ख़ुशी; न्यूनतम अर्हता है। मीरा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। राधा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। सूर, कबीर, रैदास, तुलसी… सब नाचते हुए लोग हैं। यहाँ तक कि लंगड़ा मनसुखा भी नाच उठता है। नाचने के लिए देह चाहिए ही नहीं। नृत्य तो मन में घटित होता है, देह तक तो केवल कम्पन पहुँचता है। जैसे धरती के गर्भ में हुई हलचल का कम्पन भर भूकम्प बन जाता है, किन्तु भूकम्प हलचल का कारण नहीं है। कारण तो अदृश्य है। बहुत गहरे, मन की भीतरी परतों में।
यही कारण है कि जब कोई प्रेम में होता है तो मन की इस हलचल का असर चेहरे पर दिखाई देने लगता है। फिर स्वयं प्रेमी भी किसी तरह इस असर को रोक नहीं सकता। हलचल हुई है तो भूकम्प का आना तय है। मन नाच उठा है तो देह का थिरकना अवश्यम्भावी है। इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।
बरसात होती है तो वृक्ष नाचने लगते हैं। बादल घिरते हैं तो पवन की थिरकन दिखाई देती है। समुद्र लहर-लहर नाचता है, झीलें, नदियाँ… सब नृत्यमय हैं। मरुस्थल भी नाचता है। पर्वत जड़ होकर भी वादियों में नृत्य करता प्रतीत होता है। झरने गाते हुए नाचते हैं। इन सबका नाचना ही प्रकृति के स्वास्थ्य का द्योतक है। रुग्ण व्यक्ति नाच नहीं सकता।
नाचने के लिए स्वस्थ होना ही पड़ेगा और स्वस्थ बने रहने के लिए नाचना ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

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