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लरजिश हमारे लहजे में

कहाँ अचानक मिले हैं हम-तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है महकती रुत उनके सुर्ख़ नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है किसी तरह भी समझने...
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