Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
किसलिए है गुमान पानी को
मारता है उफ़ान, पानी को
कुछ नमी हो तो घर हुआ जाए
ढूंढता है मकान पानी को
चैन से बैठती नहीं लहरें
हो रही है थकान पानी को
रेत में दफ़्न हो गया क़तरा
देने निकला था जान पानी को
सबके अंदर का सच बयां होगा
मिल गई गर ज़ुबान पानी को
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता
कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता
भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता
चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता
किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
शायरी इक शरारत भरी शाम है
हर सुख़न इक छलकता हुआ जाम है
जब ये प्याले ग़ज़ल के पिए तो लगा
मयक़दा तो बिना बात बदनाम है
✍️ चिराग़ जैन