दीपावली
उत्सव से ऐसे करो, जीवन का शृंगार।
ज्यों मावस की रात में, दीपक का उजियार।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
उत्सव से ऐसे करो, जीवन का शृंगार।
ज्यों मावस की रात में, दीपक का उजियार।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
बरखा, बादल, बीजुरी, रिमझिम, झर-झर नीर
मीत संग सब नीक है, बिरहन कू सब पीर
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
अपना भी त्योहार है, उनका भी त्योहार।
अब तो मीठा कीजिये, आपस का व्यवहार॥
रथ पर शोभित हो गए, जगन्नाथ महाराज।
उनका रूप निहारने, ईद आई है आज॥
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
उत्सव हो, आह्लाद हो, हो अनुपम उल्लास।
अधरों पर मुस्कान हो, अन्तस में मधुमास।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
देख-देख कर सोचता, चाँद धरा से दूर।
आज छतों पर आ गया, सारे जग का नूर।।
करवे से जब अर्घ्य का, निभने लगा रिवाज़।
चन्द्रलोक तक बज उठा, जलतरंग सा साज।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
झुकना, माफ़ी मांगना, कठिन बहुत है यार
लेकिन इसके बाद है, चैन-सुकून अपार
बढ़कर माफ़ी मांगिए, छोड़ गुमान गुरूर
हाँ, हल्का हो जाएगा, मन का बोझ हुज़ूर
कुपित हुए, कुढ़ते रहे, क्रोधी, मूढ़ अधीर
क्षमाभाव को धारकर, सहज रहे सो वीर
✍️ चिराग़ जैन
संपर्क करें