+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

वितण्डावाद का ताण्डव

‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना नहीं चाहिए।’ -पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के ये शब्द आज भी रह-रहकर हमारे कानों में गूंजते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में वितण्डावाद का जो ताण्डव हम दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं, उसके अंत में हमारे पास कटुता के अतिरिक्त कुछ शेष न रह जाएगा। राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह से एक पूरी पीढ़ी की सोच को सीमित करने का प्रयास किया है, वह पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के स्वर में वर्णित ‘लोकतंत्र’ की परिकल्पना के विपरीत आचरण का मार्ग है। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल की है।
रामायण ने हमें सिखाया है कि शत्रु जिस द्वार से आक्रमण करेगा, समाधान भी उसी द्वार से आएगा। यही कारण है कि लक्ष्मण मूर्च्छित हुए तो वैद्य सुषेण भी उसी लंका से उपचार के लिए आए, जिससे मेघनाद आया था।
यदि हम आज से ही सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय कुछ बातों का पालन करना प्रारंभ करें तो शायद इस माध्यम का प्रयोग करके प्रोपेगैंडा करने वाली सभी एजेंसियाँ हतोत्साहित होंगी। फिर देशहित की बात करने पर जब कोई आप पर तंज करेगा कि आप राजनैतिक माहौल सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं; तो आप उसे बता सकेंगे कि हम अफवाह के उस तंत्र की जड़ खोद रहे हैं, जिसकी डालियों पर सामाजिक विघटन के फल लगते हैं।
1. यदि जन-सामान्य की समस्या से जुड़ी अथवा लोकतंत्र की समालोचना से संबंधित किसी पोस्ट को अमुक राजनैतिक दल का ‘विरोध’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे कमेंट्स को इग्नोर करेंगे। उन्हें उत्तर देते ही आप उन्हें सफल कर देंगे क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह है कि आप विषय को भूलकर स्वयं को निष्पक्ष साबित करने में व्यस्त हो जाएँ।
2. अश्लील, अभद्र तथा असंसदीय शब्दावली का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को (भले ही वह आपकी पोस्ट के समर्थन में हो) तुरंत ब्लॉक करेंगे।
3. किसी भी सम्प्रदाय की आड़ में कट्टरता, अराजकता और हिंसा का समर्थन करनेवाले व्यक्ति की पोस्ट/कमेंट को इग्नोर करेंगे।
4. उन फेक प्रोफाइल्स की पहचान करके उन्हें अपनी मित्रता सूची से बाहर करेंगे, जिनका निर्माण ही किसी दल अथवा विचारधारा के प्रचार हेतु किया गया है। ध्यान से देखने पर आप समझ जाएंगे कि ऐसी प्रोफाइल्स पर डीपी से लेकर वॉल तक कहीं भी प्रोफ़ाइल होल्डर की पहचान नहीं मिलती। इनकी वॉल पर या तो डीपी चेंज नोटिफिकेशन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा या फिर राजनैतिक दलों के प्रोपेगेंडा पेज से शेयर करके लाई गई पोस्ट्स होंगी। ये ही वो प्रोफाइल्स हैं जिनके दम पर राजनैतिक दल अफवाह और झूठ फैलाने तथा मुद्दों से भटकाने में सफल होते हैं।
5. किसी भी राजनेता के निजी जीवन में प्रवेश करके उसकी चरित्र हत्या को ‘आलोचना’ का नाम देने वाली पोस्ट से दूरी बनाए रखेंगे। क्योंकि किसी की निजता का सम्मान न किया गया तो भविष्य में कोई भी समाज के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा।
6. किसी राजनेता का नाम बिगाड़कर, या उसे फेंकू, तड़ीपार, पप्पू, टोंटीचोर आदि नाम से संबोधित करनेवालों को दूर से प्रणाम करेंगे क्योंकि इनके पास कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक समझ नहीं है, ये लोग सुनी-सुनाई अभद्रता से विषय को भटकाना चाहते हैं।
7. किसी भी राजनेता की बीमारी, चोट, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, रंग, चेहरा-मोहरा और बोली का उपहास करके मूल विषय को भटकाने के प्रयासों से सावधान रहेंगे क्योंकि हमें राजनेताओं से जनता का नेतृत्व करवाना है, उनसे पारिवारिक सम्बंध नहीं जोड़ना है।
8. टीवी डिबेट में अलग-अलग राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिन जुमलों से बहस को नष्ट कर देते हैं, उन जुमलों से अपनी पोस्ट्स और कमेंट बॉक्स को बचाएंगे।
9. वर्तमान अथवा भविष्य के प्रश्न को इतिहास, जाति अथवा सम्प्रदाय पर अटकाकर नष्ट करने वालों को उत्तर देने में ऊर्जा ध्वंस नहीं करेंगे।
10. फेसबुक पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह विचार अवश्य करेंगे कि इससे किसी प्रकार से मनुष्यता अथवा लोकतंत्र तो आहत नहीं हो रहा।
ये नियम यदि हमने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पालन करने आरम्भ कर दिए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आप बहुत जल्दी ही अपने समाज को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे वितण्डों से मुक्ति होता देखेंगे।
और एक अंतिम बात- अपने रक्त संबंधों; पारिवारिक मित्रों; सहकर्मियों; सहयात्रियों अथवा संबंधियों से चर्चा करते समय यदि अपने पक्ष और संबंध में से किसी एक को चुनना पड़े तो संबंध को बचाएंगे क्योंकि जो हमारे अपने हैं, वो आज नहीं तो कल हमारे साथ अवश्य खड़े होंगे।
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
सहमत हों, तो राष्ट्रहित में शेयर ज़रूर करें।

✍️ चिराग़ जैन

अतिवादी

गुरमेहर कौर वाले मुद्दे पर जिस तरह की चर्चाएँ उठी हैं उससे यह तो स्पष्ट है कि इस देश में अतिवादी लोग पूरी तरह सक्रिय हैं। युद्ध के विरुद्ध एक तख़्ती उठा लेने पर लड़की का जीना हराम कर डाला है हमने। “बॉर्डर” फिल्म के अंत में जब युद्ध की विभीषिका के विरुद्ध पाकिस्तान को “मेरे भाई” और “मेरे दोस्त” जैसे संबोधनों से नवाज़ा गया था तब माहौल इतना ख़राब नहीं था।
हद्द हो गई है। किसी ने चूल्हा जलाने के लिए माचिस उठाई तो उसे आगज़नी का अपराधी सिद्ध करने पर तुल गए। किसी ने सब्जी बिनारने के लिए चाकू उठाया तो उसे हत्या की साज़िश के आरोप में पथराना शुरू कर दिया। इतने भयभीत क्यों हो गए हैं कि पाकिस्तान का नाम आते ही हम चर्चा छोड़ कर नाम लेने वाले को लतियाने लगते हैं।
और अगर यह मान भी लिया जाए कि गुरमेहर ने अपराध किया ही है तो क्या बीस साल की बिटिया को समझाने का इस मुल्क में यही उपाय बचा था कि उसे बलात्कार की धमकी दे दी जाए। किसी ने फिल्म में कुछ दिखाया तो जनता उसे पीटने पहुँच गई। किसी ने तख़्ती पर कुछ लिखा तो जनता ने उसके बलात्कार की तैयारी कर ली।
क्या है ये सब। घृणा नहीं होती इस कल्पना से कि एक बीस साल की लड़की को किसी भूल अथवा अपराध की सज़ा देने के लिए चार देशभक्तों के उसका बलात्कार किया। चुल्लू भर पानी नहीं है किसी के पास इस देश की व्यवस्थाओं में पनप रही नपुंसकता के लिए? क्या हम एक अराजक समाज की निर्मिति नहीं कर रहे हैं।
अभी किसी ने गुरमेहर का एक वीडियो व्हाट्स एप्प पर भेजा है जिसमें वह लड़की कार में एक गाने पर उल्लास में नाच रही है। वीडियो के साथ यह लिखा गया है कि जिसके पिता शहीद हुए हों उसे इतना खुश होने का समय कैसे मिल गया? …कितने अमानवीय हो गए हैं हम। कल को किसी शहीद की बेटी या बीवी किसी ठेले पर गोलगप्पे खाती दिख गई तो हम उसे चरित्रहीन मान लेंगे। किसी शहीद का बेटा दोस्तों के साथ स्कूल पिकनिक पर चला गया तो हम उसे आवारा सिद्ध कर देंगे। इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं हम? क्या शहीदों के परिवारों को हँसते-खेलते देखना हमारे लिए असह्य हो गया।
सोशल मीडिया के इस दौर में बेसिर-पैर के सन्देश भरे हुए हैं। चुटकुले, अश्लीलता, बेमतलब ज्ञान और वैद्यजी के नुस्खे भेड़चाल में अग्रेषित किये जा रहे हैं। लेकिन किसी बच्ची के चरित्र, किसी परिवार की खुशियों, किसी इंसान की ज़िंदगी और किसी दिल की धड़कनों पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली पोस्ट अग्रेषित करने से पूर्व इतना ज़रूर विचार लेना चाहिए कि आग की लपटें जब भड़क जाती हैं तो वे उन्हें भड़काने वाले की झोंपड़ी को बचकर नहीं निकलतीं।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!