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सृजन सुख

इस तपोवन में सृजन की साधनाएँ चल रही हैं ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है मन गहन संवेदना अनुभूत करने में जुटा है तन अभी स्वर-व्यंजनों में प्राण भरने में जुटा है भाव का उत्कर्ष छूकर नयन खारे हो रहे हैं इस सृजन सुख में जगत् के डर किनारे हो रहे हैं शब्द से सच का...

विज्ञान

वास्तविकता साकार हो चुकी कल्पना है और कल्पना साकार होने जा रही वास्तविकता है। ✍️ चिराग़ जैन

गीत की चेतावनी

आज फिर एकांत की उंगली पकड़कर सोच को अपनत्व की बाँहों में भरकर कोई बोला प्राण का संगीत हूँ मैं ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं अक्षरों के वस्त्र ओढ़े हैं बदन पर भंगिमा में भाव का विस्तार देखो शब्द के आभूषणों से हूँ अलंकृत नयन में रस की अलौकिक धार देखो मैं सुदामा की...

साहित्य बर्बरीक है

साहित्य करुणा से उपजता है। साहित्य संवेदना से जन्म लेता है। ‘आह से उपजा होगा गान’ -यही ‘आह’ साहित्य की सर्जना का बीज है। यही कारण है कि साहित्य सदैव कमज़ोर की आवाज़ बनता है। साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो महाभारत के युद्ध में बर्बरीक की...

अमर पंक्तियों का व्याकरण

किसी पंक्ति में ऐसा क्या विशेष होता है कि वह अचानक युगजयी हो जाती है! हज़ारों-लाखों लोगों ने पूरा-पूरा जीवन लगा दिया काव्य रचने में, लेकिन पूरी दुनिया में उंगली पर गिने जाने योग्य कविताएँ ही अमर हुई हैं। और जो अमर हुई हैं उन पंक्तियों के शब्द शिल्प में कुछ असाधारण...
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