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दो पैरों की भूमिका

पिछले दो-तीन दिनों से पुलिस और जनता के मध्य के संबंधों की जैसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं, उनसे हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था के चेहरे पर ग्रहण लग रहा है।
किसी सभ्य तथा विकासोन्मुखी व्यवस्था में पुलिस और जनता के मध्य परस्पर विश्वास का सम्बंध होता है। दोनों एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो समाज के दो पैरों की भूमिका निबाहते प्रतीत होते हैं।
एक पैर जब दूसरे पैर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा होता है तब वह दरअस्ल दूसरे पैर के आगे आने का रास्ता बना रहा होता है। इसी समन्वय पर समाज ‘चलता’ है।
किन्तु ये दोनों पैर यदि आपस में उलझना प्रारंभ कर दें तो समाज को लड़खड़ाने से कोई नहीं बचा सकता।
ये दोनों ही पैर एक दूसरे के इतने समीप रहते हैं कि चलने की प्रक्रिया में इनमें परस्पर घर्षण की घटनाएँ स्वाभाविक हैं।
ट्रैफिक पुलिस के जवानों के साथ होनेवाली झड़पें, पैट्रोलिंग करते जवानों के साथ होनेवाली कहासुनी, किसी पुलिसकर्मी के भ्रष्टाचार की वीडियो और ऐसी ही अन्य जो दुर्घटनाएं सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं, वे इसी घर्षण का प्रमाण हैं।
विपरीत परिस्थितियों में अधिकारियों की डाँट, पारिवारिक चुनौतियों, नकारात्मक परिवेश और प्रोटोकॉल के दायित्व निबाहते हुए पब्लिक के बीच ड्यूटी करते पुलिसवालों की मनोदशा में चिड़चिड़ापन शुमार होना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर अपनी किसी तात्कालिक समस्या से त्रस्त नागरिक का बिलखते हुए, भन्नाए हुए, अकड़ते हुए या चिल्लाते हुए थाने आना भी स्वाभाविक है।
यहाँ तक नागरिकों और पुलिस के मध्य के संबंधों में कुछ नया नहीं है। लेकिन 19 जुलाई 2026 के बाद से दिल्ली में छात्र-आंदोलनस्थल से दोनों ओर की जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं वे स्वाभाविक नहीं हैं।
सोशल मीडिया, पुलिस को क्रूर सिद्ध करने पर उतारू है और मेन स्ट्रीम मीडिया, आंदोलनकारियों को गुंडा बताने पर तुला है।
हिंसा कहीं से भी शुरू हो, वह समाज के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकती। पुलिसकर्मियों की लाठी से पिटकर बिलखते-चिल्लाते युवा भी समाज के भविष्य के लिए प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं और आंदोलनकारियों की भीड़ में फंसकर हांफता हुआ पुलिसकर्मी भी सामाजिक सौहार्द की सबसे कमज़ोर गाँठ को स्पर्श कर चुका है।
आंदोलन को लेकर सरकार की अपनी कुछ रणनीति हो सकती है। आंदोलन को लेकर विपक्ष की भी अपनी सोच हो सकती है। विधायिका और राजनीति को सड़कों पर उतरे इस जनसमूह को राजद्रोही घोषित करना है या जागरूक नागरिक -यह सियासत का विषय है लेकिन इस सियासी शतरंज में यदि समाज हार गया तो दो बादशाहों को जिताने के लिए बाइस मोहरे कुर्बान हो जाएंगे।
आंदोलन लोकतंत्र का फ्यूल पंप है। यहाँ से पाथेय लेकर लोकतंत्र जनहित की राह पर तेज़ी से दौड़ता है। आंदोलन के फ्यूल की माइलेज हर बार गाड़ी की क्वालिटी के अनुरूप बदल सकती है।
लेकिन ईंधन भरवाते समय पेट्रोल टैंक का फटना ख़तरनाक है। इसलिए पुलिस और जनता दोनों को ही स्मरण रखना होगा कि अराजकता की राह पर बढ़ा एक भी कदम समाज को गहरे अंधकार में धकेल देगा।
आंदोलनकारियों को षड्यंत्रकारी, राष्ट्रद्रोही, धर्मविरोधी, ग़द्दार और आतंकवादी कहना सरकारों की प्रवृत्ति रही है। आपातकाल के दौरान सत्ता के आलोचकों पर ‘राजद्रोह’ के चार्ज लगे। विपक्ष तो विपक्ष, विपक्ष की विचारधारा तक को समर्थन देनेवाले जेलों में भर दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने अधिकारों की मांग करनेवाले ‘दंगाई’, ‘उपद्रवी’ और ‘अपराधी’ घोषित किए गए। अन्ना आंदोलन और बाबा रामदेव के धरने के प्रति सत्ता का नज़रिया अभी स्मृतियों से ग़ायब नहीं हुआ है। किसान आंदोलन, खिलाड़ियों के धरने और मजदूरों के आंदोलन के प्रति सरकारी नीतियों के ज़ख़्म तो अभी तक हरे हैं।
इसलिए किसी भी जन आंदोलन का समर्थन करो या विरोध… यह ध्यान रहे कि आपका निर्णय किसी लामबंद मीडिया, किसी राजनैतिक दल अथवा किसी विचारधारा के influence से प्रभावित न हो।
और आंदोलनस्थल पर खड़े हर आंदोलनकारी को और हर सुरक्षाकर्मी को यह याद रखना चाहिए कि सरकार पराई हो सकती है; षड्यंत्र विदेशी हो सकते हैं; लेकिन देश आपका अपना है।

✍️ चिराग़ जैन

पुलिस और जनता के बीच का रिश्ता

सोशल मीडिया पर इन दिनों प्रशासन और जनता के बीच टकराव के बेशुमार वीडियो अपलोड हो रहे हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस देश के लगभग प्रत्येक नागरिक ने किसी न किसी चौराहे पर, किसी न किसी थाने में या किसी न किसी सड़क पर किसी पुलिसकर्मी का दुर्व्यवहार झेला है।
सभ्य नागरिक से सभ्यता से बात करनेवाले पुलिसकर्मियों की संख्या निश्चित रूप से बहुत कम है। यदि देश एक परिवार है तो पुलिस इस परिवार की वह चिड़चिड़ी भाभी है, जो सबके साथ ही अभद्र व्यावहार करती है, और अब लोगों ने उसकी आदतों का बुरा मानना बंद कर दिया है।
आप परिवार के साथ कहीं जाओ चाहे अकेले हो, पुलिसकर्मी ने यदि आपको रोक लिया तो आपका चेहरा उतर ही जाना है। बड़े-बुजुर्ग अपनी पीढ़ियों को समझाते हैं, ‘पुलिसवाले से मत उलझो, वरना जीना हराम हो जाएगा।’
जबकि सत्य यह है कि भारत में जो लोग पुलिस की वर्दी पहनकर कानून के प्रतिनिधि बनकर घूम रहे हैं, वे कहीं दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं। वे हमारे ही परिवारों के बेटे-बेटियाँ हैं।
यह भी सत्य है कि जनसंख्या के अनुपात में पुलिसकर्मियों की संख्या इतनी कम है कि लगभग हर थाने में हर पुलिसकर्मी के पास पेंडिंग फाइल्स की भरमार रहती है।
न्यायपालिका, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की फटकार झेलते हुए, इन पुलिसकर्मियों की विनम्रता भड़ास बन गई है। और यही भड़ास इनकी बोली और गालियों के माध्यम से आम आदमी पर बरसती रहती है।
सड़क पर ड्यूटी करते किसी कांस्टेबल या सबइंस्पेक्टर से आप तब तक सभ्य व्यवहार की अपेक्षा नहीं कर सकते, जब तक आप स्वयं कोई तोप न हों, या फिर वह आपको व्यक्तिगत रूप से पहचानता न हो।
इन परिस्थितियों का दुष्परिणाम यह है कि कांस्टेबल, सब इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर स्तर के पुलिसकर्मियों को उनके उपरवालों से सम्मान नहीं मिलता और जनता से प्यार नहीं मिलता। दुर्भाग्यवश पुलिस महकमे में यही वह तबका है, जिसका आम जनता से सामना होता है।
ऐसे में जनता और प्रशासन के मध्य परस्पर घृणा का माहौल बन चुका है। पुलिसकर्मी आम आदमी को उसके मुँह पर गाली देता है और आम आदमी पुलिसकर्मियों को उनकी पीठ पीछे गाली देता है।
कानून के क्रियान्वयन के लिए पुलिसकर्मियों को यदि हथियार और अधिकार नहीं थमाए गए तो अपराध नहीं रुक सकते। किन्तु जिनकी रक्षा के लिए पुलिसकर्मियों को अधिकार और हथियार सौंपे गए हैं, उन्हीं के अधिकारों का हनन करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
प्रथम दृष्टया ही प्रत्येक नागरिक को अपराधी मान लेने की प्रेक्टिस इतनी पक चुकी है कि अब पुलिसकर्मी, किसी समान्य नागरिक से भद्र व्यवहार करना अपनी तौहीन समझने लगे हैं।
मैंने सामन्यतः पुलिसकर्मियों को सहज या सरल आचरण करते हुए कम देखा है। वे मुझे अक्सर दो ही परिस्थितियों में दिखाई देते हैं, या तो वे किसी पर चढ़े हुए होते हैं, या फिर उन पर कोई चढ़ा हुआ होता है।
45 डिग्री की गर्मी से लेकर, हाड़ कंपाती सर्दी और मूसलाधार बारिश तक ड्यूटी पर मुस्तैद रहनेवाले इस पुलिसकर्मी की समाज में यह दुर्दशा क्यों हो गई कि जिस जनता की सुरक्षा के लिए ये खाकी पहनकर घर से निकलते हैं, वही जनता इनके प्रति क्रुद्ध और क्षुब्ध है।
चौकीदार किसी भवन के गेट पर आपको रोककर रजिस्टर में एंट्री करने को कहता है और आप चिढ़ जाते हैं, तो आप समझ लें कि आप अराजक नागरिक है। आपकी और आपके समाज की सुरक्षा के लिए आपके मार्ग में अवरोधक लगाना उसकी विवशता है। किन्तु 100 रुपये का नोट आपसे वसूलने के लिए उन अवरोधकों का दुरुपयोग करनेवाला पुलिसकर्मी भी सामाजिक आचरण को अराजक बनाने का अपराधी है।
यदि खेत ही बाड़ से चिढ़ेगा तो फसल की सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी, लेकिन यदि बाड़ ही खेत को खाने लगेगी तो पूरा खेत ध्वस्त हो जाएगा।
पुलिसकर्मियों से बातचीत शुरू होते ही कैमरे ऑन करनेवाले लोग इस बात के प्रमाण हैं कि पुलिस महकमे ने जनता के साथ दुर्व्यवहार किया है। परिस्थितियों के किसी भी झरोखे से झाँक लो, गाली, मारपीट, अपमान और रिश्वतखोरी से त्रस्त जनता कानून के इन पहरेदारों से सहज नहीं हो सकेगी।
सिंघम जैसी फ़िल्में देखकर जनता ने यह तो समझ लिया कि पुलिसकर्मियों का जीवन आसान नहीं होता। सिंघम जैसी फ़िल्मों ने यह तो समझा दिया कि राजनैतिक दबाव, विभागीय भ्रष्टाचार और अपने वेतन-भत्तों की हकीकत के बीच ड्यूटी करना कितना कठिन है। लेकिन इतनी सी बात आज तक इस देश की जनता समझ नहीं पा रही कि किसी नागरिक से गाड़ी के काग़ज़ मांगते समय उससे बदतमीजी करना क्यों आवश्यक है। किसी का अपराध सिद्ध होने से पहले ही उसे अपराधी मान लेने की आदत किस विवशता का परिणाम है।

✍️ चिराग़ जैन

बात-बात पर बदलें मापदण्ड

हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।

काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?

मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

रात के अंधेरे में

सुना है कि चिरैया के नुचे हुए पंखों को उसके घोंसले की मिट्टी नसीब न हो सकी। रात के अंधेरे में घरवालों को घर में बन्द करके पुलिस ने बिटिया की चिता जला दी। उसकी मिट्टी से लिपटकर रो लेने का भी अधिकार न मिल सका लाचार परिवार को।
सुनते हैं, इस देश में कोई असुरक्षित महसूस करे तो पुलिस उसे सुरक्षा देती है। लेकिन अपने आंगन की निरपराध चिरैया का दाह संस्कार करने का अधिकार मांगनेवाले परिवार से पुलिस को न जाने कौन-सी असुरक्षा महसूस हुई होगी। जेल में बन्द दुर्दांत अपराधी के परिवार में कोई मौत हो जाए तो उसे भी अंतिम संस्कार में शामिल होने की छूट मिल जाती है, लेकिन यह क्या था कि परिवार में मौत होने पर निरपराध परिवार को घर में क़ैद करके अंतिम संस्कार किया गया। हो सकता है कि अव्यवस्था को रोकने के लिये प्रशासन को यह आवश्यक जान पड़ा हो, किन्तु मनुष्यता के लिए यह कृत्य उस अपराध से कम नहीं था, जिसके कारण उस आंगन की चहक मातम में बदल गई।
इंद्रजीत की मृत्यु के बाद श्रीराम ने पुत्र के अंतिम संस्कार तक युद्ध विराम की घोषणा करके शोकग्रस्त शत्रु को जो अभय दिया था, कल रात हाथरस में उस परम्परा की चिता जल गई।
इस देश का तंत्र एक आमूल-चूल परिवर्तन की बाट जोह रहा है। स्पष्ट शब्दों में सुन लीजिए, क़ानून की आँखों में धूल झोंकने पर आप जिसकी पीठ थपथपाएंगे, वह एक दिन आपकी आँखों में धूल ज़रूर झोंकेगा। इसलिए, अच्छा अथवा बुरा, सशक्त अथवा कमज़ोर; जो भी लिखित संविधान हमारे पास है; उसका मखौल बनाने की इजाज़त किसी को नहीं मिलनी चाहिए; फिर चाहे वह पुलिस हो या अपराधी!
एक बेटी कल रात मिट्टी हो गई। जाओ चिरैया, तुम्हारे पोर-पोर पर हुए घाव किसी पोस्टमार्टम रपट में कम या ज़्यादा दर्ज हो जाएंगे; लेकिन तुम्हारी आत्मा पर जो खरोंचें पड़ी हैं उनकी सिसकी लिखने के लिए कोई पोथी पूरी न पड़ेगी। अब हम तुम्हारी जाति पर चर्चा करके तुम्हारे मनुष्य होने के अधिकार का हनन करेंगे; अब हमारा तंत्र तुम्हारे बयान बदलने की कहानियाँ गढ़कर तुम्हारे प्रति उपजी संवेदनाओं पर आरी चलाएगा। अच्छा हुआ बिटिया, तुमने आँखें मूंद लीं, वरना इस देश में न्याय की तलाश में तुम्हें यह तंत्र बार-बार वह हादसा दोहराता हुआ दिखता।

✍️ चिराग़ जैन

थाने मत जइयो

हमारे यहाँ पूरा पुलिस महक़मा दर्शनशास्त्र के इसी सिद्धांत पर कार्य करता है कि बड़ी समस्या आते ही मनुष्य को अन्य समस्याएँ छोटी लगने लगती हैं। इसीलिए आप कोई भी समस्या लेकर थाने जाइये, पुलिसवाले उसे टुच्चा सिद्ध करने के लिए तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। तब आपको पता चलता है कि जिसे आप समस्या समझ रहे थे, वह तो दरअस्ल समस्या थी ही नहीं। समस्या तो वह है, जो आपने थाने आकर मोल ली है।
थाने में आपको जीवन का असली ज्ञान मिलता है। नैतिक शिक्षा की पोथियों में छुपा जो ज्ञान सीखने से मनुष्य चूक जाता है, वह थाने में उसे चुटकियों में प्राप्त हो जाता है। जैसे, मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए। जीवन का यह दिव्य सूत्र सिखाने में बड़े-बड़े संत-फ़क़ीर विफल हो गए। लेकिन थाने पहुँचते ही पुलिसवाले जिस भाषा में आपसे बात करते हैं, आप तुरंत समझ जाते हैं कि किस बात का अहंकार करना है! जिसे बातों से समझ नहीं आता उसके लिए पुलिसकर्मियों के पास एक विशेष विशारद पाठ्यक्रम भी है। इस पाठ्यक्रम के निष्फल होने का आज तक कोई प्रमाण मनुष्य जाति के पास नहीं है।
अव्वल तो आपकी समस्या पर सुनवाई की ही नहीं जाएगी। ऐसा इसलिए नहीं, कि पुलिस महक़मा आपकी समस्या को लेकर गंभीर नहीं है, वरन इसलिए कि आपको समझाया जा सके कि जिस धन की चोरी की रपट आप लिखवाने आए हैं, वह सब मोह-माया है। इसलिए रपट लिखने की बजाय आपको गीता का उपदेश दिया जाता है- ‘क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। किससे व्यर्थ डरते हो। तुम्हारा क्या था, जो चला गया। तुम क्या लेकर आए थे, जो चोरी हो गया?’ फिर भी आपको यह महान ज्ञान समझ में न आए, तो आपसे पूछा जाता है कि जिस पैसे की चोरी हुई है, वह तुमने कैसे कमाया था? इस देश में किसी आम आदमी के पास एक नंबर में इतना पैसा हो ही कैसे सकता है, जिसे चुराया जा सके!
इन प्रश्नों का पिटारा खुलते ही आपको कहा जाता है कि जो पैसा चोरी हुआ है, उसे ईमानदारी का पैसा सिद्ध करो। इस कार्य को करने में जितने तरीके के काग़ज़ लगते हैं, उन्हें बटोरने में आपको अपने समस्त सत्कर्म और दुष्कर्म याद आ जाते हैं। एक तरह से पुलिसवाले आपको चिंतन करने का अवसर देते हैं कि जिस धन को आप अपना समझकर रपट लिखाने आए थे, वह तो दरअस्ल जी का जंजाल था। जिसके होते हुए आपकी नींद हराम हो गई थी, और जिसके चोरी होने पर थानेवाले आपका चैन छीन ही लेंगे।
यदि आपने ज़िद्द पकड़ ली और उसको ईमानदारी का धन सिद्ध कर ही दिया, और कहीं से एप्रोच लगाकर रपट दर्ज करा ही दी तो इंवेस्टिगेटिंग अफसर आपको पूछताछ के लिए बार-बार थाने बुलाएगा ताकि आपका उस धन से मोहभंग हो जाए। धीरे-धीरे आपके मन में चोर के प्रति सम्मान की भावना पनपने लगेगी कि वह बेचारा तो बिना आपको तंग किये, बिना आपका अपमान किये आपका पैसा ले गया। आपके मन में चोर के प्रति जो कलुष उत्पन्न हुआ था, वह धुल जाएगा और आपका मन पवित्र हो जाएगा।
इस अवस्था को प्राप्त होने के बाद आप अपनी कम्प्लेंट वापस लेने का विचार करेंगे तो थाना आपको एक और ज्ञान प्रदान करेगा कि ‘बिना विचारे जो करे, सो पीछे पछताय!’ अर्थात् रपट वापसी के लिए आपको कठोर तपस्या करनी होगी। चूँकि आपने एक अनावश्यक रपट लिखवाकर रोज़नामचे का काग़ज़ और पुलिसवालों का समय नष्ट किया है, इसलिए इसका आपको हर्जाना भरना होगा। आप यह हर्जाना भरने में आनाकानी करने की सोचोगे तो पुलिसवाले दिव्य शब्दयुग्मों से आपको विभूषित करेंगे, जिनका सामान्य भाषा में तात्पर्य होगा कि हम तेरे बाप के नौकर नहीं हैं, जो जब चाहे रपट लिख लेंगे और जब चाहे उसे रद्द कर देंगे। आखि़र पुलिस को भी आगे जवाब देना होता है।
आप अब तक ‘आगे जवाब देने’ का अर्थ समझ चुके होते हैं। सो, जनता की सेवा में रत पुलिसकर्मियों को आगे जवाब देने में कोई दिक्कत न हो, इसकी व्यवस्था करके ठुमरी स्टाइल में एक भजन गुनगुनाते हुए घर लौट आएंगे कि, थाने मत जइयो…!

✍️ चिराग़ जैन

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