+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

नेपाल भूकंप त्रासदी

ईश्वर के एक इशारे पर
मानवता दहल गई सारी
लेकिन मानव की जिजीविषा
पल भर भी हिम्मत कब हारी
धरती डोली, हड़कंप मचा
ईश्वर ने यह भूकंप रचा
भय, शोक, करुण-चीखें, पुकार
मानव मन काँपा बार-बार
क्षण भर में भीषण वज्रपात
धन-जन हानि और प्राणघात
लेकिन अगले ही पल मानव
भरकर भीषण हुंकार उठा
जो चला गया उसको तजकर
कर जीवन का सत्कार उठा
दुनिया हर वर्गभेद भूली
मानवता की आशा फूली
हर दिशा सहायक हो आई
ज़ख़्मों का मरहम ले आई
मनुपुत्र मिलाकर ताल चले
अब कैसा भी भूचाल चले
हम फिर से गाँव बसा लेंगे
छप्पर से छाँव जुटा लेंगे
ईश्वर तेरे सुत दीन नहीं
भय से हारें वो हीन नहीं
कल फिर से सृजन करेंगे हम
फिर तेरा भजन करेंगे हम

✍️ चिराग़ जैन

सोशल मीडिया

फेसबुक पर छा गए लिक्खाड़
लिखते हैं दनादन
हर किसी मुद्दे पे इनकी राय है तैयार

बहुत बेख़ौफ़ लिखते हैं
इन्हें लिखे हुए शब्दों की ताक़त का
कोई आभास तो हो
इन्हें मालूम हो
इनकी बिना सोची हुई हर बात
पल भर में
किसी की साख पर बट्टा लगाती है

हवस-सी हो गई है
सबसे पहले
अपनी एफबी वॉल पर
सबसे ज़ियादा लाइक पाने की

इन्हें मालूम है सब कुछ
विदेशी ताक़तों ने
किस तरह बाज़ार को शैदा किया है
और ये भी इल्म है
कौन किसने कब कहाँ
किस गाँव में पैदा किया है
कौन कब मर जाएगा
कैसे मरेगा
कौन से ट्रक में लदेंगी गाय
कब हिन्दू डरेगा
कोई तो हो, जो इन्हें ये सब
बयां करने से पहले
दो घड़ी को ही
मगर कुछ सोच लेने की
हिदायत दे

ये नहीं कर पाए तो
ये काम कर दे
जब नए युग के ये सारे वर्चुअल भगवान
अपनी वॉल पर
ज़िंदा यूसुफ़ खानों के मरने की
नई तहरीर लिख दें
तो उसे पढ़ कर
युसुफ जी
ख़ुद-ब-ख़ुद उस बात को
सच में बदल डालें

ये नहीं समझेंगे
जब ये लोग
लोहू से रची ग़ज़लेँ चुराकर
पोस्ट करते हैं
तो उन ग़ज़लों पे मिलने वाली हर तारीफ़
उस शाइर के हक़ को
छीन लेती हैं
किसी कविता को
उसके रचयिता के नाम से
महरुम करना
किसी बच्चे को बिन कारण
यतीमी के जहन्नुम में
पटक देने के जैसा है।

इन्हें कोई ज़रा समझाए
चाकू सिर्फ़ इक औजार है
बस सृजन जिसका काम है
इसे हथियार में तब्दील कर देना
गुनाह से भी कहीं ज़्यादा बुरा है
बड़ा इलज़ाम है।

✍️ चिराग़ जैन

ज़िंदगी

सादगी के आँगन में
चहकी है, खेली है
हाव-भाव बदले तो
ज़िंदगी अकेली है
ओढ़ी हुई बातों से
कष्ट में धकेली है
सहजता सफलता की
पक्की सहेली है

एक तरफ़ जकड़न है
क़ातिल शिकंजा है
नाख़ूनी रंजिश है
नफ़रत है, पंजा है
उसी के ज़रा पीछे
प्यार की हवेली है
सहजता से खुली हुई
गुदगुदी हथेली है

बचपन से सीखा है
उत्तर उन्हीं में है
जिन शब्दों से मिलकर
बनती पहेली है

✍️ चिराग़ जैन

सवेरों का निरादर

यूँ तो हम युग के शिलालेखों पे अंकित हो गए
जो जिए हमने वो सारे दिन अलंकृत हो गए
किन्तु जब युग की टहनियों पर नई कोंपल उगी
तो हरे पत्ते हवाओं से सशंकित हो गए

जब हमारी श्वास में सरगम सजी आनन्द था
हम उठे, जग ने गई रस्में तजीं आनन्द था
जब हमारी गुनगुनाहट राग बनकर पुज गई
थपकियों से बन गई तालें, अजी आनन्द था
किन्तु जब युग में नई बन्सी बजी तो क्या हुआ
क्यों हमारे पीर वाले तार झंकृत हो गए

कुल मिलाकर ज़िन्दगी है चार पहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
सांझ को दुल्हन सी सजती है सभी की ज़िन्दगी
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह
ब्रह्म की संज्ञा भी दे सकते थे अंतिम प्रहर को
क्यों सवेरों का निरादर कर कलंकित हो गए

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!