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आधुनिक आंदोलन और पौराणिक सन्दर्भ

“जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं है, जिसका कोई पौराणिक सन्दर्भ न हो।” -इस धारणा पर चिंतन करते हुए मुझे आन्दोलनों तथा विरोध-प्रणालियों का विचार आया।
अपने सीमित ज्ञान की हार्डडिस्क को स्कैन करने पर मुझे आश्वस्ति हुई कि आज के समय में जितने प्रकार के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं, उनमें से बहुत सी प्रणालियों का उदाहरण हमारे पुराणों में मिल जाता है।
अपनी बात मनवाने के लिए किसी अधिकृत व्यक्ति पर दबाव बनाने का उपाय आंदोलन कहलाता है। यह प्रयास एकल भी हो सकता है और सामूहिक भी।
राजनैतिक, सामाजिक अथवा व्यवस्था संबंधी किसी परिवर्तन हेतु किया गया यह प्रयास आधिकारिक रूप से एक शक्तिसंपन्न व्यक्ति के कानों तक अपेक्षाकृत सामान्य व्यक्तियों की आवाज़ पहुँचाने हेतु किया जाता है।
सामन्यतः आंदोलन करनेवाला व्यक्ति व्यवस्था से निराश नहीं होता, अपितु वह व्यवस्था में थोड़ा परिवर्तन करके उसे और अधिक जनहितैषी बनाने का समर्थक होता है।
श्रीकृष्ण के आह्वान पर जब गोकुलवासियों ने कंस के सैनिकों को करस्वरूप मक्खन देने से स्पष्ट मना किया था तो सम्भवतः ‘हड़ताल’ या ‘तालाबंदी’ का प्रथम उदाहरण घटित हुआ। इसी प्रकार इंद्र की पूजा बंद करके, गोवर्द्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय एक स्थापित सत्ता का ‘बहिष्कार’ करते हुए ‘तख्ता पलट’ करने का उदाहरण हो सकता है।
रामकथा में अशोक वाटिका में बैठी माँ सीता, जब अन्न-जल त्यागकर अपनी काया को कृश कर लेती हैं तो यह ‘अनशन’ का प्रमाण है।
माता कैकेयी द्वारा अपने पुत्र को राजा बनाने के प्रयासों का भरत ने ‘इस्तीफा देकर विरोध’ दर्ज किया।
हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद ने पिता को भगवान मानने से इंकार करते हुए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ खड़ा कर दिया था।
सावित्री ने सत्यवान का जीवन लौटाने के लिए ‘सत्याग्रह’ का प्रयोग करके यमराज के निर्णय को बदल दिया था।
सागर मंथन ‘मानव शृंखला’ का उदाहरण है, तो समुद्र मंथन के समय हलाहल के निदान हेतु श्रीशिव को दिये गये ज्ञापन की प्रवृत्ति, ‘जनहितयाचिका’ जैसी मानी जा सकती है।
कठोपनिषद के नचिकेता ने अपने पिता के क्रोध के विरोध में तीन दिन तक यमराज के द्वार पर ‘धरना’ दिया।
द्रौपदी ने केश खोलकर पाण्डवों के सम्मुख ठीक वैसा ही विरोध प्रदर्शन किया था जैसे आजकल ‘काले झंडे’ अथवा ‘काली पट्टी’ बाँधकर किसी को शर्मिंदा किया जाता है।
गांधारी की आँखों पर पट्टी बांधने का प्रकरण ‘प्रतीकात्मक विरोध’ जैसा प्रतीत होता है और कर्ण के रथ को हाँकनेवाले मद्रराज शल्य ने ‘असहयोग आंदोलन’ का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
यहाँ तक कि माता दाक्षायिनी ने अपने पिता की हठधर्मिता के विरुद्ध योगाग्नि का आह्वान किया और स्वयं को भस्म कर लिया। यह घटना ‘आत्मदाह’ के ‘चरम विरोध’ का उदाहरण बन गई। श्री शिव का तांडव नृत्य तो स्पष्ट रूप से ‘उग्र विरोध प्रदर्शन’ है ही।
इसके अतिरिक्त भी लंकादहन, अशोक वाटिका ध्वंस, भीष्म प्रतिज्ञा, गंगावतरण और वामनावतार सरीखे अनगिनत पौराणिक प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि व्यवस्था को जनकल्याणकारी बनाए रखने के लिए सत्ता की नीतियों का विरोध करना दरअस्ल सत्ता का विरोध नहीं होता।
घेराव, ज्ञापन, याचिका, धरना और रैलियों का उद्देश्य सत्ता को परेशान करने की बजाय समस्या पर ध्यान केंद्रित करना भी हो सकता है।
यदि शासन ने जनता के साथ अपनत्व का संबंध बिसार नहीं दिया हो तो उसे हर आंदोलनकारी एक तपस्वी प्रतीत होता है। और यदि शासन ने सत्तामद में जनता को तुच्छ समझना सीख लिया हो तो वह हर तपस्या को राजद्रोह घोषित करने का अभ्यस्त हो जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

भारतीय संस्कृति में हास्य

हम हास्य को लेकर बेहद संवेदनशील दौर से गुज़र रहे हैं। एक तरफ वे लोग हैं जो स्वस्थ, पारंपरिक, पारिवारिक और सामाजिक ठट्ठे को भी ‘जातीय अपमान’, ‘आस्थाओं पर प्रहार’ तथा ‘राष्ट्र्रद्रोह’ सिद्ध करने पर तुला है। जो परिहास को भी ‘उपहास’ और ‘अपमान’ सिद्ध करने के षड्यंत्र रच रहा है, दूसरी ओर वे लोग हैं जो निरी अश्लीलता और वैभत्स्य को ‘हास्य’ घोषित कर देना चाहता है।
हमारी संस्कृति में उल्लास और उत्सव में देवी-देवताओं और यहां तक कि ईश्वर को भी सहभागी माना जाता है। परिवार के बड़े-बूढ़ों से लेकर बालकों तक सबके लिए परिहास तथा हंसी-ठट्ठा हमारे उत्सव-टेलों में सम्मिलित होता है। शादी-ब्याह में गाई जानेवाली ‘गारी’ और रतजगों में होनेवाला परिहास हमारी लोकसंस्कृति में रचे-बसे हास्यबोध का परिचायक है।
यही कारण है कि हमारी संस्कृति दुनिया की उन गिनी-चुनी संस्कृतियों में से एक है जिनके यहां हंसता हुआ ईश्वर उपलब्ध है। हमारे पौराणिक साहित्य में हास्य-विनोद के अनेक प्रसंग इस बात का प्रमाण हैं कि हंसने से ईश्वर अपमान नहीं होता, बल्कि अपनत्व बढ़ता है।
ऐसा नहीं है कि हंसने से अपमान हो नहीं सकता। और ऐसा भी नहीं है कि गंभीर रहनेवाला व्यक्ति जो करता है वह सम्मान ही है। यह सब धारणा पर निर्भर करता है। शिशुपाल गाम्भीर्य ओढ़कर भी नारायण का अपमान करने का प्रयास करता रहा। दुर्योधन हंसते हुए भी पाण्डवों के विरुद्ध लाक्षागृह का षड्यंत्र रच रहा था। कर्ण स्मितहीन जीवन जीकर भी द्रोण से लेकर कुंती तक पर व्यंग्यबाण छोड़ता रहा और राम, मुस्कुराते हुए अनेकानेक कष्टों से होकर गुज़र गए।
हंसना-मुस्कुराना अपराध है यह भी आधी-अधूरी विवेचना है और गाम्भीर्य शालीनता है, यह भी अर्द्धसत्य ही है।
जो मुस्कान सहजता में अभिवादन के काम आती है, विरोध में वही मुस्कान कटाक्ष बन जाती है। ऐसे में मुस्कान से धारणा का निर्णय करना बेहद बचकाना है।
महाभारत में मयसभा में सुयोधन को जो भ्रम हुआ था वह विशुद्ध हास्य का प्रसंग था। पानी और धरती में भेद न कर पाने के कारण सुयोधन जो आचरण कर रहे थे, उसे देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हंस रहे थे। इस क्षण पांचाली ने हास्य की मर्यादा लांघकर जो कटाक्ष किया वह हास्य करनेवाले के लिए मर्यादा का श्रेष्ठ उदाहरण है तथा उस समय सुयोधन के मन में प्रतिशोध की जो अग्नि भड़की, वह हास्य-बोध न समझनेवालों के लिए सबक जैसा है।
यही नहीं महाभारत में ही विराटनगर के युवराज ‘उत्तर’ और वृहन्नला के मध्य हुआ संवाद हास्य की छटा प्रस्तुत करता है। नारदमुनि को कामदेवव पर विजय पाने के लिए ‘हरिमुख’ के नाम पर ‘वानरमुख’ देनेवाले नारायण ने परिहास से परहेज नहीं किया। शिवपुराण में भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए विवश करनेवाली मोहिनी का प्रकरण हास्यरस का प्रसंग है। हरिवंशपुराण में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं में प्रचुर हास्य मिलता है। रामचरितमानस में जिस चातुर्य से हनुमान सुरसा को परास्त करते हैं, अशोक वाटिका में किलोल करते हैं… वह सब हास्य की ही श्रेणी में आता है। पंचवटी में शूर्पणखा का प्रसंग, लंका में कुम्भकर्ण का वर्णन तथा ऐसे ही अनेक प्रसंगों में हास्य की छटा दिखाई देती है। हमारी लोक-कहावतों तथा मुहावरों में भी पौराणिक संदर्भों के पर्याप्त उद्धरण मिलते हैं।
इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारी संस्कृति में हास्य को अछूत नहीं माना गया है। किंतु यह भी जानना आवश्यक है कि शस्त्र कौन सा चलाया गया से अधिक महत्वपूर्ण है कि शस्त्र किस विचार से चलाया गया।
धर्म का अपमान उन्होंने नहीं किया जिन्होंने अपने पूजितों को अपने उत्सवों में सम्मिलित किया। धर्म का अपमान उन्होंने किया है जिन्होंने अपने ईश्वर के नाम पर घृणा और विद्वेष बोने के कुचक्र रचे।
हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह जब चाहे अपने सम्मुख खड़े शिशुपाल की गर्दन उतार सकता है। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह घृणित समझे गए गिद्ध के प्रति भी कृतज्ञ होने से नहीं कतराता। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह लंका में रहनेवाले रावण और विभीषण की सोच के अंतर को समझ सकता है।
इसलिए ईश्वर की चिंता के नाम पर समाज में घृणा फैलाना छोड़ो। ईश्वर अपने समाज को हंसता-खेलता देखकर प्रसन्न होता है। लड़ता-भिड़ता देखकर तो उसे भी कष्ट ही होता है। इसलिए धर्म की रक्षा के नाम पर समाज को घृणा की अंधी खोह में धकेलनेवाले भी उतने ही पापी हैं जितने हास्य के नाम पर पैशाचिक वैभत्स्य तक उतरनेवाले लोग पापी हैं।

✍️ चिराग़ जैन

सनातन धर्म और सहिष्णुता

सनातन संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि यहाँ भक्त और भगवान के मध्य जो बातचीत होती है, वह केवल भक्तिरस तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसमें काव्य के अन्य सभी रसों की सृष्टि सम्भव है।
विश्व के अन्य किसी धर्म में यह चमत्कार सम्भव नहीं है। किसी अन्य धर्म के आराध्य की होली खेलते, रास रचाते, गोपियों के वस्त्र चुराते, जूठे बेर खाते आप कल्पना नहीं कर पाएंगे। किसी अन्य धर्म के पास ठिठोली करता ईश्वर नहीं मिलेगा। किसी अन्य धर्म का आराध्य हनुमान की तरह अशोक वाटिका उजाड़ कर किसी पेड़ से फल तोड़कर खाने लगे तो यह उसके व्यक्तित्व को सूट नहीं करेगा।
यह सब केवल सनातन परम्परा में संभव है। यहाँ ईश्वर को जीवन के प्रत्येक क्षण में सम्मिलित किया गया है। सनातन परम्परा ईश्वर को किसी धर्मस्थल विशेष तक सीमित करने की पक्षधर नहीं है। यहाँ तो ईश्वर को साथ लेकर घूमने का रिवाज़ है।
घर में विराजमान लड्डू गोपाल बाक़ायदा घर के सदस्य की तरह रहते हैं। वे परिवार के साथ उठते हैं, सोते हैं, खाते-पीते हैं, नहाते हैं और घूमने भी जाते हैं। वे नाराज़ भी होते हैं और मानते भी हैं। पारलौकिक से ऐसा लौकिक संबंध अन्यत्र कहीं सम्भव नहीं है।
यही कारण है कि हमारा ईश्वर हमारे साथ हँसता है। खिलखिलाकर हँसता हुआ ईश्वर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यह केवल हमारे पास सम्भव है।
माँ अनुसूया के पालने में त्रिदेव के खेलने की घटना इस बात की प्रमाण है कि सनातन परंपरा का ईश्वर वात्सल्य का सम्मान करता है। जसुमति मैया से झूठ बोलता कन्हैया ईश्वर के वात्सल्यबोध का परिचायक है। शबरी के जूठे बेर खाते राम और विदुरानी के हाथों से केले के छिलके खाते कृष्ण प्रेम की प्रतीति के उदाहरण हैं। रास रचाते कृष्ण संयोग सिंगार के प्रतिमान हैं और विकल होकर वन्य-वनस्पति से सीता का पता पूछते राम वियोग शृंगार के प्रतीक हैं। रुक्मणि के कृष्ण सदेह प्रेम की स्वीकारोक्ति हैं और मीरा के गिरिधर विदेह प्रेम के बिम्ब हैं। प्रह्लाद की आस्था पर खम्भ से उत्पन्न नृसिंह जब अपने नख से हिरण्यकश्यप का वध करते हैं तो भयानक रस साकार हो उठता है, और सती के आत्मदाह से क्रुद्ध शिव जब ताण्डव करते हैं तो रौद्र रस की सर्जना होती है। वामन अवतार में राजा बलि की समस्त सम्पदा नाप लेने वाले ईश्वर ने अद्भुत रस का उदाहरण प्रस्तुत किया। आँसुओं से सुदामा के चरण पखारते कृष्ण करुणरस का निमित्त हैं और नारद को हरिमुख देकर परिहास का पात्र बनाने वाले विष्णु हास्यरस की स्वीकृति हैं। युद्धक्षेत्र में भी उग्र न होकर संयत रहनेवाले राम शान्तरस का प्रमाण बन गए हैं।
सनातन परंपरा का ईश्वर जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में हमारे साथ हो सकता है। यही कारण है कि विवाह के लिए सजती दुल्हन को गौरी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है और बारातियों को शिव के गण मानकर गारी गायी जाती है। कन्या के पिता को जनक मानकर गीत गाने का चलन आज भी हमारे समाज में है।
हमने ईश्वर की अनुभूति के ताने को दिनचर्या के बाने के साथ ऐसे बुन दिया है कि गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक हर जगह किसी न किसी पौराणिक सन्दर्भ का प्रतीक मानकर जीव को ईश्वर के समतुल्य मान लिया जाता है।
अन्य लगभग सभी धर्मों की कट्टरता या अदृश्य कट्टरता ने उनके ईश्वर को केवल धर्मस्थलों तक सीमित कर दिया है। यही कारण है कि उनके ईश्वर के साथ केवल भक्ति का सम्बंध बनता है। प्रेम, क्रोध, वात्सल्य और हास-परिहास के संबंध की कल्पना तक नहीं की जा सकती। ऐसा कुछ करते ही उनकी भावनाएँ आहत हो जाती हैं। ऐसा कुछ करते ही वे असहिष्णु हो जाते हैं।
लेकिन सनातन परम्परा में यह सब कुछ सम्भव था। इसीलिए हमारे यहाँ ईश्वर को प्रतीक मानकर ख़ूब काव्य रचा गया। यदि हमारे यहाँ भी कट्टरता का रोग होता तो कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करनेवाले सूरदास को सूली पर चढ़ा दिया गया होता। कृष्ण की प्रेम लीलाओं का चित्रण करनेवाले रसखान की गर्दन काट दी गयी होती। बिलखते हुए राम से परिचय करानेवाले तुलसी लोकनिंद्य हो चुके होते। शिव की बारात का बखान करनेवाले पुराण निषिद्ध हो चुके होते।
यह सनातन परम्परा का ही कनवास है कि यहाँ नारद मुनि के हास्यबोध और परशुराम तथा दुर्वासा सरीखे क्रोधित ऋषियों की कथा एक साथ स्वीकार्य है। जहाँ इंद्र तक को उसकी ग़लती का एहसास कराने के लिए कृष्ण गौवर्द्धन उठाने से नहीं हिचकते। गौवर्द्धन की घटना ईश्वर की ओर से मनुष्यता को यह संदेश देती है कि देवराज होने से ही कोई हमेशा सही सिद्ध होने का अधिकारी नहीं बन जाता।
शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करनेवाले कृष्ण जिस धर्म के पास हैं, उनको यदि ऐसा लगने लगे कि कोई बात, कोई परिहास, कोई उपालम्भ, कोई तर्क, कोई चर्चा उनके ईश्वर का अपमान कर सकती है तो यह उनकी नासमझी से अधिक कुछ नहीं है।
ईश्वर तो मान-अपमान से काफ़ी दूर निकल गया है। वह भक्त के निश्छल अपनत्व का छोर पकड़कर कठौती तक चला आता है। यह अपनत्व किसी भी भाव से पूर्ण हो सकता है। यहाँ तो शत्रुभाव से ईश्वर का स्मरण करने वाले रावण और कंस तक को तारने का रिवाज़ रहा है।
इसलिए इन दिनों जो लोग ईश्वर के सम्मान के ठेकेदार बने घूम रहे हैं, उनको स्मरण हो कि जब तक कट्टरता से बचा हुआ है तब तक सनातन धर्म का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता; और बाक़ी रही ईश्वर के सम्मान की बात तो उसकी चिंता ईश्वर पर छोड़ दें।

✍️ चिराग़ जैन

संस्कृति के विरुद्ध षड्यंत्र

पिछले कुछ वर्ष में भारतीय संस्कृति के विरुद्ध एक ऐसा डिजिटल षड्यंत्र प्रारम्भ हुआ है, जिसके शिकंजे में हमारे हज़ारों युवा फँसते जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति अपनी आर्य परम्परा, सहिष्णुता, सौहार्द तथा वात्सल्य के दम पर पूरी दुनिया में शीर्ष पर रही।
इन मूल्यों के कारण ही यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गये जहाँ से लेकिन हमारी संस्कृति का बाल बांका न कर सके। मुग़लों ने भारत पर इतने लंबे समय शासन किया लेकिन सनातन परंपरा की गहरी जड़ों को हिला न सके। अंग्रेजों ने भौतिकवाद के तमाम अस्त्र छोड़े किन्तु विनम्रता और परस्पर उपकार करने की आदत के आगे उनका एक भी शस्त्र सफल न हो सका।
भयावह क्रोध में किसी के प्रति आक्रोश उमड़ता था तो भी घर की दीवार पर लगी मर्यादा पुरुषोत्तम की मुस्कान हमारे द्वेष को विगलित कर देती थी और हम उसकी नकारात्मकता से होड़ करने की बजाय अपनी सकारात्मकता की लकीर को बड़ा करने में जुट जाते थे।
हमने श्रीराम से सीखा है कि रावण से युद्ध जीतने के लिए रावण होना कोई उपाय नहीं है। स्वयं को राम बनाए रखते हुए अपनी सीता वापस लेने का नाम ही विजय है। यदि सामने वाले ने आपको अपने जैसा बनने के लिए विवश कर दिया तो फिर काहे की जीत?
यही आदर्श पूरी दुनिया को हमारे सामने घुटने टेकने पर विवश करता रहा है। इसीलिए मेरा ऐसा मत है कि दुनिया भर में सनातन संस्कृति से ईर्ष्या रखने वालों ने सोशल मीडिया पर ऐसी लाखों प्रोफाइल्स बनाई हैं, जिनके डीपी में या तो हिन्दू ध्वज होता है, या श्रीराम के उग्र स्वरूप का चित्र होता है या फिर ‘मैं कट्टर हिन्दू हूँ’ का उद्घोष होता है। इन प्रोफाइल्स पर आप नीचे तक स्क्रॉल करेंगे तो पाएंगे कि इनमें से अधिकतर में चार-पाँच बार डीपी चेंज करने के अलावा कुछ और नहीं होता। ऐसी कुछ प्रोफाइल्स में कट्टरता की पोस्ट्स भी कभी-कभार शेयर कर ली जाती हैं। कुल मिलाकर आप इन प्रोफाइल्स पर विचरण करेंगे तो आसानी से समझ सकते हैं कि यह किसी की ओरिजनल प्रोफ़ाइल नहीं है, बल्कि एक उद्देश्य विशेष के लिए बनवाई गयी फेक प्रोफाइल्स में से एक है।
ये सभी प्रोफाइल्स भारतीयता की बात करनेवालों को, लोकतंत्र की बात करनेवालों को, सद्भाव की बात करने वालों को और वर्तमान शासन की आलोचना करनेवालों की पोस्ट पर गंदी गालियाँ लिखकर आती हैं। इसमें सरकार की आलोचना करनेवालों को गालियाँ बककर वे यह सिद्ध करते हैं कि ये प्रोफाइल्स भाजपा सरकार ने बनवाई हैं। जबकि वास्तव में उनका उद्देश्य सनातन संस्कृति को बदनाम करना है।
जब कोई डीपी में भगवान राम का चित्र लगाकर माँ-बहन की गालियाँ बकेगा तो उससे साख तो श्रीराम की ही धूमिल होगी। जब कोई ‘मैं कट्टर हिंदू हूँ’ लिखकर अभद्र टिप्पणियाँ करेगा तो इससे बदनामी उसकी नहीं होगी, हिंदू धर्म की होगी।
ऐसे में मोदी सरकार के भोले-भाले समर्थक इनके झाँसे में आकर इनके जैसा आचरण करने को ही राष्ट्रवाद मान बैठे हैं। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना में मातृभूमि के जिस गुण की सबसे पहले पूजा की गई है वह है ‘वात्सल्य’ (नमस्ते सदा ‘वत्सले’ मातृभूमे)। ऐसी विचारधारा के लोग भला कट्टरता और गाली-गलौज का समर्थन कैसे कर सकते हैं।
श्रीराम को आदर्श माननेवाली परम्परा भला बदले की भावना को कैसे भड़का सकती है? यदि बदला लेना ही उचित होता तो क्या श्रीराम सीता के अपहरण के बदले मंदोदरी का अपहरण न कर लेते! लेकिन श्रीराम ने हमें सिखाया कि उस युद्ध का उद्देश्य केवल अपनी सीता वापस लेना है। इस प्रयास में जो लंका उन्होंने जीती उस पर भी अधिकार नहीं किया।
‘हमने दुश्मन को गले मिल-मिल के शर्मिंदा किया है’ जैसे सूक्ति वाक्यों का अनुगमन करने वाली परम्परा को गाली-गलौज और वैभत्स्य के अखाड़े में खींचने का यह षड्यंत्र श्रद्धेय डॉ हेडगेवार और पूज्य गुरु गोलवलकर जी के सपनों को ध्वस्त करने का एक कुचक्र है।
आप स्वयं देखिए, जबसे ये प्रोफाइल्स बनी हैं तबसे हेडगेवार जी और गुरु गोलवलकर जी का कोई नाम भी उद्धृत नहीं करता। क्योंकि इनके विचारों पर विवाद नहीं किया जा सकता। सब लोग सावरकर के नाम को उछालते हैं, नाथूराम गोडसे का नाम लेते हैं क्योंकि इनके नाम पर विवाद करके हमारी संस्कृति, परम्परा और विचारधारा को विवादित सिद्ध किया जा सकता है।
श्रीराम के मुस्कुराते हुए चित्र, वन को जाते हुए श्रीराम के चित्र, हनुमान को गले लगाते हुए श्रीराम के चित्र, शबरी के बेर खाते हुए श्रीराम के चित्र हमारे जीवन से ग़ायब कर दिए गए हैं। क्योंकि इन सब चित्रों को देखकर श्रीराम उनके लिए भी पूज्यनीय हो जाते हैं, जो जन्मतः वैष्णव नहीं हैं। इसके स्थान पर आपको क्रोधित राम की पेंटिंग दी गयी है डीपी पर लगाने के लिए। ज़रा याद करके देखें कि आपने अपने बचपन में क्रोधित राम का चित्र कहाँ देखा था? आपको समझ आएगा कि ये पेंटिंग्स पिछले कुछ वर्षों में एक षड्यंत्र के तहत बनवाई गई हैं ताकि अपनी मुस्कान से सबका मन मोहनेवाले भगवान राम की उस छवि को बदला जा सके।
अपनी विनम्रता से पूरी दुनिया को दीवाना बना लेने वाले सनातन धर्म को लड़ाकों और कट्टरवादियों का धर्म सिद्ध किया जा सके। काश मेरे इस महान धर्म की युवा पीढ़ी इस षड्यंत्र से बच सके ताकि ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं’ की इस अद्वितीय संस्कृति को बचाया जा सके।

✍️ चिराग़ जैन

मानवता को श्रद्धांजलि

ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ – यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ….क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया… इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।

✍️ चिराग़ जैन

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