Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
तेरा पब्जी करके बैन,
तोय ऐसो मज़ा चखाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन,
तोय नानी याद दिलाय देंगे
जिन वीरों का सबरा जीवन टीकटोक ने खाया
एप्लिकेशन बैन करा के हिल्ला याद दिलाया
मेहनत करके दिन-रैन,
तेरा धंधा तले लगाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन
तोय नानी याद दिलाय देंगे
अपना माल वहीं पर रख ले, हम ख़ुद बनवा लेंगे
तेरे घर कम पड़ता हो तो, तुझको भिजवा देंगे
तेरे छोटे-छोटे नैन
प्रोडक्शन से फटवाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन,
तोय नानी याद दिलाय देंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
इस हाथ बातचीत, उस हाथ घुसपैठ
गोल-गोल न घुमाओ सीधे-सादे सीन को
हाथ मिल जाने से न कमज़ोर मान लेना
जड़ से उखाड़ सकते हैं आस्तीन को
बड़े-बड़े कोबराओं को नचाना जानते हैं
फिर न उठाना पड़े हमें उस बीन को
भारत के वर्तमान पीएम को जान लेना
चाय में मिला के कहीं बेच न दे चीन को
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Lapete Mein Netaji, Poetry
चीनी बॉर्डर पर करो, सबको क्वारन्टीन।
अपने ही हथियार से, डर जाएगा चीन।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
ओ मगरमच्छ के भ्रष्ट रूप, ओ दानव के कल्पित स्वरूप
इतिहास हमें बतलाता है, बड़बोला हानि उठाता है
बासठ की याद दिलाते भी, क्या बिल्कुल लाज नहीं आई
तब तेरे पुरखे भजते थे, हिंदी-चीनी भाई-भाई
ऊपर-ऊपर मीठा बनता, भीतर से खड़े सरौते सा
कहने भर को चीनी है पर, कड़वा है सड़े चिरौते सा
तिब्बत को आँख दिखाता है, लतियाता है शरणागत को
छल-द्वेष-धूर्तता ओढ़-ओढ़, शर्मिंदा किया तथागत को
क्या पता कौन सा दाँव कहाँ, कब कैसा मंज़र ले आए
ये सड़क बनाने का चस्का, कब तुझे सड़क पर ले आए
ओ चीनी मिट्टी से चिकने, ओ ड्रैगन से अस्तित्वहीन
ये बात भलाई की सुन ले, मत अहंकार में फूल चीन
तुझसे बातें करने में भी, नज़रें नीची करता भारत
ये बासठ वाला दौर नहीं, लड़ने से कब डरता भारत
ये समय विश्व-बंधुत्व का है, अब झगड़ा-वगड़ा ठीक नहीं
मानवता के उन्नति पथ पर, आपस का रगड़ा ठीक नहीं
भारत के सिंह दहाड़े तो, तेरा ड्रैगन डर जाएगा
दिल्ली शॉपिंग बंद कर दे तो, पीकिंग भूखा मर जाएगा
फिर भी मन बना चुका है तो तू देख लड़ाके भारत के
तू बस माचिस को हाथ लगा, फिर झेल धमाके भारत के
हम अनुनय भी कर सकते हैं, हम तीर चलाना भी जानें
सागर पूजन करते-करते, सागर लंघ जाना भी जानें
सागरमाथा फिर देखेगा बल-पौरुष कंचनजंगा का
फिर से गौरव गुंजित होगा दुनिया में अमर तिरंगा का
हम संख्या में हैं न्यून किन्तु हिम्मत में तुझसे न्यारे हैं
पाण्डव हर युग में जीते हैं कौरव हर युग में हारे हैं
है शांतिपर्व अंतिम अवसर समझौते वाली बोली का
इसके उपरांत महोत्सव है माँ रणचण्डी की डोली का
आमंत्रण मत दे मातम को ओ हठधर्मी दो पल डट जा
तेरा हित सिर्फ़ इसी में है सेना लेकर पीछे हट जा
✍️ चिराग़ जैन