अयोध्या
शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी
नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी
मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी
या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Purushottam
शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी
नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी
मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी
या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण का अवधी में अनुवाद करके रामचरितमानस लिखी। संस्कृत विद्वानों ने ‘कट्टर संस्कृतभाषी’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप में मानस को संस्कृत के लिए संकट घोषित करते हुए फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर तुलसी विरोध की फौज तैयार कर ली।
मानस अनपढ़ों का ग्रन्थ है, तुलसी की जाति का पता नहीं है, तुलसी अनपढ़ है, तुलसी भिखमंगा है जैसे मेन्युपुलेटिड तथ्यों से शुरू होकर तुलसी मुग़लो का चमचा है, तुलसी विदेशी फंडिंग से देशविरोधी गतिविधियाँ करता है, तुलसी खानखाना का दोस्त है, तुलसी हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान कर रहा है, तुलसी का असली नाम तुफ़ैल खान है, तुलसी मुफ्त का चन्दन घिसता रहता है – जैसे आधारहीन विवादों तक तुलसी का विरोध हुआ। टेक्स्ट, पोस्टर, फ़ोटो, वीडियो और ऑडियो जैसे हर माध्यम से व्यवस्थित रूप से मानस और तुलसी का विरोध किया गया। कई दिन तक हंगामा चलता रहा और कई लोगों ने तुलसी को ब्लॉक कर दिया।
बाद में कट्टर संस्कृतभाषी लोगों ने अपने यूट्यूब चौनल पर व्यूज़ बढ़ाने के लिए थम्बनेल बनाया, जिस पर लिखा था – ‘ऐसी रामकथा आपने पहले नहीं सुनी होगी – हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
दीवानेपन में दुनिया के सफहे मोड़ गए हैं यार
आशिक अपने नाख़ूनों से पर्वत तोड़ गए हैं यार
ख़ाक़ कहेगा कोई अब इस महफ़िल में कुछ बात नई
तुलसी, मीर, कबीर सभी कुछ लिख कर छोड़ गए हैं यार
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मौन लम्हों को पकड़कर शब्द में साकार करना
भावसागर से अमिय का घट जुटाने-सा कठिन है
कल्पना में कौंधते लाखों विचारों से उलझना
इक उफनती बाढ़ को काबू में लाने-सा कठिन है
राम का दुःख तब कहा जब रह गए तुलसी अकेले
मेघदूतम् के रचयिता ने विरह के कष्ट झेले
कृष्ण की इक बावरी ने विष पिया जीवन गँवाया
सूर के अंधियार में ही रौशनी के खेल खेले
अनुभवों की देह छूकर, शब्द में जीवन पिरोना
साँस से अहसास की क़ीमत चुकाने सा कठिन है
दूसरों को बाँट कर देखो कभी अपना उजाला
क्यों कबीरा ने लुकाठी से घरौंदा फूँक डाला
सीकरी की भेंट ठुकराना निरी दीवानगी है
प्राण से प्यारी सुता खोकर बना कोई निराला
आँसुओं को आँख में ही रोक कर स्याही बनाना
धमनियों में वर्णमाला को बहाने-सा कठिन है
सो गया शहरे-अवध में रोते-रोते मीर कोई
फै़ज़ होने के लिए पहने रहा ज़ंजीर कोई
गै़र मुमकिन है बिना अनुभव के वारिस शाह होना
उस बशर ने खोई होगी ज़िन्दगी में हीर कोई
ज़ख़्म की हर टीस को दिलचस्प-सा क़िस्सा बनाना
चोट खाकर महफ़िलों में खिलखिलाने-सा कठिन है
गीत लिखकर गीत ऋषियों ने असीमित दर्द ढाँपा
शायरों को इल्म है किस शाख़ पर कब फूल काँपा
जेल की दीवार पर अशआर हिम्मत से लिखे पर
पुत्र के सिर का कलेवा कर नहीं पाया बुढ़ापा
भाव, पारे की तरह छूने नहीं देता स्वयं को
काव्य रचना ओसकण से घर बनाने-सा कठिन है
भावनाओं के प्रसव का मिल गया वरदान कवि को
अश्रु पीकर बाँटनी होगी सदा मुस्कान कवि को
मुश्क़िलों की हर परत को खोल कर छूना पड़ेगा
ज़िन्दगी मिलती भला कैसे बहुत आसान कवि को
एक जीवन में सभी की भावना को शब्द देना
हर पहर मरते हुए जीवन बिताने-सा कठिन है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
अन्तस् में पीड़ा जगनी थी, यह निर्धारित था
ठेस अपेक्षा से लगनी थी, यह निर्धारित था
रत्ना तो बस बानक भर थी, पूरे किस्से में
तुलसी को मानस् रचनी थी, यह निर्धारित था
✍️ चिराग़ जैन