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भारतीय राजनैतिक परिप्रेक्ष्य एक अस्थिर युग

भारतीय राजनैतिक परिप्रेक्ष्य एक अस्थिर युग की ओर बढ़ रहा है। मोदी सरकार के विरुद्ध एकजुट हो रहे क्षेत्रीय दलों का उद्देश्य यदि देश का विकास करना रहा होता तो सम्भवतः आशा की किरण फूट सकती थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। शासन के लोभ में विचारधारा तक को दरकिनार कर देने वाले सत्ता-लोलुप देश और समाज का कितना भला कर सकते हैं, यह स्पष्ट है। भारत का संविधान कहता है कि धर्म के आधार पर बने किसी संगठन को राजनैतिक दल की मान्यता नहीं दी जा सकती किन्तु अंधा भी देख सकता है कि भारतीय राजनीति की धुरि धर्म, सम्प्रदाय, जाति जैसे शब्दों से ही संचालित है। यदि देश के विकास और आम नागरिक के हितों की चिंता किसी की दृष्टि में चमक उठे तो फिर जनता का समर्थन जुटाना मुश्किल न होगा। यह सत्य है कि राजनैतिक मक्कारियों और ढिठाई से इस देश का मतदाता लोकतंत्र से ऊब गया है इसीलिए राजनैतिक दलों को अपने नैतिक चरित्र में सुधार करना होगा। फुटेज कैप्चर की ड्रामेबाज़ी और जनता के हितों का नाम लेकर बहाए जा रहे मगरमच्छी आँसू बेअसर होते जा रहे हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि राजनैतिक भ्रष्टाचार और झूठ-धोखाधड़ी की ख़बरें अब जनमानस को आश्चर्यग्रस्त नहीं करतीं। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए भयावह है। इसी स्थिति का दुष्परिणाम है कि जंतर-मंतर पर जब अन्ना ने जनता का आह्वान किया तो पूरा देश उमड़ पड़ा। अन्ना आंदोलन भारतीय राजनैतिक रवैये को जनता का प्रत्युत्तर था। यह और बात है कि जनता में अरमानों पर पैर रखकर वह आंदोलन भी राजनीति की अट्टालिकाओं पर क़ाबिज़ हो जाने का जरिया बन कर नष्ट हो गया। हम भाजपा से दवाई मांगते हैं तो वो कहती है कि सत्तर साल से कांग्रेस ने दवाई नहीं दी। अब हम क्या चार साल में ही दवा दे दें। जाओ कुछ दिन और कोढ़ से मवाद बहने दो। कांग्रेस से दवाई मांगते हैं तो वह कहती है कि आरएसएस देश को बाँट रहा है। इसलिए पहले मोदी को हटाएंगे तब आना। फुटपाथों पर सोने वाले अभी भी छहों ऋतुएं फुटपाथ पर बिता रहे हैं। सरकार गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील में जितना रुपया फ्लैक्स प्रिंटिंग में लुटा रही है उतने से यदि फुटपाथों को छप्पर दे दिया जाता तो जनता के मन में पसरा अंधकार कुछ कम होता। सरकारी योजनाएँ मख़ौल बन कर रह गई हैं। जनता अपने भाग्य का अंधकार स्वीकार कर चुकी है। सिद्धू के पाकिस्तान दौरे पर एक सप्ताह हंगामा होता है और जनता की मूलभूत समस्याएं केरल की बाढ़ में जलसमाधि ले लेती हैं। सरकार हर साल बरसात में बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में हेलीकॉप्टर का दौरा करके वोट के बीज बिखेर आती है। नदियों का पानी ज़हर हो गया है, हम साँस लेने के लिए हवा खींचते हैं और फेफड़ों तक दमे का संचार हो जाता है। प्रश्न मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, लालू, नीतीश, उद्धव, ओवैसी, महबूबा, केजरीवाल, ममता या अन्य किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छाशक्ति का नहीं बल्कि भारतीय राजनैतिक परिदृश्य से उठ रही सड़ांध का है। बलात्कार, लूटमार, अपहरण, ठगी, कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचार की ख़बरें संसद की निष्ठा पर प्रश्न उठाती हैं। अराजक भीड़ कानून हाथ में लेकर लोकतंत्र की न्यायव्यवस्था को ठेंगा दिखा देती है। राजनैतिक संरक्षण के दम पर कोई भी ऐरा-ग़ैरा तंत्र को लताड़ सकता है। …क्या है ये सब? देश की जनता सोशल मीडिया की अफ़वाहों को भी गंभीरता से ले लेती है साहिबों! भावुक भारतीयों को बरगलाना बहुत आसान है। यदि यह भावुकता आपके चरित्र के विरुद्ध एकजुट हो गई तो जो स्थिति उत्पन्न होगी वह संभाली न जा सकेगी। इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि जनता के हितों को अपनी वास्तविक वरीयता सूची में स्थान दीजिये, चुनाव की जीत तो झख मार के ख़ुद आपके पीछे आएगी!

✍️ चिराग़ जैन

मीडिया की महानता

जंतर मंतर पर गजेन्द्र सिंह फांसी झूल गया। मीडिया की मौज हो गई। गजेन्द्र सिंह पर हर चैनल ने पीएचडी कर मारी। वहां वसुंधरा क्यों नहीं गई। वहां अरविन्द केजरीवाल क्यों चुप रहा। किसने उसकी चिता जलाई। कौन उसकी बेटी है। किसको उसने फोन किया। सारी पड़ताल दो दिन में हो गई।

उसको न्याय मिलने ही वाला था कि नेपाल की धरती हिल गई। नेपाल में तबाही मच गई और मीडिया में हाहाकार।गजेन्द्र के परिवार की गुहार इस हाहाकार में दब गई। उन अनाथ बच्चों को स्टूडियो से बाहर फ़ेंक कर मीडिया नेपाली हो गया। कौन सी बिल्डिंग गिरी। जब बिल्डिंग गिरी तो लोग कैसे भागे। किस मंदिर में चमत्कार हुआ। किस मलबे में कितने लोग फंसे हैं। सारी रिसर्च ही गई। अभी मलबा पूरी तरह हटा भी नहीं था कि रामदेव की पुत्रजीवक वटी का मुद्दा मीडिया की मशीन में पेल दिया गया। सुबह से शाम तक हर चैनल पर रामदेव और त्यागी जी। उस दवाई के नाम में क्या गुनाह था ये स्पष्ट होता इससे पहले मीडिया को कुमार विश्वास मिल गया। मिडिया ने त्यागी जी को त्याग कर कुमार विश्वास और लड़की का दामन थाम लिया। दोनों पक्ष ये कहते रहे कि हमारे बीच कोई सम्बन्ध नहीं हुए।लेकिन मीडिया ने दो दिन तक कुमार विश्वास का चीरहरण किया। कुमार की इज़्ज़त पूरी तरह लुटती इससे पहले सल्लू मियां पर फैसला आ गया। बेचारे सलमान को जिसने केवल एक फुटपथिये को कुचला था। उसको इतनी भारी सज़ा हो गई। अदालत की इस बर्बरता पर मीडिया ने सवाल उठाए। पूरे देश में दुःख की लहर दौड़ गई। अब देखना ये है कि अगला नंबर किसका है।

हमारा देश इतने जागरूक मीडिया से धन्य है। वो और देश होंगे जिनकी मिडिया को मुद्दों की तलाश होती है। हमारे न्यूज़ चैनल तो जिस पर बात करने लगें, वही मुद्दा हो जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि मुद्दे खुद न्यूज़ चैनल के बाहर लाइन बनाकर खड़े हैं। हालात ये है कि किसी भी मुद्दे को दो दिन से ज़्यादा का स्लॉट नहीं मिल पा रहा। इतनी व्यस्तता के बीच भी संसद की चर्चा, भूखे को रोटी, सरकारी भ्रष्टाचार, गर्मी से झुलसते लोग, हवा में बढ़ता प्रदूषण और जीवन स्तर की बेहतरी को दरकिनार कर हमारा मीडिया ऐसे बिना बात के मुद्दों पर पूरी ऊर्जा से चीखता चिल्लाता है; इससे ज़्यादा महानता और क्या होगी।

✍️ चिराग़ जैन

केजरीवाल भव

अन्ना एक बार फिर आंदोलन मूड में आ गये हैं। जो लोग पिछली बार उन्हें हल्के में ले रहे थे वे गंभीर दिखाई दे रहे हैं। जिन लोगों ने केजरीवाल के शपथ ग्रहण समारोह के बाहर खड़े होकर अपनी क़िस्मत को कोसा था, उनको अन्ना ने एक बार फिर अवसर प्रदान कर दिया। वे भी सब अपनी-अपनी कोसी हुई किस्मत को धो-धा कर चैक की शर्ट और बाटा टाइप स्लीपर से सजा कर आंदोलन में जा पहुँचे। क्योंकि अब वे समझ चुके हैं कि इतिहासों में जो चूक हुई थी उसको सुधारने का यही एक मौक़ा है। अच्छी नौकरियाँ छोड़ चुके सभी निठल्लों की बीवियाँ पुरानी पैंट-शर्ट पहना कर अपने-अपने पिया की आरती कर उन्हें जंतर-मंतर भेज रही हैं। लुंगी लपेटे अपनी चांद पर हाथ फेरते पिता जब नालायक बेटे को जंतर-मंतर की ओर जाते देखते हैं तो मन ही मन ईश्वर से उसे बुद्धि देने की कामना करते हैं। दिन भर चीखने-चिल्लाने के बाद जब गला बैठाकर यह होनहार अश्वमेध के अश्व सा घर लौटता है और फटे स्पीकर सी आवाज़ में ‘माँ पानी’ के उद्गार उवाचता है तो ममता भीग उठती है। द्वार पर खड़ा पुत्र अचानक माँ को नये रूप में दीखने लगता है। महीनों से तेल के प्यासे उसके झूतरे अचानक चिपक कर साइड की मांग काढ़ लेते हैं। उसके लम्बे खुरदरे चेहरे के भीतर से एक गोल सा चिकना चेहरा उभरता है जिसका ऊपर का होंठ काली मूँछों के बालों से ढँका हुआ है। हमेशा ऊपर के तीन बटनों से विहीन रहने वाली उसकी कमीज़ अचानक सीधी हो जाती है और उस पर नीले रंग का एक स्वेटर चढ़ जाता है। सालों से बिना धुली उसकी जीन्स अचानक एक क्लर्क स्टाइल की पैंट में ढल जाती है जिसकी लुप्पियाँ बैल्ट के अभाव में किसी बेवा सी तो लगती हैं, पर अखरती नहीं। वाक्य के आदि में ‘अबे’ तथा ‘साले’ जैसे अलंकार लगाने वाला भाषा-संस्कार अचानक वाक्य के अंत में ‘जी’ लगाने लग गया है।
रात को बिस्तर पर लेटी हुई माँ विपरीत दिशा में मुँह किये पड़े अपने सुहाग से कहती है- ‘सुनो जी, आज तो पप्पू थक कर आया है।’
‘हम्म्म्म…’ उसी मुद्रा में लेटे-लेटे गहरी उच्छवास के साथ सुहाग हुंकारा भरता है।
‘जंतर मंतर गया था… अन्ना आंदोलन में’
‘हम्म्म्म’ …अबकी बार हुंकारे के साथ करवट लेते हुए सुहाग ने अपनी निगाहें दीवार की सीलन से हटा कर छत की सीलन पर टिका दीं।
‘ख़ूब नारे लगाये, गला भी बैठ गया बेचारे का।’ माँ की आवाज़ में रीझने से उत्पन्न होने वाली खनक मिल चुकी थी।
‘कुछ मुलहठी दे देती, गला खुल जायेगा।’ पिता की प्रतिक्रिया हुंकारे से आगे बढ़ी।
‘मुझे तो हमेशा लगता था, एक दिन हमारा पप्पू बहुत बड़ा आदमी बनेगा।’ …पिता की बात को हमेशा की तरह अनसुना करते हुए माँ बोली।
‘किस चीज़ का आंदोलन कर रहे हैं अन्ना?’ पिता ने उम्मीद की किरण के एक छोर को सावधानी से स्पर्श करते हुए उत्तर की अपेक्षा को ताक पर रख कर पूछा।
‘मुख्यमंत्री बनाने का…’ अबकी बार माँ की ममता अपने मन की आवाज़ अनसुनी न कर सकी।
अचानक रात के दूसरे पहर में कई झुग्गियों से एक साथ कई पिताओं की उच्छवास निकल कर आकाश पर छा गई। हर पिता के मुँह से निकली कार्बन डाईऑक्साइड की हर लक़ीर के पीछे अपने-अपने सुत के हित एक ही आशीर्वाद लटक रहा था- ‘केजरीवाल भव।’

✍️ चिराग़ जैन

आन्दोलन

हम तो हर इक ज़ुल्म की हद से गुज़र भी जाएंगे
शेर के बच्चे हैं, अपनी ज़िद पे मर भी जाएंगे
ताश के पत्तों से बनते हैं सियासत के मकां
ये तुम्हारे घर हवाओं से बिखर भी जाएंगे

कौन रोके, गर फना होने पतंगा आ गया
एक बादल सूर्य से लेने को पंगा आ गया
ये सियासतदां संभल जाएं कि अब इस मुल्क में
नौजवां पीढ़ी के हाथों में तिरंगा आ गया

हमें ज़हमत हुई और आप पर इल्ज़ाम आया है
चलो जो कुछ हुआ, जैसा हुआ, सब काम आया है
सफ़र में मुश्क़िलें थीं, दर्द था, डर था, कराहें थीं
मगर हर ज़ख़्म को भरता हुआ अंज़ाम आया है

✍️ चिराग़ जैन

अन्ना आंदोलन

आज मैंने
एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा

मैंने देखा
एक होड़ सी लगी थी
बारिश के जज़्बे से
लोगों के जज़्बे की।

झमाझम बरसात में
दिल्ली की सड़कें
उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से।

किसी को कोई डर ही नहीं था
बीमार पड़ने का
क्योकि
वे सब आए थे
देश की महामारी का
इलाज़ करने।

जहाँ तक निगाह जाती थी
सिर ही सिर नज़र आते थे।
…आज मैंने महसूस किया
कि किसी गांधी की एक आवाज़ पर
कैसे उठ खड़ा होता था
पूरा भारत!

✍️ चिराग़ जैन

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