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समस्या और समाधान

वर्ष 2004 की घटना है। अटल जी की सरकार चली गई थी। उन दिनों अटल जी कुछ अस्वस्थ रहने लगे थे। उन्हीं दिनों नानाजी देशमुख भी अस्वस्थ थे और दिल्ली स्थित दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान में प्रवास कर रहे थे। एक शाम अटल जी नानाजी से मिलने पहुँच गए।
नानाजी ने उन्हें डाँटते हुए कहा – “अटलजी! आप स्वयं अस्वस्थ हो, ऐसे में मेरा हाल जानने के लिए स्वयं आने की क्या आवश्यकता थी?”
अटल जी ने तपाक से उत्तर दिया – “मैं आपसे मिलने नहीं आया हूँ नानाजी! एक कनिष्ठ रोग एक वरिष्ठ रोग से मिलने आया है।”
उत्तर सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोगों के चेहरे खिलखिला उठे। नानाजी भी मुस्कुराए और सहज होते हुए पूछा – “आप अस्वस्थ हैं अटलजी! मेरा स्वास्थ्य ख़राब है। आपकी सरकार चली गई है। देश नेतृत्व के संकट से जूझ रहा है। इन तनावपूर्ण परिस्थितियों में तुम मुस्कुरा कैसे लेते हो?”
अटल जी ने उसी सहजता से उत्तर दिया – “नानाजी! तनाव से केवल समस्याएं जन्म ले सकती हैं, समाधान खोजने हैं तो मुस्कुराना ही पड़ेगा।”

✍️ चिराग़ जैन

अटल बिहारी वाजपेयी जी के महाप्रयाण पर

भारत का योग्य सपूत गया
मानवता का अवधूत गया
नैतिकता का क़िरदार गया
हिम्मत का लम्बरदार गया
संसद का उन्नत भाल गया
भारत माता का लाल गया
इक अद्भुत इच्छाशक्ति गई
सद्भावों की अनुरक्ति गई
जनहित का अथक प्रयत्न गया
भारत का अनुपम रत्न गया
दुनिया से बाज़ी मार गया
युग “अटल सत्य” से हार गया
धरती रोई, अम्बर रोया
हर इक आँगन, हर घर रोया
भीगी हैं करगिल की पलकें
संस्कृति के भी आँसू छलके
है मौन पोखरण की धरती
कविताओं की आँखें झरती
वक्तव्य कला का ताज गया
चुटकी का एक रिवाज़ गया
रसपूरित वाणी मौन हुई
तर्कों की भाषा गौण हुई
दिल्ली सूनी, संसद सूनी
जन-जन की पीर हुई दूनी
वह अनुशासन का पालक था
भीतर से निश्छल बालक था
जय-विजय खूंटियों पर टांगी
गरिमा की लीक नहीं लांघी
अन्तस् में नहीं दुभात चला
वह सबको लेकर साथ चला
कुछ पक्ष-विपक्ष नहीं जाना
मानव को बस मानव माना
वह राजधर्म का साधक था
भारत भू का आराधक था
जीवन जीकर भरपूर गया
वह शून्य क्षितिज पर पूर गया
लग गया श्वास लय पर विराम
हे दिव्य तुम्हें शत-शत प्रणाम

✍️ चिराग़ जैन

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