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गिद्धों में मुठभेड़ हुई है

नभ तक वीराना पसरा है
हर मन में गहमागहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है

सबके मुँह पर ख़ून पुता है, नाखूनों में मांस भरा है
पर भोली चिड़िया के भीतर, दहशत का एहसास भरा है
इसने उसकी चिड़िया मारी, उसने इसकी चिड़िया खाई
खूब लड़े फिर समझौतों में, चिड़िया की ही दावत पाई
गिद्ध, चिरैया को सुख देंगे
ये इक झूठी खुशफहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है

किन-किन में संघर्ष हुआ था, पंख नुचे हैं किनके-किनके
उनके बीच तनी तलवारें, इनके घर हैं तिनके-तिनके
हर नन्हा पंछी घायल है, हर डाली आँसू गाती है
लेकिन गिद्धों के पंखों पर, कोई शिकन नहीं आती है
गिद्धों ने अचकन पहनी है
मासूमों पर बेरहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है

✍️ चिराग़ जैन

सृजन सुख

इस तपोवन में सृजन की साधनाएँ चल रही हैं
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

मन गहन संवेदना अनुभूत करने में जुटा है
तन अभी स्वर-व्यंजनों में प्राण भरने में जुटा है
भाव का उत्कर्ष छूकर नयन खारे हो रहे हैं
इस सृजन सुख में जगत् के डर किनारे हो रहे हैं
शब्द से सच का सहज चेहरा उकेरा जा रहा है
झूठ सुन ले, यह किसी षड्यंत्र की चौसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

इस जगह पर कामना के पर कतरने का नियम है
लाभ से दामन छुड़ाकर कर्म करने का नियम है
कान सबके दूसरों के आँसुओं की आह पर हैं
ध्यान सबका सृष्टि भर के अप्रतिम उत्साह पर है
इस धरा पर स्वार्थ को पूरा निचोड़ा जा रहा है
वासनाओं के लिए यह धाम कुछ हितकर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

इस समय वात्सल्य का उल्लास-उत्सव चल रहा है
रच रहे हैं आज नटवर रास; उत्सव चल रहा है
कृष्ण के आनंद में सुख से भरी हैं कुंजगलियाँ
पीर की काया बड़ी है, संकरी हैं कुंजगलियाँ
द्वेष से मिलने कन्हैया आएंगे मथुरा स्वयं ही
कंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

✍️ चिराग़ जैन

कुलगीत IIIT Vadodara

उन्नत शिक्षा हेतु समर्पित
इस धरती का अभिनंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

जननी-तनय सरीखे ही हैं, आवश्यकता-आविष्कार
अनुभव का अवलंबन थामे बढ़ता अधुनातन आचार
भौतिकता के चक्र, कल्पना-अश्व, साधना का स्यंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

ज्ञान वही, जो मानवता हित सज्जन का निर्माण करे
शोध वही, जो जन-जन के हित सुविधा अनुसंधान करे
शिक्षा वह, जिससे बन पाये, सरल, सुगम, सुंदर जीवन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

अर्जित कर, संरक्षित करना और प्रसारित करना ज्ञान
यही स्वप्न है, यही सोच है, यही हमारा लक्ष्य प्रधान
ऊर्जा के मस्तक पर चंदन तिलक लगाता अनुशासन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

अलख तरंगों को लिखते हैं, अकथ स्वरों को सुनते हैं
प्राणहीन यंत्रों को समझें, हर स्पन्दन को गुनते हैं
एक साथ साधे हैं हमने जड़, चेतन और अवचेतन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

उद्यमस्य सम किमपि न भवति, कर-कर इसी मंत्र का ध्यान
सुकर बनाकर सुगम सूचना, स्वप्न लिए जग का कल्याण
अभिनव शिक्षा, अभिनव जीवन, अभिनव दर्शन, अभिनव मन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

संस्कृति की समृद्धि हमारी पृष्ठभूमि का तत्व प्रधान
मानव निर्मित बुद्धि, प्राकृतिक भाषा का करते संधान
आगत का स्वागत करते हैं और अतीत का आराधन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

विश्वामित्री के तट पर वट की नगरी है सुन्दरतम
शिक्षा के नित-नूतन-नय को करती है यह हृदयंगम
संस्कृति और विज्ञान यहाँ करते दिखते हैं आलिंगन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
✍️ चिराग़ जैन

अतीत से सामना

सामने आ गए आज फिर हम
आज फिर से संभलना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा

आँख से तुम बरसने न दो बदलियाँ
काँपकर सब बयां कर न दें उंगलियाँ
चल न आना मेरी ओर सब भूलकर
बोलने लग न जाएँ कहीं पुतलियाँ
नेह को कब दिखी कोई सीमा
देह को ही समझना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा

उस घड़ी किस तरह से जिया जाएगा
तुमको परिचय हमारा दिया जाएगा
साँस की चाल कैसे रहेगी सहज
होंठ को किस तरह से सिया जाएगा
जब संभाले न संभलेंगे आँसू
उस घड़ी खूब हँसना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा

अपनी चाहत से नज़रें चुराते हुए
जी रहे थे स्वयं को भुलाते हुए
भाग्य, जिसने हमें तब अलग कर दिया
आज हिचका न हमको मिलाते हुए
तब बिछड़कर सिसकते थे हम-तुम
आज मिलकर सिहरना पड़ेगा

✍️ चिराग़ जैन

मन बोलता है

जब सब पंछी मौन हो गए
कलरव के स्वर गौण हो गए
जीवन की रफ़्तार सो गई
दिन पर रात सवार हो गई
ऐसा एकाकी पल पाकर मन हमको झकझोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा

कितनी इच्छाएँ प्यासी थीं, कितने काम अधूरे निकले
डुगडुगियों पर नाच रहे थे, हम तो एक जमूरे निकले
कर को कमल, पदों को पंकज मान रही थी दुनिया लेकिन
हमने अपनी शाख टटोली, उस पर सिर्फ़ धतूरे निकले
जब सारे पाखण्ड सो गए, तब भीतर का चोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा

पिण्डलियों ने ताने मारे, रीढ़ दुखी, सिसकी-सी आई
ऐंठे-ऐंठे कन्धे देखे, अकड़ी-अकड़ी गर्दन पाई
आँखों में अंगार भरे थे, पलकों पर पर्वत लटके थे
माथे की नस ने भी उस पल शायद कोई गारी गाई
तन की अनदेखी का किस्सा होकर कुछ मुँहज़ोर, उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा

दिन में फिर भी छिप सकते हैं, रातों में कुछ ओट नहीं है
रातें जिसको देख न पायें, ऐसा कोई खोट नहीं है
आँसू से आँखें धुल जायें तो शायद आराम मिले कुछ
वरना अंतर्मन के शब्दों से बढ़कर तो चोट नहीं है
मन हल्का होकर सोया तो, लेकर नयी हिलोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा

✍️ चिराग़ जैन

पराजित विजेता

आंधी के आघात सहे हैं
ये शाखों के साथ बहे हैं
सूखे हुए पड़े जो भू पर
इनके कोमल गात रहे हैं
हर मौसम से जूझे हैं ये, जूझे हैं, फिर टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

तूफानों का वेग सहा है, अब झोंकों से डरते हैं ये
अपनी पूरी देह कँपाकर, उपवन में स्वर भरते हैं ये
मिट्टी में मिलकर भी अपना, कण-कण उपवन को देते हैं
कोंपल को भोजन मिल पाए, इस कोशिश में मरते हैं ये
जिनको धूर्त समझते हो तुम
ये कल तक भोले-भाले थे
जो सूखे बदरंग हुए हैं
कल तक ये भी हरियाले थे
शुष्क हवा के हाथों छलकर, अब ये ख़ुद से रूठ गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

जिनको पग-पग खोट मिला हो, वे जन खरे नहीं रह पाते
जो पत्ते अंधड़ से जूझे, फिर वो हरे नहीं रह पाते
आदर्शों के सपने छोड़ो, कड़वी मगर हकीकत ये है
जिनसे सबने प्यास बुझाई, वे घट भरे नहीं रह पाते
इतनी काली रात नहीं थी
ऐसी कठिन बिसात नहीं थी
डाली ने उकसाया वरना
आंधी की औकात नहीं थी
अंधड़ आया, डाली लचकी, ठूठ मुनाफा लूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

साथी अवसरवादी निकले, बीच युद्ध में बात बदल ली
अड़ने की आदत थी उनकी, वह आदत उस रात बदल ली
तेज़ हवा ने वार किया तो डाली झूम-झूमकर नाची
तनकर खड़े तने ने झुककर, पल में अपनी जात बदल जी
जिसकी देह पड़ी धरती पर
उसने प्रण को पूजा होगा
लेकिन इतना तो निश्चित है
जो हारा, वो जूझा होगा
जिसने केवल जान बचाई, उसके दर्पण टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं

✍️ चिराग़ जैन

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