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आचमन

आचमन, हिन्दी की वाचिक परम्परा का एक ऐसा नया पौधा है जो अपने शैशव काल में ही नन्हें अंकुरों के लिए वटवृक्ष की भूमिका निर्वाह कर रहा है। जिस दौर में कवि सम्मेलन की सरलता पर अव्यवस्थित चमक-दमक का आधिपत्य स्थापित होने लगा हो, उस दौर में सुव्यवस्थित सादगी से कवि सम्मेलन के...

कविता सुनने की तमीज़

शेर कहने का सलीक़ा तो ज़रूरी है मगर शेर सुनने के भी आदाब हुआ करते हैं कविता सुनने वाले अगर कविता की हर पंक्ति से प्रस्फुटित रश्मियों के पीछे दौड़कर अर्थ के असंख्य बिम्ब देख पाएं तो कविता-पाठ करने वाले को आनंद आ जाता है। कवि की भावभूमि का पर्यटन यदि श्रोता न कर पाए, तो...

याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम याद फिर से आ रही हो तुम त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं...

राजू श्रीवास्तव की अंत्येष्टि

आर्टिस्ट ग्रीन रूम में तैयार था मगर इस ज़िन्दगी ने मंच का परदा गिरा दिया जिजीविषा की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद ठहाके का हिचकी में तब्दील होना यकायक पलकें नम कर गया। ऐसा लगा ज्यों किसी ने अचानक हमारे बिल्कुल आसपास की रौनक को वीराने में बदल दिया हो। मृत्यु को बहुत नज़दीक से...

शैलेन्द्र की याद

नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक एलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन का एक उपन्यास है- ‘द कैंसर वार्ड’। इस उपन्यास में एक स्थान पर कैंसर वार्ड में भर्ती एक रोगी की पीड़ा को देखकर, उसका मन बहलाने के लिए नर्स एक गाना गाती है। गीत के बोल थे- ‘आवारा हूँ, आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ...
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