Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
पिछले दो-तीन दिनों से पुलिस और जनता के मध्य के संबंधों की जैसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं, उनसे हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था के चेहरे पर ग्रहण लग रहा है।
किसी सभ्य तथा विकासोन्मुखी व्यवस्था में पुलिस और जनता के मध्य परस्पर विश्वास का सम्बंध होता है। दोनों एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो समाज के दो पैरों की भूमिका निबाहते प्रतीत होते हैं।
एक पैर जब दूसरे पैर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा होता है तब वह दरअस्ल दूसरे पैर के आगे आने का रास्ता बना रहा होता है। इसी समन्वय पर समाज ‘चलता’ है।
किन्तु ये दोनों पैर यदि आपस में उलझना प्रारंभ कर दें तो समाज को लड़खड़ाने से कोई नहीं बचा सकता।
ये दोनों ही पैर एक दूसरे के इतने समीप रहते हैं कि चलने की प्रक्रिया में इनमें परस्पर घर्षण की घटनाएँ स्वाभाविक हैं।
ट्रैफिक पुलिस के जवानों के साथ होनेवाली झड़पें, पैट्रोलिंग करते जवानों के साथ होनेवाली कहासुनी, किसी पुलिसकर्मी के भ्रष्टाचार की वीडियो और ऐसी ही अन्य जो दुर्घटनाएं सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं, वे इसी घर्षण का प्रमाण हैं।
विपरीत परिस्थितियों में अधिकारियों की डाँट, पारिवारिक चुनौतियों, नकारात्मक परिवेश और प्रोटोकॉल के दायित्व निबाहते हुए पब्लिक के बीच ड्यूटी करते पुलिसवालों की मनोदशा में चिड़चिड़ापन शुमार होना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर अपनी किसी तात्कालिक समस्या से त्रस्त नागरिक का बिलखते हुए, भन्नाए हुए, अकड़ते हुए या चिल्लाते हुए थाने आना भी स्वाभाविक है।
यहाँ तक नागरिकों और पुलिस के मध्य के संबंधों में कुछ नया नहीं है। लेकिन 19 जुलाई 2026 के बाद से दिल्ली में छात्र-आंदोलनस्थल से दोनों ओर की जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं वे स्वाभाविक नहीं हैं।
सोशल मीडिया, पुलिस को क्रूर सिद्ध करने पर उतारू है और मेन स्ट्रीम मीडिया, आंदोलनकारियों को गुंडा बताने पर तुला है।
हिंसा कहीं से भी शुरू हो, वह समाज के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकती। पुलिसकर्मियों की लाठी से पिटकर बिलखते-चिल्लाते युवा भी समाज के भविष्य के लिए प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं और आंदोलनकारियों की भीड़ में फंसकर हांफता हुआ पुलिसकर्मी भी सामाजिक सौहार्द की सबसे कमज़ोर गाँठ को स्पर्श कर चुका है।
आंदोलन को लेकर सरकार की अपनी कुछ रणनीति हो सकती है। आंदोलन को लेकर विपक्ष की भी अपनी सोच हो सकती है। विधायिका और राजनीति को सड़कों पर उतरे इस जनसमूह को राजद्रोही घोषित करना है या जागरूक नागरिक -यह सियासत का विषय है लेकिन इस सियासी शतरंज में यदि समाज हार गया तो दो बादशाहों को जिताने के लिए बाइस मोहरे कुर्बान हो जाएंगे।
आंदोलन लोकतंत्र का फ्यूल पंप है। यहाँ से पाथेय लेकर लोकतंत्र जनहित की राह पर तेज़ी से दौड़ता है। आंदोलन के फ्यूल की माइलेज हर बार गाड़ी की क्वालिटी के अनुरूप बदल सकती है।
लेकिन ईंधन भरवाते समय पेट्रोल टैंक का फटना ख़तरनाक है। इसलिए पुलिस और जनता दोनों को ही स्मरण रखना होगा कि अराजकता की राह पर बढ़ा एक भी कदम समाज को गहरे अंधकार में धकेल देगा।
आंदोलनकारियों को षड्यंत्रकारी, राष्ट्रद्रोही, धर्मविरोधी, ग़द्दार और आतंकवादी कहना सरकारों की प्रवृत्ति रही है। आपातकाल के दौरान सत्ता के आलोचकों पर ‘राजद्रोह’ के चार्ज लगे। विपक्ष तो विपक्ष, विपक्ष की विचारधारा तक को समर्थन देनेवाले जेलों में भर दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने अधिकारों की मांग करनेवाले ‘दंगाई’, ‘उपद्रवी’ और ‘अपराधी’ घोषित किए गए। अन्ना आंदोलन और बाबा रामदेव के धरने के प्रति सत्ता का नज़रिया अभी स्मृतियों से ग़ायब नहीं हुआ है। किसान आंदोलन, खिलाड़ियों के धरने और मजदूरों के आंदोलन के प्रति सरकारी नीतियों के ज़ख़्म तो अभी तक हरे हैं।
इसलिए किसी भी जन आंदोलन का समर्थन करो या विरोध… यह ध्यान रहे कि आपका निर्णय किसी लामबंद मीडिया, किसी राजनैतिक दल अथवा किसी विचारधारा के influence से प्रभावित न हो।
और आंदोलनस्थल पर खड़े हर आंदोलनकारी को और हर सुरक्षाकर्मी को यह याद रखना चाहिए कि सरकार पराई हो सकती है; षड्यंत्र विदेशी हो सकते हैं; लेकिन देश आपका अपना है।
✍️ चिराग़ जैन
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20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र की मनोदशा का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है। जून 2026 में आरंभ हुए कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को जनता का कितना समर्थन मिला, कितना नहीं मिला -यह सही-सही कह पाना तो मेरे लिए संभव नहीं है। किन्तु सोनम वांगचुक को धरनास्थल से उठाए जाने की घटना ने जनता को कितना उद्वेलित किया, यह पूरी दुनिया ने साफ-साफ देखा।
जिस युवापीढ़ी में लोकप्रिय होने की होड़, पूरी दुनिया की राजनीति का प्रमुख लक्ष्य बन चुका है, उसी युवापीढ़ी की आवाज़ को अनसुना करने की भूल राजनीति को नहीं करनी चाहिए थी। स्कूल-कॉलेजों में पढ़नेवाली जिन ऊर्जारश्मियों के बूते देश की आंखों में भविष्य के स्वप्न झिलमिलाते हैं, उन्हीं पर आंसूगैस के गोले छोड़ते समय प्रशासन की कोरें भीग जानी चाहिए थीं।
जिन सुकोमल पीढ़ियों को पोषित करके देश को अपने बुढ़ापे की लाठी तैयार करनी थी, उन्हीं पर लाठीचार्ज करते हुए प्रशासन की टांगें कांप जानी चाहिए थीं।
सोशल मीडिया के वीडियो गवाह हैं कि जब नीली वर्दीधारी पांच-छह सशस्त्र जवान अभद्रभाषा बोलते हुए एक अकेले नौजवान पर बलप्रयोग कर रहे थे, तब उस नौजवान ने प्रतिहिंसा नहीं की। उल्टे उसने गांधी की राह पकड़ी और सचमुच दूसरा गाल आगे करके उन लाठी बरसानेवालों को शर्मिंदा कर दिया। यह दृश्य गवाह है कि गांधी इस देश की शिराओं में आज भी ज़िन्दा हैं।
20 जुलाई 2026 के तमाम दृश्यों को आप ध्यान से देखेंगे तो आपको पुलिस की आंखों में आंखें डालकर चुनौती देते हुए ‘भगतसिंह’ दिखाई देंगे। 20 जुलाई 2026 के वीडियो दोबारा खंगालेंगे तो आपको वह भारत फिर से दिखाई देगा, जो किसी भी तरह के अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना अपना नैतिक कर्तव्य समझता है।
20 जुलाई 2026 को क्नॉट प्लेस की सड़कों ने लाला लाजपतराय को भी याद किया और बटुकेश्वर दत्त को भी। चीत्कार के स्वर में पुलिसवालों को लताड़ती लक्ष्मीबाई भी दिखीं। ‘हम क्या आपके बच्चे नहीं हैं’ -बिलखकर ऐसे मासूम प्रश्नों से पुलिस की वर्दी में खड़ी महिलाओं को नज़रें छुपाने पर विवश करती बेटियां भी दिखीं।
दुनिया ने चाहे जो कुछ देखा हो, लेकिन बर्बर प्रशासनिक आदेशों का पालन करने पर विवश पुलिसकर्मियों के चेहरे पर अनेक बार मुझे मनुष्यता के पदचिन्ह दिखे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन देश के लिए इन अर्थों में भी विशेष था कि इसमें आनेवाले किसी भी ‘स्टार’को कल अपने-आपको अपनी ख़ुद की नज़रों में स्टार बनाए रखने के लिए उन हज़ारों-लाखों ‘ट्विंकल लिटिल स्टारों’ की ज़रूरत थी, जो जंतर-मंतर पर पुलिस की लाठियां और झिड़कियां खा रहे थे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन मेरे लिए इसलिए पूर्ण सफल है कि युवा पीढ़ी का नाम आते ही अराजकता की आशंका जतानेवाले प्रशासन के पास कल इस पीढ़ी को अराजक सिद्ध करने का कोई उपाय न मिल सका। न कोई नेता, न कोई संगठन, न कोई स्पांसर, न कोई व्यवस्था… केवल एक जुनून। केवल एक जज़्बा। केवल एक अपनत्व। केवल एक देश।
जब-जब सत्ता ने विरोध के स्वर को दुश्मन मानने की भूल की है, तब-तब जनता को सड़क की राह पकड़नी पड़ी है। मैं इस देश का एक नागरिक होने के नाते अपनी विधायिका से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि यह जनता आपको प्यार करती है, इसीलिए अपने भविष्य का नियामन आपके हाथों में सौंपकर निश्चिंत होना चाहती है। सब जानते हैं कि ये देश बहुत बड़ा है। सब जानते हैं कि डेढ़ सौ करोड़ लोगों के भविष्य की नीतियां बनाने में आपसे कुछ चूक हो सकती है।
इस चूक की ओर ध्यान आकृष्ट करने के जनप्रयासों को कान देकर सुनने की ज़रूरत है। विरोध के स्वर कर्कश ज़रूर होते हैं लेकिन उनके अंत से सौहार्द और समर्थन का महानाद खोज लेनेवाला ही महानायक होता है।
✍️ चिराग़ जैन
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मंथरा के कदाचार से राम की अयोध्या तब तक पतित नहीं हो सकती, जब तक राम अपना चरित्र छोड़कर मंथरा के स्तर तक उतरना स्वीकार न कर लें। यदि राम विनम्रता त्यागकर प्रतिशोध का मार्ग अपनाते तो अयोध्या को कुरुक्षेत्र बनने में देर न लगती।
जब दशरथ दुलार रहे हों तब राम जैसा आचरण करना कोई बड़ी बात नहीं है, किंतु जब कैकेयी वनवास जाने का आदेश दे तब राम बने रहना ही राम को पुरुषोत्तम बनाता है।
उस दिन श्रीराम के सम्मुख अनेक विकल्प थे। वे राजसभा के सम्मुख पिता के विवश निर्णय को लोकतांत्रिक चुनौती दे सकते थे। वे अपने पीछे चले आए नागरिकों के समर्थन की आड़ में सिंहासन पर दावा कर सकते थे। वे क्षात्रधर्म का पालन करते हुए वन की ओर न जाकर, युद्धभूमि में खड़े हो सकते थे।
लेकिन राम ने इनमें से कोई विकल्प नहीं चुना। उस दिन पूरे परिवार का भविष्य राम की भंगिमाओं की ओर देख रहा था। राम ने स्वार्थ की विषबेल को सींचने के स्थान पर अपने-आपको खाद बनाकर अयोध्या की मिट्टी में स्नेह बो दिया।
राम ने उस दिन अपने आचरण से यह सुनिश्चित कर दिया था कि जिन दो भाइयों में घृणा बोने का कुचक्र मंथरा ने रचा था, उनके भीतर लहलहाती अपनत्व की फसल पूरी सृष्टि देखेगी। राम ने उस दिन यह तय कर दिया था कि लोभ की नागफनियों को भी यदि त्याग के पानी से सींचा जाए तो कांटों की छाती में भी दूध उतर आता है।
कथा तो त्रेता में भी बनी थी। अच्छी-बुरी घटनाओं की ख़बर तो बिना पैरों के दुनिया भर में फैल ही जाती है। लेकिन रामजी ने अपनी भाव-भंगिमाओं को क्षोभ और विषाद से अक्षुण्ण रखा। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि अयोध्या पर कोई कलंक न लगा। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि कुचक्र रचनेवाले चरित्रों को भी हृदय परिवर्तन का अवसर मिल सका। अन्यथा प्रतिकार से जूझने में भीतर के अपनत्व के स्रोत सूख जाते और कैकेयी मैया कभी प्रायश्चित के सरोवर में स्नान करके शुद्ध न हुई होतीं।
इस बार स्थिति थोड़ी विचित्र है। घटना अयोध्या में घटी है, लेकिन प्रसंग अरण्य काण्ड का है। इस बार किसी मंथरा ने कोई कुचक्र नहीं रचा है। बल्कि रावण और मारीच जैसे मायावी चरित्रों ने वेश बदलकर रामजी की कुटिया से चोरी करने का पाप किया है। और त्रेता हो या कलयुग। राम के घर से चोरी करनेवाले चरित्रों की कुंडली में मारकेश सक्रिय हो जाते हैं।
अयोध्या में विवाद परिवार के भीतर पनप रहा था, इसलिए रामजी ने स्वयं को समिधा बनाना स्वीकार कर लिया। लेकिन पंचवटी में पाखण्ड ने घर पर आक्रमण किया था, इसलिए उसका समूल नाश आवश्यक था।
इन रावणों को पापाचरण से रोकने के लिए जिन जटायुओं के पर काटे गए, उनकी गवाही से पंचवटी बदनाम नहीं होती, बल्कि रावण के पाखण्ड पर से पर्दा उठता है।
एक बात तय है, जब भी कोई रामजी के घर चोरी करेगा तो सोने-चांदी के आभूषण धरती पर फेंककर सीता मैया रामजी को चोर का पता बता ही देंगी।
इस रामायण में कौन सुग्रीव की भूमिका निभाएगा और कौन कालनेमि बनेगा, यह तो भविष्य ही तय करेगा। लेकिन यह सुनिश्चित है कि रामजी के घर में चोरी करनेवाला पाखण्डी चाहे कितना ही बड़ा लंकापति क्यों न हो, उसने अपने विनाश के पथ पर कदम बढ़ा दिया है।
✍️ चिराग़ जैन
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विश्व भर में भावुकता और संवेदना की मिसाल कहा जानेवाला देश आज राजनैतिक वर्चस्व की अंधी होड़ में संवेदना जैसे शब्दों को कितना बेमआनी कर चुका है, इसका आभास होने तक संभवतः हमारे पास पश्चाताप के लिए आंसू तक नहीं बचेंगे।
हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर नौनिहालों को बलिदान करनेवाले चरित्र कंस और हिरण्यकश्यप जैसी कुख्याति को प्राप्त करते हैं। लेकिन जिस दौर में निगेटिव पब्लिसिटी को भी सुर्ख़ियों में बने रहने का हथकण्डा समझा जाने लगा हो, वहां बेचारी संस्कृति की पुस्तक पलटने की फ़ुरसत किसके पास बची है!
यह सत्य है कि लखनऊ की आग न तो सत्ता ने लगाई है, न ही विपक्ष ने। लेकिन यह भी सत्य है कि राजनीति ने हमारी संवेदना को इतना भौंथरा तो कर ही दिया है कि हम चौदह-पन्द्रह परिवारों की चौखट पर पसरे अंधेरे पर कोई टिप्पणी करने से पहले यह सोच रहे हैं कि इससे सत्ता को क्या नुकसान होगा और विपक्ष को क्या लाभ होगा। हम मानवता की मर्यादा रेखा से इतनी दूर तो आ ही गए हैं कि बड़े से बड़े दुर्भाग्य की ख़बर सुनकर हमारे समाचार चैनल यह विचार करने लगते हैं कि जिस इमारत में आग लगी है उसे कोचिंग सेंटर की बजाय गेमज़ोन कहने से ख़बर की लपटों को किस दिशा में मोड़ना संभव हो सकेगा।
यह एक सत्य है कि ‘हादसे बोलकर नहीं आते’ लेकिन यह भी सत्य है कि यदि प्रशासन हादसे से उपजे क्रोध को डाइल्यूट करने की बजाय वास्तव में समाधानोन्मुखी कदम उठाती तो आज़ादी के आठवें दशक में भी हम अनाधिकृत निर्माण और विभागीय भ्रष्टाचार के कारण निर्दोष युवक-युवतियों के झुलसे हुए जिस्म देखने पर विवश न हुए होते।
परीक्षाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और विभागीय लापरवाही से हताश जिन बालकों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए हैं, वे दरअस्ल हमारी व्यवस्था के मुंह पर यह प्रश्नचिन्ह तो छोड़ ही गए हैं कि इस हताशा का असली दोषी कौन है कि एक बालक अपने सिस्टम से सवाल पूछने की बजाय, अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेना ज़्यादा आसान समझ रहा है। हो सकता है कि अत्याचार के आगे अपना मुंह बंद करने से अधिक आसान जान पड़ा हो अपनी आंखें बंद कर लेना।
कल उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री को लखनऊ के घटनास्थल के बाहर मीडिया को बाइट देते देखा। महसूस हुआ कि उनका गला भर्रा गया था। महसूस हुआ कि उनकी आंखों की कोरें भीग गई थीं। बस उसी एक बाइट को देखकर मेरे भीतर के नैराश्य में आशा की किरण जगती है। लेकिन इसके तुरंत बाद ज्यों ही मीडिया कवरेज देखी तो ऐसा लगा जैसे हमने संवेदना की तमाम उम्मीदों को नेस्तोनाबूद करने का प्रण ले लिया है।
प्रश्न यह नहीं है कि सत्तर साल किसका शासन था और बारह साल से कौन गद्दी पर बैठा है। प्रश्न यह है कि दिल्ली में तोड़े जा रहे अनधिकृत निर्माण पर व्यवस्था को कोसनेवाले अराजक नागरिकों को लखनऊ की दुर्घटना पर अनधिकृत निर्माण के लिए सरकार को उत्तरदायी ठहराने का अधिकार कैसे मिल सकता है?
प्रश्न यह है कि यदि अलीगंज की उस इमारत के लिए अधिकारियों पर सख़्त कार्रवाई की मांग की जा सकती है तो चांदनी चौक और करोलबाग़ की इमारतों का हिसाब-किताब करने पर हंगामा क्यों मचाया जाता है।
दरअस्ल समस्या के समाधान पर किसी का ध्यान है ही नहीं। सत्ता हो या विपक्ष, किसी भी घटना या दुर्घटना पर उनके मन में केवल एक प्रश्न कौंधता है कि इस घटना को भुनाकर पब्लिक सेंटीमेंट्स अपने पक्ष में कैसे किये जाएं। पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में सिर पर लटकते बिजली के तार हटाने तक का साहस जिस व्यवस्था में नहीं है, वह बुलडोजर और त्वरित न्याय की बात करती अच्छी नहीं लगती।
जब कभी यह प्रश्न उठता है, तब बेशक सरकारी विभाग कुछ छज्जे तोड़कर, कुछ इमारतें गिराकर अपनी गंभीरता का विज्ञापन करने लगते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि जिस अधिकारी के कार्यकाल में वह इमारत बनकर तैयार हुई, जिस-जिस अधिकारी के हस्ताक्षर से उसका बिजली-पानी का कनेक्शन पास हुआ। जिस-जिस अधिकारी ने उसकी हाउस-टैक्स की रसीदों पर हस्ताक्षर किए, उन सब पर हत्या के मुकदमे चलाने का प्रवधान नहीं होगा तो यह व्यवस्था कभी नहीं सुधरेगी।
मैं किसी भाजपा या किसी कांग्रेस का समर्थन या विरोध करके अपने आंसुओं का अपमान नहीं करना चाहता। मैं यह भी नहीं चाहता कि अमानवीय भ्रष्ट आचरण को किसी भी तरह की अराजकता के हाथों सौंप दिया जाए। मैं केवल इतना चाहता हूं कि जिन संभावनाओं को कल अलीगंज की इन लपटों ने लील लिया है, उन्हें हम श्रद्धांजलि न दें, बल्कि यह आश्वस्ति दें कि ‘प्यारे बच्चो! जब भी इस देश में व्यवस्था-सुधार के तात्कालिक कारणों पर चर्चा होगी, तब तुम सबके झुलसे हुए चेहरे सूरज की तरह चमक उठेंगे।’
चिराग़ जैन
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हम हास्य को लेकर बेहद संवेदनशील दौर से गुज़र रहे हैं। एक तरफ वे लोग हैं जो स्वस्थ, पारंपरिक, पारिवारिक और सामाजिक ठट्ठे को भी ‘जातीय अपमान’, ‘आस्थाओं पर प्रहार’ तथा ‘राष्ट्र्रद्रोह’ सिद्ध करने पर तुला है। जो परिहास को भी ‘उपहास’ और ‘अपमान’ सिद्ध करने के षड्यंत्र रच रहा है, दूसरी ओर वे लोग हैं जो निरी अश्लीलता और वैभत्स्य को ‘हास्य’ घोषित कर देना चाहता है।
हमारी संस्कृति में उल्लास और उत्सव में देवी-देवताओं और यहां तक कि ईश्वर को भी सहभागी माना जाता है। परिवार के बड़े-बूढ़ों से लेकर बालकों तक सबके लिए परिहास तथा हंसी-ठट्ठा हमारे उत्सव-टेलों में सम्मिलित होता है। शादी-ब्याह में गाई जानेवाली ‘गारी’ और रतजगों में होनेवाला परिहास हमारी लोकसंस्कृति में रचे-बसे हास्यबोध का परिचायक है।
यही कारण है कि हमारी संस्कृति दुनिया की उन गिनी-चुनी संस्कृतियों में से एक है जिनके यहां हंसता हुआ ईश्वर उपलब्ध है। हमारे पौराणिक साहित्य में हास्य-विनोद के अनेक प्रसंग इस बात का प्रमाण हैं कि हंसने से ईश्वर अपमान नहीं होता, बल्कि अपनत्व बढ़ता है।
ऐसा नहीं है कि हंसने से अपमान हो नहीं सकता। और ऐसा भी नहीं है कि गंभीर रहनेवाला व्यक्ति जो करता है वह सम्मान ही है। यह सब धारणा पर निर्भर करता है। शिशुपाल गाम्भीर्य ओढ़कर भी नारायण का अपमान करने का प्रयास करता रहा। दुर्योधन हंसते हुए भी पाण्डवों के विरुद्ध लाक्षागृह का षड्यंत्र रच रहा था। कर्ण स्मितहीन जीवन जीकर भी द्रोण से लेकर कुंती तक पर व्यंग्यबाण छोड़ता रहा और राम, मुस्कुराते हुए अनेकानेक कष्टों से होकर गुज़र गए।
हंसना-मुस्कुराना अपराध है यह भी आधी-अधूरी विवेचना है और गाम्भीर्य शालीनता है, यह भी अर्द्धसत्य ही है।
जो मुस्कान सहजता में अभिवादन के काम आती है, विरोध में वही मुस्कान कटाक्ष बन जाती है। ऐसे में मुस्कान से धारणा का निर्णय करना बेहद बचकाना है।
महाभारत में मयसभा में सुयोधन को जो भ्रम हुआ था वह विशुद्ध हास्य का प्रसंग था। पानी और धरती में भेद न कर पाने के कारण सुयोधन जो आचरण कर रहे थे, उसे देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हंस रहे थे। इस क्षण पांचाली ने हास्य की मर्यादा लांघकर जो कटाक्ष किया वह हास्य करनेवाले के लिए मर्यादा का श्रेष्ठ उदाहरण है तथा उस समय सुयोधन के मन में प्रतिशोध की जो अग्नि भड़की, वह हास्य-बोध न समझनेवालों के लिए सबक जैसा है।
यही नहीं महाभारत में ही विराटनगर के युवराज ‘उत्तर’ और वृहन्नला के मध्य हुआ संवाद हास्य की छटा प्रस्तुत करता है। नारदमुनि को कामदेवव पर विजय पाने के लिए ‘हरिमुख’ के नाम पर ‘वानरमुख’ देनेवाले नारायण ने परिहास से परहेज नहीं किया। शिवपुराण में भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए विवश करनेवाली मोहिनी का प्रकरण हास्यरस का प्रसंग है। हरिवंशपुराण में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं में प्रचुर हास्य मिलता है। रामचरितमानस में जिस चातुर्य से हनुमान सुरसा को परास्त करते हैं, अशोक वाटिका में किलोल करते हैं… वह सब हास्य की ही श्रेणी में आता है। पंचवटी में शूर्पणखा का प्रसंग, लंका में कुम्भकर्ण का वर्णन तथा ऐसे ही अनेक प्रसंगों में हास्य की छटा दिखाई देती है। हमारी लोक-कहावतों तथा मुहावरों में भी पौराणिक संदर्भों के पर्याप्त उद्धरण मिलते हैं।
इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारी संस्कृति में हास्य को अछूत नहीं माना गया है। किंतु यह भी जानना आवश्यक है कि शस्त्र कौन सा चलाया गया से अधिक महत्वपूर्ण है कि शस्त्र किस विचार से चलाया गया।
धर्म का अपमान उन्होंने नहीं किया जिन्होंने अपने पूजितों को अपने उत्सवों में सम्मिलित किया। धर्म का अपमान उन्होंने किया है जिन्होंने अपने ईश्वर के नाम पर घृणा और विद्वेष बोने के कुचक्र रचे।
हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह जब चाहे अपने सम्मुख खड़े शिशुपाल की गर्दन उतार सकता है। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह घृणित समझे गए गिद्ध के प्रति भी कृतज्ञ होने से नहीं कतराता। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह लंका में रहनेवाले रावण और विभीषण की सोच के अंतर को समझ सकता है।
इसलिए ईश्वर की चिंता के नाम पर समाज में घृणा फैलाना छोड़ो। ईश्वर अपने समाज को हंसता-खेलता देखकर प्रसन्न होता है। लड़ता-भिड़ता देखकर तो उसे भी कष्ट ही होता है। इसलिए धर्म की रक्षा के नाम पर समाज को घृणा की अंधी खोह में धकेलनेवाले भी उतने ही पापी हैं जितने हास्य के नाम पर पैशाचिक वैभत्स्य तक उतरनेवाले लोग पापी हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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पहले लाफ्टर चैम्पियन जैसे कार्यक्रम आए, उनमें कभी-कभी द्विअर्थी बातें सुनाई देती थीं। समाज के एक तबके ने मंच पर द्विअर्थी संवादों का प्रतिकार किया। लेकिन कुछ लोगों ने इस प्रतिकार को पुरातनवादी सोच कहा और द्विअर्थी संवाद समाज में मान्य हो गए।
प्रतिकार करनेवाले स्वरों को मौन कर दिया गया और समाज शालीनता के धरातल से एक सीढ़ी नीचे उतर गया।
मुझे ऐसा लगता है कि जिन शब्दों को ‘गाली’ कहा जाता है, उनका सार्वजानिक प्रयोग भी इसी तरह ‘सामान्य’ की श्रेणी में आया होगा।
अभद्रता हमेशा नैतिकता से नीचे रही है, वह समाज से समन्वय बैठाने के लिए कभी ऊपर नहीं आ सकती। यदि कोई अभद्रता समाज में सामान्य दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि समाज ही अपने स्तर से नीचे उतर गया होगा।
पहले हम अपरिचितों के सामने गाली देते थे, फिर हम परिचितों के सामने गाली देने में निःसंकोच हुए। फिर हमने काम-धंधे और नौकरी-पेशे में अपने अधीनस्थ को गाली देना सामान्य कर दिया। फिर हम ग्राहकों को गाली देने लगे। फिर गालियां हमारा तकियाकलाम बन गईं। फिर हम गाली को परिवारवालों के सामने उच्चारने लगे। अब स्थिति ऐसी हो गई है कि कोई ‘गाली’ की शिकायत करने जाए तो लोग समझाते हैं, ‘अबे, ये गाली नहीं होती। ये तो आजकल नाॅर्मल है।’
यही कॉमेडी में बढ़ी अश्लीलता के साथ हुआ। पहले द्विअर्थी संवादों को मान्यता मिली। फिर असंसदीय भाषा ‘सामान्य’ समझी जाने लगी। फिर ‘AIB’ जैसे कार्यक्रमों में सितारों ने अभद्रता की तात्कालिक सीमाएं लांघीं। कॉर्पोरेट culture के युवाओं को यह आचरण अच्छा लगा। स्वतंत्रता और निरंकुशता के मध्य का भेद भूल चुकी पीढ़ी इस आचरण का अनुकरण करने लगी।
फिर TV पर Bigboss और stand up comedy के कार्यक्रम रोज़ अश्लीलता की दलदल में एक सीढ़ी उतरने लगे।
पिछले कुछ वर्षों से stand up comedy के live show शुरू हुए। इनमें प्रस्तुति देनेवाले कॉमेडियन Social Hypocrisy के कपड़े उतारने के प्रयास में ख़ुद नंगे होते चले गए।
पाखण्ड के चेहरे बेनक़ाब हुए तो युवा पीढ़ी किसी हल्के लोहे की तरह इन चुम्बकों से जा चिपकी। चूँकि गालियों को समाज पहले ही सामान्य मान चुका था, इसलिए युवाओं को इन comedians के मुँह से दूसरों के लिए गाली निकलना सामान्य लगा।
जब मंच की मर्यादा और भाषाई भद्रता के बंधन से मुक्त होकर किसी के भी विषय में कुछ भी बोलना लोकप्रिय होने लगा तो लाखों रुपये के पैकेज छोड़कर युवाओं ने ख़ुद को stand up comedian बनाना शुरू कर दिया।
जो लोग इस क्षेत्र में सफल हुए उनका बौद्धिक स्तर और observation लाजवाब है, यह मैं स्वीकार करता हूँ। लेकिन ज्यों-ज्यों इस क्षेत्र में competition बढ़ा, त्यों-त्यों इन comedians पर रोज़ कुछ नया, कुछ हटकर करने का दबाव बनने लगा।
इस दबाव के चलते किसी ने अपनी ही audience को गाली देकर लोगों को हँसाया। तो किसी ने बकायदा किसी को point out करके उसकी Hypocrisy का भौंडा मज़ाक किया।
इधर social media पर negative publicity को भी viral होने का tool मान चुकी पीढ़ी, अपने इस व्यक्तिगत अपमान को सौभाग्य मानने लगी।
कुछ नया करने का दबाव बढ़ता जा रहा था और अश्लीलता और बदतमीज़ी की कीचड़ में और गहरे उतरते comedians का हर style एफिल टॉवर की तरह एक ही viral वीडियो की बदौलत, झटपट common होता गया।
उठने की सीमा होती है, पर गिरने की कोई सीमा नहीं होती। इसीलिए ख़ुद को witty कहकर celebrity बने comedians को scripted instant content पर उतरना पड़ा। सामने बैठी ऑडियंस में paid लोग बैठाए गए, जिन्हें बेइज़्ज़ती कराने के पैसे मिलते थे।
यहाँ से होड़ लगी paid audience के पतन की। किसी ने अपने भाई को अपमानित किया तो किसी ने अपने माँ-बाप को। कोई अपनी सोच का मखौल बनवाने को तैयार हो गया तो कोई अपने profession की गरिमा को बेच आया।
जब गर्दन तक कीचड़ में उतर चुके इस profession के पास बेचने को कुछ नहीं बचा तो इन्होंने संबंधों की गोपनीयता बेची। कीचड़ नाक तक आ गई। जब यह भी कॉमन हो गया तो इस समाज ने उस व्यक्ति की लाश भी फूहड़ता की इस भट्ठी में झोंक दी, जिसने अपनी मृत्यु तक समाज को ‘दान’ कर दी थी।
अब ये लोग आमूलचूल कीचड़ में स्नान करके नंगे खड़े हो गए हैं। जिस लोक ने इनके हाथों पर मिट्टी लगी देखकर इन्हें प्रजापति समझ लिया था, उसी लोक की लाज का ऐसा हश्र इनके हाथों किया जाएगा, ऐसा अनुमान समाज को नहीं था।
हास्य पूजन जैसा पवित्र है। हँसी मनुष्य को बेहतर मनुष्य बना सकती है… ये बात समाज को बतानेवाले लोग ‘हँसी’ के साथ ‘मर्यादित’ विशेषण लगाना भूल गए थे।
बंदर उस्तरा लेकर आया और तुम उससे दाढ़ी बनवाने बैठ गए… अब बाल के साथ गाल भी कट रहे हैं। इससे पहले कि टेंटुए से ख़ून बह निकले, इन बन्दरों के हाथ से उस्तरा छीन लो!
✍️ चिराग़ जैन