+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

पत्रकारिता का काला दिन

आज जंतर-मंतर पर जो भीड़ जुटी है, वह कल क्या कर पाएगी, इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य की कुक्षि में छिपा है, लेकिन उसने आज-आज में भारतीय समाचार चैनल्स की चेहरे को जितना नंगा कर दिया है, वह पिछले दस-बारह वर्ष में कभी इतनी साफ़गोई से नहीं हो सका था।
आज के दिन की रिपोर्टिंग को देखकर यह साफ़ कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया सरकार की पीआर एजेंसी के रूप में कार्य करती है। और तथ्यों को न केवल छिपाती है बल्कि पीत पत्रकारिता करके, झूठ बोलकर सरकार के पक्ष में माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करती है।
सरकार की पब्लिक इमेज को बनाए रखने के लिए समाचार चैनल्स को झूठ की जितनी घिनौनी तस्वीर पेश करनी पड़े, वह करेगी।
आज की रिपोर्टिंग के तीन स्तर हैं। प्रथम, दीपके की चरित्र हत्या। द्वितीय, समर्थकों को इस-उस दल का कार्यकर्ता सिद्ध करना। तृतीय, भीड़ के चित्रों से बचते हुए सौ-पचास लोगों की उपस्थिति रिपोर्ट करके यह सिद्ध करना कि आंदोलन फुस्स हो गया है।
मैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आंदोलन से नहीं जुड़ा हूं। किन्तु मैंने अपने जीवन के पांच साल तक पत्रकारिता तथा जनसंचार की पढ़ाई की है। मैंने भारतीय पत्रकारिता का जितना समृद्ध और प्रभावी इतिहास पढ़ा है, उसके झरोखे से जब मैं आज की पत्रकारिता को देखता हूं तो मुझे यह तस्वीर और भी अधिक कुत्सित नज़र आती है।
दिन को दिन और रात को रात कहने का दायित्वनिर्वहन करती हुई पत्रकारिता ने अपने इस कर्तव्य से मुंह मोड़ लिया है। यदि यह मान ही लिया जाए कि शासन के दबाव तथा व्यावसायिक घरानों के राजनैतिक हितों की मजबूरी में कई बार शाम को रात कहने वाली पत्रकारिता दरअस्ल विवश है। किन्तु भरी दोपहर को रात कहने में तो थोड़ी सी लज्जा चेहरे पर उतर ही आनी चाहिए थी।
जिन न्यूज़ प्रेज़ेंटर्स ने दस-पन्द्रह से सौ-पचास और चार-पांच सौ तक की संख्या बताकर देश के युवाओं के इस प्रयास का उपहास किया है। अगर यह ख़बर पढ़ते हुए उनकी नज़रें भी नीची हुई होतीं तो मैं उनकी विवशता को क्षम्य मान सकता था।
लेकिन जिस ढिठाई से आन्दोलन को विवश बताया गया। मेन स्ट्रीम रिपोर्टिंग से आंदोलन को नदारद किया गया, वह भारतीय पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास के मुख पर कालिख पोतने जैसा कृत्य है।
सुना है, कभी एक मशहूर एंकर शराब पीकर लड़खड़ाते हुए जनरल रावत के निधन का समाचार पढ़ते पाए गए थे। विश्वास मानिये, उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, एक पत्रकार बाकायदा खबरों की दलाली करते कैमरे में कैद हुए, बाकायदा जेल होकर आए। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, नोटबंदी के दौर में नए नोट के पक्ष में माहौल बनाते हुए नए नोट में चिप होने की ख़बर प्रसारित हुई थी। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
लेकिन आज तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने गिरने की हर मार्यादा लांघकर बाकी के तीनों स्तंभों को धराशायी करने का कुचक्र रच दिया। आज हिंदी पत्रकारिता के जनक पंडित जुगल किशोर की आत्मा बहुत कष्ट में होगी।
अंग्रेज सरकार से डरे बिना भारतीय समाज को जागृत करने के प्रयास में जेल जानेवाले पत्रकारों को आज यह देखकर कैसा लग रहा होगा कि उनकी वंशबेल ऐसे क्लीवस्वभावी प्राणियों से जा लिपटी है, जिन्हें कोरा झूठ बोलने में लेशमात्र भी संकोच नहीं होता।
हालांकि निर्लज्जता के उत्कर्ष तक जा पहुंचे पत्रकारों से कोई उम्मीद तो नहीं है लेकिन यह याद दिलाने का दुस्साहस कर रहा हूं कि इस देश में उपहार सिनेमा की ख़बर पढ़ते समय सुरेन्द्र प्रताप सिंह की हृदयगति रुक गई थी। याद दिलाना चाहता हूं कि आपातकाल के विरोध में जनसत्ता ने पूरा पेज काला छापकर सरकार का मुखर विरोध किया था।
मैं यह अपेक्षा कतई नहीं करता कि आज की पत्रकारिता सरकार की किसी नीति का विरोध कर सकेगी। लेकिन इतनी अपेक्षा तो थी ही कि ये सच से ठीक 180 डिग्री मुंह फेरकर सफेद झूठ बोलते अपने आकाओं को ख़ुश करने में नहीं हिचकिचाएंगे।
मैं सोच नहीं पाता हूं कि इन लोगों का सामना जब अपने बच्चों से होता होगा, तो क्या इनका दिल दहल नहीं जाता होगा कि अपने नौनिहालों के लिए वे कैसे भारत का निर्माण कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं का विज्ञापन, सरकारी ईवेंट्स की ईवेंट कवरेज तक जिन पत्रकारों की पूरी क्षमता सिमटकर रह गई है, उन्हें अपने घरों में एक आईना ज़रूर रखना चाहिए, ताकि कभी गाहे-बगाहे उन्हें अपनी शक्ल दिखाई दे जाए तो याद कर सकें कि कभी उनकी आंखों में भी हया हुआ करती थी।

✍️ चिराग़ जैन

समय बहुत नाज़ुक है

एक पत्रकार ने अध्यापकों की कौड़ी गिन दी और पूरा समाज उस पत्रकार के विरोध में खड़ा हो गया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया और युवाशक्ति ने रातोंरात एक डिजिटल क्रांति खड़ी कर दी।
शिक्षा के दोनों छोर एक साथ छेड़े गए और एक पूरे समाज के सिले हुए होंठ खुल गए। इस क्रांति का भविष्य क्या होगा यह तो कहना कठिन है, किन्तु इन दोनों प्रकरणों ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि संभावनाएं और आशंकाएं क्षीण हो सकती हैं किन्तु समाप्त कभी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर विचरण करते हुए पाता हूं कि देश में किसी क्रांति जैसा माहौल है। रवीश कुमार से लेकर खान सर तक कोई भी ऐसी बात नहीं कह रहा है, जो समाज जानता न हो, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि बातें कही जाने लगी हैं। कब तक कह पाएंगे और कहां तक सुनी जाएंगी… यह कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस दौर में अट्टालिकाओं के अहंकार से त्रस्त समाज से मैं यह अपेक्षा अवश्य करूंगा कि इस बार अपने विवेक से समझौता मत करना। सिस्टम का विरोध ही सही, लेकिन किसी के भी पीछे चलने से पहले यह समझ लेना कि कहीं हमारा नेतृत्व करनेवाला भी अपने किसी हितसाधन के लिए हमें भीड़ की तरह ‘इस्तेमाल’ तो नहीं कर रहा है।
कहीं श्वेत परिधानी बाबा का रिमोट किसी चालाक प्रशासनिक के हाथ में तो नहीं है। किसी के सुर में सुर मिलाने से पहले यह अच्छी तरह पड़ताल कर लेना कि कहीं इस सुरीले क्रांतिकारी के सुरों का कोई सप्तक किसी दूसरे आततायी के चरणों में जाकर विलीन तो नहीं हो रहा है।
‘जन’ एक महत्वपूर्ण शब्द है। दुनियाभर में अब राजनीति को इस ‘जन’ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस जन को एकत्रित करके शातिर लोगों ने जैसे-जैसे धोखे किए हैं, उनसे सबक लेकर इस बार कदम मिलाकर भी चलना आवश्यक है और कदम संभालकर भी…।
मुझे याद है कांग्रेस सरकार के समय राहुल गांधी ने एक बयान दिया था कि मध्यम वर्ग कैटल क्लास की तरह सफ़र करता है। इस बयान पर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी के विरुद्ध लोगों का गुस्सा फूटा था। उस समय कांग्रेस के सत्ताजनित अहंकार के परिणामस्वरूप प्रत्येक ख़बर लोगों की भावनाओं को आहत करती थी।
अब भी लगभग वही माहौल है। बस तब जनता बोलती थी, आज बोलने पर अनकही-सी मनाही है। पानी को अगर सही तरीके से निकलने का रास्ता न मिले तो वह पाइप फोड़कर निकलता है। हालांकि मैं फिर भी इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी तरह की अराजकता अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। यह बात सिस्टम को भी समझनी होगी और जनता को भी। सिस्टम को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि अपेक्षा, बात और शिकायत दरअस्ल सिस्टम का विरोध ही हैं। ठीक इसी तरह जनता को भी यह समझना होगा कि प्रशासन चलाते समय कहा गया हर शब्द अभिधा नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण बात। यदि केवल अध्यापकों को राष्ट्रप्रेमी, ईश्वर के अवतार और ऐसे ही हाइपोथेटिकल विशेषणों से नवाज़ने का सिलसिला ज़ोर पकड़ गया तो मूल विषय धूमिल हो जाएगा। जैसे किसान आंदोलन के समय हुआ। जैसे डॉक्टरों की हड़ताल के समय हुआ। जैसे खिलाड़ियों के समय हुआ।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर मनुष्य में कुछ खामी हो सकती है। जिस देश में डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापक हुए हैं उस देश में कोई अध्यापक भ्रष्ट हो ही नहीं सकता, इस सामान्यीकृत धारणा से अपने समाज को बचाना आवश्यक है। और जिस देश में एक पत्रकार दारू पीकर लड़खड़ाती हुई एंकरिंग करता हुआ रिकॉर्ड हुआ है, उस देश में सभी पत्रकार दारुड़िये हैं, यह धारणा भी अपरिपक्व है। मेरा तो मानना है कि जो पत्रकार दारू पीकर न्यूज़ पढ़ता हुआ मिला है, वही पत्रकार कभी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न करता हुआ मिल जाए तो उसका उस विशेष साहस के लिए सम्मान किया जाना चाहिए। और फिर वही पत्रकार किसी दिन पीत पत्रकारिता करता पाया जाए तो उसी पत्रकार की आलोचना होनी चाहिए।
पत्रकारों को यह बात समझनी पड़ेगी कि जनता का जो गुस्सा इस समय पत्रकारिता के विरुद्ध आंधी की तरह फूट रहा है, वह किसी एक पत्रकार की एक स्टेटमंेट का परिणाम नहीं है। पत्रकारों को यह याद करना होगा कि इस देश ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों को देखा है। इस देश की पत्रकारिता ने साहस और नैतिकता के इतने बड़े प्रतिमान खड़े किए हैं कि व्यावसायिकता और सत्ता के दबाव से उत्पन्न आपकी कोई भी विवशता यह देश नहीं समझ सकेगा। इसलिए अपनी रिपोर्टिंग में दबाव का अनुपात आटे में नमक जितना ही रखें। इससे अधिक दबाव दिखा तो खानेवाला आपकी रसोई के कौर को थूक देगा।
✍️ चिराग़ जैन

मुहल्ला स्तरीय अमरीका-ईरान युद्ध

हमारे मुहल्ले के पश्चिमी छोर पर श्याम का घर है और लगभग पूर्वी छोर पर छैनू रहता है। श्याम और छैनू के बीच लम्बे समय से तनातनी का माहौल बना हुआ है। दोनों के बीच जब-तब कहासुनी होती रहती है, जिसे मुहल्ले की चौपाल पर हाथापाई सिद्ध करनेवालों की कमी नहीं है।
बालकनी में सूखते कपड़ों पर मिट्टी फेंकने से लेकर, साइकिल के टायर की हवा निकालने तक के भयंकर आक्रमण दोनों एक-दूसरे पर करते रहते हैं।
चूंकि दोनों के घर मुहल्ले के दो अलग-अलग छोर पर हैं, इसलिए दोनों ने एक-दूसरे के पड़ोसियों के साथ दोस्ती गांठ रखी है। ताकि युद्ध के समय हमला करने के लिए दुश्मन के निकट ही वॉरबेस तैयार किया जा सके।
कुछ साल पहले परचून की दुकान पर मसूर की दाल खरीदते हुए दोनों का आमना-सामना हो गया। भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें परचूनिये का तराजू घायल हो गया और आधा किलो मसूर की दाल तबाह हुई। मुहल्ले की भाभियों ने नल से पानी भरने की लाइन में इस विषय पर गंभीर चर्चा का आयोजन किया। जोरदार बहस हुई और बहस का परिणाम यह निकला कि दोनों में से कोई भी कम नहीं है जीजी।
तब से इन दोनों को लेकर बच्चों से लेकर बूढ़े तक वीरता के किस्से सुनाते फिरते हैं। मुहल्ले का लोकल कवि श्याम और छैनू की मुठभेड़ों की कल्पना करने में इतनी पोथियां भर चुका है कि उसका श्याम-छैनू महाकाव्य पढ़नेवाले लोग हमारे मुहल्ले को हल्दीघाटी और कुरुक्षेत्र से कम नहीं समझते।
छैनू को अगर पता चल जाए कि श्याम की घरवाली सब्जी खरीदने के लिए फेरीवाले का इंतज़ार कर रही है, तो वह अपनी ओर से मुहल्ले में घुसनेवाले हर सब्जीवाले को डांटकर भगा देता है। श्याम ने भी इस अपमान का बदला लेने के लिए जाने कितनी ही बार फेरीवालों को छैनू के घर तक पहुंचने से रोका है।
दोनों की दुश्मनी इतनी लोकप्रिय है कि मुहल्ले में कहीं कोई कुत्ता भी मर जाए तो उसे श्याम-छैनू युद्ध का शहीद घोषित कर दिया जाता है। बरसात में बिजली कड़क जाए तो ऐसा मान लिया जाता है कि श्याम-छैनू संग्राम का माहौल तैयार हो गया है।
पिछले महीने मुहल्ले के लोगों ने एक झन्नाटेदार तमाचे की गूंज सुनी। बस, फिर क्या था। कहानियों का सिलसिला निकल पड़ा। छोकरों ने एआई से वीडियो बना-बनाकर छैनू और श्याम के तमाचा युद्ध को लोकप्रिय कर दिया। लोकल कवि ने तमाचा, सपाटा, चाटा, रहपटा, थप्पड़ और लप्पड़ जैसे शब्दों के प्रयोग से युद्ध का वर्णन किया। भाभियों ने नल की लाइन में तमाचा-वॉर का आंखों देखा हाल सुनाया। चौपाल पर बुजुर्गों ने श्याम और छैनू के बहाने अपनी जवानी के वो किस्से सुनाए, जिनमें उनके गाल पर किसी ने तमाचा जड़ा था। ये और बात है कि किस्से सुनाते समय उन्होंने तमाचा मारनेवाले और तमाचा खानेवाले किरदारों को बदल दिया था।
पिछले सप्ताह किसी ने श्याम के घर की बाहरी दीवार पर गाली लिख दी। श्याम ने अपने अनुभव से बिना पढ़े ही बता दिया कि यह गाली छैनू ने लिखी है। श्याम ने गाली इसलिए नहीं पढ़ी क्योंकि श्याम को पढ़ना नहीं आता। हालांकि छैनू को भी लिखना नहीं आता, लेकिन मुहल्लेवालों ने मान लिया है कि श्याम से दुश्मनी की शिद्दत में छैनू ने लिखना सीख लिया है।
गाली कांड के अगले ही दिन छैनू की बाहरी दीवार गिर गई। श्याम सबको बता रहा है कि मैंने ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। लेकिन छैनू सबको बताता फिर रहा है कि श्याम मेरी दीवार पर गाली लिखकर गंदा न कर पाए, इसलिए मैंने दीवार खुद गिराई है। दीवार के मलबे से मुहल्ले का एक तरफ का रास्ता रुक गया है। गाली लिखी दीवार के सामने से गुज़रते हुए मुहल्ले की महिलाओं को शर्म आती है। लेकिन मुहल्ले के बच्चे अपना कष्ट भूलकर दो महान योद्धाओं की शौर्यगाथा सुना रहे हैं। भाभियां नल की लाइन में गालीवाली दीवार पर चर्चा करते हुए खीसें निपोर रही हैं। चौपाल पर बुज़ुर्ग अपनी जवानी की गालियों का सौंदर्यशास्त्र बखान रहे हैं और लोकल कवि ने कल रात ही गाली की दुनाली से युद्धक्षेत्र में हज़ारों सैनिकों को घायल किया है।

✍️ चिराग़ जैन

भविष्य का अनुमान

किसी समाज के वर्तमान का आकलन उसके वैभव से किया जाता है, किंतु उसके भविष्य का अनुमान केवल उसके विवेक से लगाया जा सकता है। घटनाएँ और दुर्घटनाएं यदि समाज के लिए कुछ दिन तक न्यूज बुलेटिन की स्टोरी भर बनकर रह जाएं और उनसे बेहतर समाज के निर्माण का कोई विमर्श नहीं उपजे तो समझ लीजिए कि हमारी पीढ़ियां ख़तरे में हैं।
यह वर्ष प्रारंभ हुआ और देश की राजधानी में एक जीती-जागती लड़की सड़कों पर घसीटकर मार दी गई। पूस की सर्द रात में 12 किलोमीटर तक किसी इंसानी जिस्म के खुरदरी सड़क पर घिसटने की कल्पना से लोगों की रूह काँप गई।
सुबह होने से पहले लड़की दुनिया से जा चुकी थी और ख़बर दुनिया पर छा चुकी थी। अब शुरू हुआ हेडलाइंस और पब्लिक सिम्पैथी का घिनौना खेल।
न्यू ईयर के जश्न के तुरंत बाद मीडिया को एक सेंसेशनल स्टोरी मिली तो ‘पुलिस की लापरवाही’; ‘स्त्री सुरक्षा’ और बलात्कार जैसे शब्दों के साथ रिपोर्टिंग की जाने लगी। चूँकि ख़बर में पुलिस को विलेन बनाना था, इसलिए हर ख़बर में लड़की को ‘पीड़िता’ कहकर संबोधित किया जा रहा था।
दस बजते-बजते राजनीति गरमा गई और आरोपियों में से एक का भाजपा कनेक्शन भुनाने के लिए आम आदमी पार्टी एक्टिव हो गई। उधर दिल्ली के एलजी और केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने घटना पर अफसोस ज़ाहिर करते हुए दिल्ली पुलिस से घटना की अपडेट लेनी शुरू कर दी।
दो दिन तक मीडिया मृतका की माँ के रोते-बिलखते फुटेज, सौरभ भारद्वाज की प्रेस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों की प्रेस स्टेटमेंट और थाने के बाहर जमा भीड़ की बाइट चलाकर काम चलाता रहा। उस रात के चश्मदीदों की क्लिप भी हर तीन-चार मिनिट में रिपीट होती रही, जिससे यह सिद्ध हो रहा था कि दिल्ली पुलिस नाकारा है। कुछ बड़े चैनल्स ने स्कूटी से टक्कर और गाड़ी के नीचे फंसी लड़की की एनीमेशन भी चलाई। एक डिवाइडर से यू टर्न लेती गाड़ी की सीसीटीवी फुटेज भी सैंकड़ों बार चलाई गई। बारह किलोमीटर तक घिसटकर मर चुकी लड़की को मीडिया दो दिन तक घसीटता रहा।
अदालत में सुनवाई होने से पहले ही आरोपियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। पुलिस की चार्जशीट का तो पता नहीं लेकिन जल्दबाज़ रिपोर्टर्स ने उन्हें बलात्कारी कहने में देर नहीं लगाई।
लड़की की पहचान, उसके परिवार की पहचान, उसकी सहेली की पहचान सब कुछ मीडिया ने सार्वजानिक कर दी और विधि-पत्रकारिता के नियम-कायदे मुँह बाये देखते रह गए।
उधर एक आरोपी का भाजपा से सम्बंध होने के कारण भाजपा इस पूरे मुद्दे पर बैकफुट पर रही।
दो दिन बाद सुधीर चौधरी ने अपने ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में यह दावा किया कि कंझावला कांड में एक नया एंगल सामने आया है कि उस रात दुर्घटना में मरने वाली लड़की के साथ एक सहेली भी थी। सुधीर चौधरी ने यह भी बताया कि उस सहेली से उनके चैनल ने एक्सक्लूसिव बातचीत करके पता चला लिया है कि मृतका उस रात होटल के कमरे से शराब पीकर निकली थी और उसका उसकी सहेली से झगड़ा भी हुआ। होटल के स्टाफ से यह भी पता चल गया कि वह लड़की पहले भी इस होटल में आती रही है, कि उस लड़की से मिलने (थोड़ी देर के लिए) उसके पुरुष मित्र भी आए थे…!
इसके बाद अचानक सोशल मीडिया के ग्रुप्स में कुछ ऐसा पोस्ट किया जाने लगा जिससे ख़बर के प्रति लोगों का नज़रिया एकदम बदल गया। जो बिलखती माँ अपनी बेटी के हत्यारों को मृत्युदंड देने की मांग कर रही थी, वही अब अपनी मरी हुई बेटी को छीछालेदर से बचाने की कोशिश करती मिली।
मेरा प्रश्न यह है कि हम आख़िर कब तक इस प्रचार तंत्र के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे? नीचे जो प्रश्न मैं पूछ रहा हूँ उनको गंभीरता से सोचकर अपने आप से उनके उत्तर पूछने का प्रयास करना :-
1. अगर वह लड़की किसी तथाकथित अपराध में लिप्त रही भी हो (जो सुनिश्चित करना न्यायालय का कार्य है) तो भी क्या उसे मार देने की छूट किसी अन्य नागरिक को दे देनी चाहिए?
2. अगर वह नशे की हालत में किसी गाड़ी से टकरा ही गयी थी, तो भी क्या उसे 12 किलोमीटर तक सड़क पर घसीटना जस्टीफाई किया जा सकता है?
3. रात के समय यदि कोई लड़की सड़क पर किसी भी स्थिति में मृत पाई जाए, तो क्या उस स्थिति में यह मान लेना चाहिए कि उसका बलात्कार ही हुआ होगा?
4. इस दुर्घटना के बाद क्या हमारे समाज को इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए कि देर रात तक बाहर रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर कम से कम पारिवारिक अंकुश की पहल की जाए।
5. स्कूटी पर जा रही स्त्री हो या गाड़ी में घूम रहे पुरुष; दोनों ही के लिए भीषण सर्दी की रात में सुनसान सड़कों पर निकलना असुरक्षित क्यों नहीं है?
6. पुलिस की मुस्तैदी और कार्यशैली पर पूरी व्यवस्था को गंभीरता से पुनर्विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
7. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिसकर्मी से शिकायत करने पर यदि पुलिसवाला उल्टे आपको ही डाँटकर भगा दे तो आप कुछ नहीं कर पाते।
8. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिस अपनी जनता से सुरक्षाकर्मी जैसा नहीं अपितु तानाशाह जैसा व्यावहार करती है।
9. क्या यह सत्य नहीं है कि आरोपियों में एक व्यक्ति के भाजपा सम्बंध से भाजपा विरोधियों को ‘अवसर’ मिल गया?
10. क्या यह सत्य नहीं की लड़की की सहेली की गवाही से भाजपा समर्थकों को ‘अवसर’ मिल गया?
11. क्या यह सत्य नहीं कि हमें हमारी सड़कों को दिन-रात सुरक्षित और निर्भय बनाए रखने के प्रयासों को वरीयता देनी चाहिए।
12. क्या यह आवश्यक नहीं कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को मनुष्य होने की न्यूनतम अर्हता का ध्यान रखना चाहिए!
मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह अच्छी तरह जाँच लें कि आप जो लिखने जा रहे है वह खुले हुए ज़ख़्म पर मरहम लगाने जैसा है, यदि आपकी उंगली ने रिसाव के किसी भी संवेदनशील तन्तु को छू दिया तो घाव की टीस, चित्कार बनकर मनुष्यता के कान फोड़ देगी!

✍️ चिराग़ जैन

मेरी मौत की ख़बर

एक रात
एक न्यूज़ चैनल
स्पीड की सारी हदें पार कर गया
न्यूज एंकर ने
मेरे टीवी पर
मुझे ही बताया कि मैं मर गया

नेशनल चैनल की न्यूज़ थी
इसलिए संदेह भी नहीं कर सकता था
और मीडिया का इतना सम्मान करता हूँ
कि इस ख़बर को सच साबित करने के लिए
मैं सचमुच मर सकता था

मैंने भी एक झटके में
दुनिया के हर तेज़ चैनल को बीट कर दिया
और अपने ट्विटर हैंडल से
अपनी ही आत्मा की शांति का ट्वीट कर दिया

अब क्या था
मेरी अच्छाइयों की चर्चा
हर फेसबुक फ्रेंड करने लगा
डेढ़ घंटे में ही RIP CHIRAG का हैशटैग
सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा

मेरे बारे में ऐसी-ऐसी बातें लिखी गईं
जिनके बारे मैं मैं ख़ुद नहीं जानता था
उस दिन मैंने लगभग डेढ़ सौ ट्वीट उन अजनबियों के पढ़े
जिन्हें मैं अपना भाई मानता था

उस दिन मुझे पता चला
कि मैंने
अपनी हर नयी कविता को
किस-किस से ठीक करवाया
ढाई सौ लोग ऐसे मिले
जिन्होंने मदद करके
मेरा एक कमरे का मकान बनवाया

उस दिन हर इंसान के
बदले हुए किरदार दिख रहे थे
जो मुझसे उधार लिए बैठे हैं
वो भी मुझे कर्ज़दार लिख रहे थे

उस दिन इतनी ऊँची-ऊँची छोड़ी गई
कि छोड़ने वाले ख़ुद ही नहीं पकड़ पाए
तीन सौ लोगों ने मुझे उंगली पकड़ कर मंच पर चढ़ाया
और उनमें से ढाई सौ तो ख़ुद नहीं चढ़ पाए

एक ने तो यहाँ तक लिखा
कि मुझे हिन्दी का व्याकरण ही उससे ‘सिखा’

वो बहुत प्रतिभाशाली था
वो बहुत अच्छा था
हमेशा खरा बोलता था
मंच पर जादू करता था
हर ओर मेरे सद्गुणों की चर्चा ख़ूब होने लगी
कॉपी-पेस्ट टाइप की श्रद्धांजलियां पढ़-पढ़कर
मुझे मरने से ऊब होने लगी

जब लोगों ने मेरी बर्दाश्त से ज़्यादा
मेरा महिमामंडन कर दिया
तो मैंने अपने मरने की ख़बर का खण्डन कर दिया

खण्डन की ख़बर से
एक ओकेजनल फ्रेंड सचमुच उदास हो गया
कितनी मेहनत से श्रद्धांजलि की पोस्ट लिखी थी
तेरह सौ लाइक्स भी आ गए थे
सारी माइलेज का सत्यानाश हो गया

एक रिश्तेदार ने गुस्से में फोन किया
ये क्या तरीक़ा है भाईसाहब
पहली बार तो आपकी मौत की न्यूज़ मिली थी
वो भी झूठ हो गयी
आपकी तो शोकसभा तक हूट हो गई
मैंने तो तेरहवीं के लिए
हलवाई भी बुक करवा दिया है
भाईसाहब आपने नहीं मर के
मुझे मरवा दिया है

एक ने तो गुस्से में यहाँ तक कह डाला
फिर बच गया साला।

थोड़ी ही देर में मैं जान चुका था
कि आज की दुनिया में
मौत की ख़बर का भी
मल्टिपल यूज़ है
ऐसी हर ख़बर
किसी के लिए पोस्ट
किसी के लिए ट्वीट
और किसी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ है

हम लोगों को एक-दूसरे के मर जाने का इंतज़ार है
ज़िंदा बच जाने का डर है
संवेदना की लाश पर खड़े लोगों के लिए
अब मौत भी एक अवसर है

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!