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अपशकुनों का दोष

सागर खारा, नदिया सूखी ताल-तलैया में कीचड़ था लेकिन प्यास नहीं बुझने का, हर आरोप ओक ने झेला पेट अन्न को तरस रहा था और शिरा में रक्त नहीं था प्रेम व्यस्त था, प्रीत त्रस्त थी आलिंगन का वक़्त नहीं था चिंताओं की धूप धरा की उर्वरता को सोख चुकी थी पर फिर भी बंध्या जीवन का,...
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