विचारधारा
विचारधारा वह बोझा है, जो योग्य पात्रों पर लादकर कुम्हार हाथ हिलाते हुए ‘इधर-उधर’ विचरते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
विचारधारा वह बोझा है, जो योग्य पात्रों पर लादकर कुम्हार हाथ हिलाते हुए ‘इधर-उधर’ विचरते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
भारतीय राजनीति, जनता को, मिलकर रहने की प्रेरणा देती है। धर्म, विचार, आदर्श, सिद्धांत और विचारधारा जैसे खिलौनों में उलझकर आपस में द्वेष उत्पन्न करनेवाले लोगों को राजनीति से सीखना चाहिए कि इन सब रास्तों का अस्तित्व वहीं तक है, जहाँ तक गंतव्य दिखाई न देता हो। एक बार गंतव्य दिखाई दे जाये; फिर इन शब्दों को विस्मृत कर देना ही सफल मनुष्य का कर्त्तव्य है। जो मार्ग ईश्वर तक न पहुँचाता हो वह अधर्म है; इसी प्रकार जो सिद्धांत सत्ता तक पहुँचाने में बाधा दे, उसका वध कर देना ही उचित है।
अध्यात्म में जिन्हें स्थितप्रज्ञ कहा गया है, वे वास्तव में राजनीति के गलियारों में ही वास करते हैं। जनता चाहे आपके लिये लड़-लड़कर मर रही हो, कार्यकर्ता चाहे आपके प्रति श्रद्धावान रहकर अपना तन-मन झोंक चुका हो; किन्तु सत्ता पर अधिकार करने के लिये जनता की भावनाओं और कार्यकर्ताओं के समर्पण की बेड़ियों को तोड़ देनेवाला ही वास्तव में शासन के योग्य माना जाता है।
बरसों-बरस मनुवाद को पानी पी-पीकर कोसनेवाले यदि भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर उस समय उत्तर प्रदेश की कुर्सी न हथियाते तो कार्यकर्ताओं की भावना को क्या धरकर चाटते? साँप और नेवले की तरह लड़नेवाले सपाई, अगर बसपाइयों के चरण न पखारते तो लोहिया जी के सिद्धांतों का क्या अचार डालना था?
राजनीति निरंतर हमें अपने आचरण से यह समझाती रहती है कि सफल होनेवाले व्यक्ति सिद्धांतों की पूँछ पकड़कर नहीं चलते, वे तो ‘महाजनो येन गतः स पन्थः’ की नीति पर चलकर सदैव सत्तारूढ़ रहते हैं। नीतीश कुमार जी लालूप्रसाद यादव के साथ गठबंधन करते समय यदि राजद के प्रति कहे गए अपने ही वचनों का स्मरण करने के चक्कर में पड़े होते तो कुर्सी पर ध्यान केंद्रित कैसे करते? ये महान योगी तो वर्तमान में जीते हैं। अर्जुन की तरह उन्हें केवल मंत्रालय की कुर्सी दिखाई देती है; अन्य वस्तुएँ उनकी एकाग्रता से अछूती ही रहती हैं। कल किसको क्या कहा था और कल किसको क्या कहा जायेगा – इन ओछे प्रश्नों में उलझना तो कार्यकर्ता का काम है। इन सबसे ऊपर उठे बिना आप कार्यकर्ता तो हो सकते हो, नेता नहीं।
नेता बनने के लिये तो स्वयं अपनी ही कही हुई बातों से विमोह करना पड़ता है। जिसको गाली दी जा रही है और जो गाली दे रहा है ये दो महाशक्तियाँ जब एकाकार होकर मंच पर गले मिलती हैं तब कहीं जाकर एक सरकार बनती है।
शिवसेना की कट्टरपंथी छवि के समस्त अवगुणों को ‘थोथा देय उड़ाय’ की तरह मन से भुला कर विधायकों की संख्या का सद्गुण ग्रहण करते हुए जब कांग्रेस महाराष्ट्र राज्य की सरकार का निर्माण करने के लिये राज़ी हो जाती है तब कहीं जाकर यह ज्ञात होता है कि राजनीति के हठयोगियों को कितनी कठिन साधना करनी पड़ती है।
राजनेता को जनक की तरह विदेह भी होना पड़ता है। एक ही समय में एक ही पार्टी का केंद्र में समर्थन तथा राज्य में विरोध करने का कार्य बड़े-बड़े योगियों के वश में भी नहीं है। किंतु हमारे राजनेताओं ने यह दूभर कार्य अनेक अवसरों पर कर दिखाया है।
पीडीपी और भाजपा का गठबंधन; राजद और कांग्रेस का गठबंधन; वामपंथ और दक्षिणपंथ का गठबंधन… और न जाने कितने असम्भवप्रायः संयोग बनाकर भारतीय राजनीति ने हमें बार-बार समझाया है कि शत्रु और मित्र केवल चुनावी रैलियों में होते हैं; सदन में यह सब नहीं चलता। जो इन सबमें फँसते हैं वे कभी सदन के दर्शन नहीं कर पाते।
इसलिए हे कार्यकर्ताओ! राजनीति में रोचकता बनाए रखने के लिए ख़ूब लड़ो। जो अभी हमारे साथ नहीं है उसको ख़ूब गालियाँ दो। उसके कच्चे चिट्ठे खोलकर उसे भरे बाज़ार में नंगा करो। जो उसका समर्थक हो उसे अपना शत्रु मानो। उससे मित्रता, रिश्तेदारी और मनुष्यता तक समाप्त कर दो। किन्तु जैसे ही वह हमारे साथ मिल जाए, तुरंत उसका गुणगान करना प्रारंभ करो। उसके ऊपर लगनेवाले भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से ख़ारिज करो। उसके समर्थक को रिश्तेदार बना लो।
यदि यह सब करते समय तुम्हें हैरानी अथवा परेशानी हो; तुम्हारा ज़मीर तुम्हें धिक्कारने लगे; तुम्हारी आत्मा तुम्हारे हाथ पकड़ ले तो समझ लेना कि तुम्हारा जन्म केवल झण्डे और बिल्ले बाँटने के लिए ही हुआ है; तुम्हारा कार्य केवल पार्टी कार्यालय के बाहर इलेक्शन के बाद भीड़ बनकर नाचने तक सीमित है; तुम्हें मृतज़मीर सिद्धों के ट्वीट को वायरल करने में ही अपनी ऊर्जा लगानी चाहिये क्योंकि राजनेता बनना तुम्हारे वश का रोग नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
महापुरुषों के लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है। यदि उनके वश में होता तो फेसबुक से अपनी डेट ऑफ बर्थ और डेट ऑफ डेथ ग़ायब कर देते। न रहता बाँस, न बजती बाँसुरी। पिछली 30 जनवरी को गांधी पूरे दिन सहमे रहे। क्योंकि सत्तर बरस बाद भी उनके देशवासी इस बात पर सहमत नहीं हो पाए हैं कि गांधी को आदर देना चाहिए या गाली। उनकी मृत्यु, हत्या थी या वध। उनका हत्यारा दैत्य था या देवता। एक बार क्लियर कर लो भाई। इतने बड़े देश में एक बार वोटिंग करवा लो, जो बहुमत तय कर दे, वह मान लो। रोज़-रोज़ की फ़जीहत क्यों करते हो। यही हाल 27 मई को नेहरू का था। लेकिन चुनावों में उन्हें जी भरकर कोसनेवाले रहनुमा ने जब राष्ट्र के नाम ट्वीट करके बताया कि नेहरू उतने बुरे नहीं थे, जितना मैं उन्हें चुनावी रैलियों में सिद्ध कर आया था, तो नेहरू की आँखों से ख़ुशी के आँसू निकल पड़े। 28 मई को सावरकर ने नेहरू को सूचना दी कि हाल मेरा भी बढ़िया नहीं है। पूरा देश दिन भर फेसबुक पर यही चिंतन करता रहा है कि सेल्यूलर जेल में मिले ज़ख़्मों पर मरहम लगाई जाए या माफी वाली चिट्ठी से इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ाई जाएँ। चंद्रशेखर आज़ाद भी कई वर्ष से कन्फ्यूज़ हैं कि जिस देश के लिए उन्होंने प्राण दिए, वह उन्हें शहीद समझता है या आतंकवादी! ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने टैगोर से पूछा कि गुरुदेव मेरा कुसूर क्या था। मैंने तो कभी सम्मान भी नहीं चाहा। उनका प्रश्न अनसुना करके गुरुदेव ने कहा, ”बाद में आना यार, अभी मैं ये समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि मैं जॉर्ज पंचम का चाटुकार हूँ या माँ भारती का बेटा हूँ।“
सबसे दयनीय स्थिति हेमंत करकरे की है। कई वर्ष तक बहादुरी की मिसाल बने रहने के बाद अचानक देश को लगा कि इस आदमी की थोड़ी ज़्यादा इज़्ज़त हो गई है। इसलिए उन्हें ग़द्दार, क्रूर, दोगला और न जाने क्या-क्या अलंकरण देकर ऐसा कर दिया कि परलोक में उन्होंने अपने बंग्ले के बाहर नेमप्लेट पर हेमंत किरकिरे लिखवा लिया है।
हाल ही में सारे महापुरुषों ने एक साझा बयान जारी करके कहा है कि- ‘प्यारे देशवासियो! हमारी मूर्तियों को तुड़वाकर फेंक दो, पाठ्यक्रमों से हमें बाहर कर दो, हमारे क़िस्से अगली पीढ़ियों को बिल्कुल मत बताओ, हमारे नाम को हर भवन, सड़कें, धर्मशालाएँ, अस्पताल, हवाई अड्डे, शहर, कस्बे, मुहल्ले पर से मिटा दो, हमारी समाधियों पर सरकारी दफ़्तर बनवा लो और देश के हर प्रवेश द्वार पर हमारे मुँह पर कालिख पुता चित्र स्थापित कर दो, ताकि इस देश में प्रवेश करनेवाला हर शख़्स यह सबक ले सके कि जो माली बाग़ को सुरक्षित रखने की झोंक में ज़मीन में संस्कार बोने भूल जाता है, उसका क्या हश्र होता है।’
✍️ चिराग़ जैन
जो केजरीवाल कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसते थे वे ही दिल्ली में कांग्रेस से गठबंधन के लिए रिरियाते रहे। ताकि किसी भी तरह से सत्ता पाई जा सके। जो भाजपा महबूबा मुफ्ती को गद्दार कहती रही उसी ने सत्ता के लिए महबूबा मुफ्ती से गठबंधन करके सरकार बनाई। जिन नीतीश कुमार ने मोदी के प्रति घृणा के कारण बाढ़ सहायतार्थ भेजा गया गुजरात सरकार का चैक लौटा दिया वही आज भाजपा के साथ हैं। जिस लालू यादव को बिहार का दुर्भाग्य कहते फिरते थे उसी के साथ मिलकर नीतीश बाबू ने बिहार में सरकार चलाई। जो मायावती “तिलक, तराजू और तलवार” का नारा देकर राष्ट्रवादियों को कोसती रही, वे ही राष्ट्रवादियों से गठबंधन कर के मुख्यमंत्री बनीं। जो समाजवादी मायावती के लिए अपशब्दों की वर्षा करते थे वे ही आज मायावती के साथ मिलकर मोदी को हराने निकले हैं। जो शिवसेना मोदी सरकार के चरित्र को छद्म हिंदुत्व की पाठशाला कहते थे, वे ही मोदी सरकार से मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। जो प्रियंका चतुर्वेदी कांग्रेस के गुण गाती रही वे ही कांग्रेस को गुंडों की पार्टी घोषित करके शिवसेना जैसी शांत प्रवृत्ति की पार्टी में चली गईं। जो सिद्धू मोदी जी नू देवता बताते रहे वे ही आज सोनिया जी की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं। इसी वर्चस्व की लड़ाई में शिवपाल-अखिकेश, तेजस्वी-तेजप्रताप जानी दुश्मन हो गए हैं। अमरसिंह, जयप्रदा, सुखराम, शत्रुघ्न सिन्हा, रामविलास पासवान, किरण बेदी और शाजिया इल्मी जैसे लीडरों को देख कर समझ आता है कि विचारधारा, नैतिकता, देशहित, देश सेवा और निष्ठा जैसे शब्द केवल वह आटे की गोली है जिसके दम पर कार्यकर्ता नामक मछली फँसाई जाती है। राजनीति शुद्ध धंधा बन चुकी है। इसमें कोई स्थायी मित्र नहीं है, कोई स्थायी शत्रु नहीं है। 23 मई को परिणाम घोषित होने के बाद ये सब देशभक्त रेटलिस्ट लगा लगाकर अपनी निष्ठा का सौदा करेंगे और मंत्रीपद, मुख्यमंत्री पद, घोटाले दबाने की मंज़ूरी, कुछ करोड़ रुपये तथा अन्य राजनैतिक लाभों की कीमत फेंककर लोकतंत्र की इज़्ज़त उतार दी जाएगी। इन बेशर्म धंधेबाज़ों के लिए सामाजिक सद्भाव को होम न कीजिये। देश में राजनीति ही सब कुछ नहीं है। जब ये हमें धर्म, जाति के जुमलों से उकसाएं और हम लड़ने को तैयार न हों तो इनके वैभत्स्य का मनोबल टूटेगा। जो ऊर्जा हम कांग्रेस-भाजपा की बहस में नष्ट कर रहे हैं उसको यदि अपने काम को ईमानदारी से करने में निवेश करें तो सचमुच देश का विकास हो जाएगा। मतदान के समय अपने विवेक से इन सब दुकानदारों में से किसी एक को वोट दे आएं या नोटा दबाकर राजनैतिक हताशा प्रकट करें… इससे अधिक इस लोकतंत्र में वोटर की कोई भूमिका नहीं है। जिसे जो काम मिला है उसे वह काम बेहतर ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए। रिक्शा वाला यदि ट्रैफिक के रूल्स मानते हुए सवारी को ठगे या लूटे बिना मंज़िल तक पहुंचता है तो वह भी अपनी क्षमताओं के अनुरूप देश की सेवा ही कर रहा है। हर आम नागरिक की यह चेतना जागृत रही तो यहीं से देश के विकास का मार्ग खुल जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं।
जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई बातों को कुतर्क की भूल-भुलैया में उलझाकर उसका मेकअप करने में सक्षम हैं भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल, इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं।
जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई बातों को कुतर्क की भूल-भुलैया में उलझाकर उसका मेकअप करने में सक्षम हैं उनके आगे सुनी-सुनाई बातों की तो कोई औक़ात ही नहीं है। इन दिनों, कुछ ऐसे विद्वानों की भी तादात बढ़ गई है, जो स्वरचित इतिहास के दम पर, पढ़ने से परहेज करनेवालों से मैगस्थनीज़ की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं।
जातीय विश्लेषण और ऐतिहासिक चरित्रों के नितांत व्यक्तिगत मनोभावों का बखान इन विद्वानों का प्रिय कर्म होता है। इनके आत्मविश्वास की दूरबीन इतनी शानदार होती है कि ये इक्कीसवीं सदी में बैठकर चंद्रगुप्त के मोबाइल पर पड़े एसएमएस पढ़ लेते हैं। दुर्याेधन, शकुनि, अम्बिका, भीष्म, द्रौपदी, मंथरा, विभीषण, मंदोदरी और अंगद आदि तो कलयुग तक चलकर आते थे इन्हें अपनी मनोदशा बताने। कृष्ण, बुद्ध, महावीर, पैगम्बर, ईसामसीह और राम तो इन महान विद्वानों के निर्णय की प्रतीक्षा में हाथ बांधे खड़े हैं कि ये लोग सुनिश्चित कर लें तो हम भी ख़ुद को महान मान लें।
पुराने धुरंधरों को धूसर करने के बाद इनकी चर्चाएँ मुग़ल काल और हिन्दू शासकों पर गोलाबारी करने लगती है। बाबर, अकबर, औरंगजेब, महाराणा प्रताप, शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान और शाहजहाँ इनके प्रिय पात्र हैं। मुग़ल काल की घटनाओं का बखान करते हुए ये विद्वान अक्सर मुग़ल-ए-आज़म की अनारकली, बाबरनामा, आईने-अकबरी और अकबर-बीरबल के किस्सों की खिचड़ी पका देते हैं और फिर उसी पतीले में डूबकर महफ़िल समाप्त कर देते हैं। यही स्थिति राजपूतों के इतिहास, पद्मावत महाकाव्य और जौहर की कथाओं के साथ भी घटित हो रही है।
इससे आगे बढ़कर जब स्वाधीनता संग्राम के नायकों की चर्चा निकलती है तो सारे स्वघोषित इतिहासकार अपनी-अपनी विचारधारा के चश्मे लगाकर ज्ञानी बन जाते हैं। लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे, नाना फड़नवीस, मंगल पांडे, बहादुरशाह ज़फ़र और टीपू सुल्तान की मट्टी पलीद करने के बाद ये महान इतिहासकार चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह, रासबिहारी बोस और अशफ़ाकुल्लाह ख़ान के पीछे पड़ते हैं। बीच-बीच में विवेकानन्द और दयानन्द सरस्वती को भी कुछ खरोंचे आती हैं। उसके बाद जब बात गांधी, मुखर्जी, सावरकर, लोहिया, जिन्ना और नेहरू तक आती है तो ये विद्वान अपना आकार घटोत्कच्छ की तरह विराट कर लेते हैं। इस समय गांधी, नेहरू इनकी गोदी में खेलते बौने बालकों जैसे दिखने लगते हैं जिनको ये कभी भी थप्पड़ मारकर चुप करा सकते हैं। पटेल और शास्त्री इन्हीं की सलाह पर गांधी जी और नेहरू जी को लताड़ने लगते हैं। और इसके बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मोरारजी, नरसिम्हा राव और अटल जी तो इनके इशारों पर भरतनाट्यम की मुद्रा में कठघरे में खड़े ही हुए हैं।
आजकल व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर इन महान इतिहासवेत्ताओं का अभियान ज़ोर-शोर से जारी है। राजनीति इन अनर्गल चर्चाओं पर वोट की रोटियाँ सेंकने में व्यस्त है और महापुरुषों के योगदान की चिताएँ मीडिया बुलेटिनों में धू-धूकर जल रही हैं। इन भभकती चिताओं से उठता धुआँ जनता की आँखों में घुसकर वास्तविक मुद्दों के दर्शन में अवरोध पैदा करता रहेगा।
✍️ चिराग़ जैन