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स्वार्थी कायरता

हम सब बहुत तेज़ी से भीड़ में अकेले होते जा रहे हैं। एक सिंह सैंकड़ों हिरणों के बीच से एक हिरण को उठा लाता है, क्योंकि सिंह आश्वस्त होता है कि आक्रमण के समय झुण्ड का प्रत्येक हिरण एकाकी हो जाएगा। यदि झुण्ड के आठ-दस हिरण भी संगठित होकर सिंह पर धावा बोल दें तो कोई नाहर “सर-ए-आम” अनीति करने की हिम्मत नहीं कर सकता।
लेकिन सम्भव है, हिरणों की माँओं ने भी अपने बच्चों को समझाया हो कि किसी के पचड़े में मत फँसना और कहीं झगड़ा हो रहा हो तो चुपचाप भागकर अपने घर आ जाना!
समाज की इसी स्वार्थी कायरता ने अपराधियों और शिकारियों को यह विश्वास दिलाया है कि आप सर-ए-आम अनैतिकता का नंगा नाच करोगे और ये सब पढ़े-लिखे सुसभ्य लोग ‘लड़ाई करना गंदी बात’ कहते हुए तमाशा देखेंगे।
अपराध, राजनीति, सिस्टम और निजी कंपनियाँ इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर नागरिकों की भीड़ में से किसी भी हिरण का आसानी से शिकार कर लेते हैं। ‘चहल-पहल’; ‘सर-ए-आम’; ‘भरे बाज़ार में’; ‘सबके सामने’ और ‘बीच सड़क पर’ जैसे शब्दयुग्म भी अपराध के दुस्साहस को कम नहीं होने देते।
मध्यमवर्गीय समाज ने अपनी मम्मियों-पापाओं से ‘चुप लगाने’ के जो मंत्र सीखे हैं, उन्हीं की सिद्धि करते हुए वे पूरा जीवन कायरता का वरदान भोगते हुए बिता देते हैं। और जब कभी उनमें से कोई आज्ञाकारी श्रवण कुमार स्वयं किसी सिंह का शिकार बनता है तब उसे समझ आता है कि जीवन भर ‘तथाकथित अच्छा बच्चा’ बनने की कोशिश में वह जिस मौन को नैतिकता समझ रहा था वह वास्तव में आत्महत्या का रास्ता था।
शिकारी के आक्रमण के समय वह चीख नहीं पाता, क्योंकि मौन उसके कण्ठ की आदत बन चुका होता है। इस प्रवृत्ति को उसने स्वयं पोषित किया है इस ग्लानिबोध में उसकी कराह भी नहीं निकल पाती। जूझने का प्रयास करनेवाले हिरणों को देखकर उसने नाक-भौं चढ़ाए हैं, इस अपराध बोध में वह सिसक भी नहीं पाता।
उसकी आँखों की कोरें भीग जाती हैं। आँसू आँखों की सीमा से बाहर निकलकर उस पर ठहाका लगाते हैं कि यदि वह समय रहते अपने स्वार्थी मौन की लक्ष्मणरेखा से बाहर निकल आया होता तो आज उसके प्राण न निकल रहे होते।

✍️ चिराग़ जैन

भविष्य का अनुमान

किसी समाज के वर्तमान का आकलन उसके वैभव से किया जाता है, किंतु उसके भविष्य का अनुमान केवल उसके विवेक से लगाया जा सकता है। घटनाएँ और दुर्घटनाएं यदि समाज के लिए कुछ दिन तक न्यूज बुलेटिन की स्टोरी भर बनकर रह जाएं और उनसे बेहतर समाज के निर्माण का कोई विमर्श नहीं उपजे तो समझ लीजिए कि हमारी पीढ़ियां ख़तरे में हैं।
यह वर्ष प्रारंभ हुआ और देश की राजधानी में एक जीती-जागती लड़की सड़कों पर घसीटकर मार दी गई। पूस की सर्द रात में 12 किलोमीटर तक किसी इंसानी जिस्म के खुरदरी सड़क पर घिसटने की कल्पना से लोगों की रूह काँप गई।
सुबह होने से पहले लड़की दुनिया से जा चुकी थी और ख़बर दुनिया पर छा चुकी थी। अब शुरू हुआ हेडलाइंस और पब्लिक सिम्पैथी का घिनौना खेल।
न्यू ईयर के जश्न के तुरंत बाद मीडिया को एक सेंसेशनल स्टोरी मिली तो ‘पुलिस की लापरवाही’; ‘स्त्री सुरक्षा’ और बलात्कार जैसे शब्दों के साथ रिपोर्टिंग की जाने लगी। चूँकि ख़बर में पुलिस को विलेन बनाना था, इसलिए हर ख़बर में लड़की को ‘पीड़िता’ कहकर संबोधित किया जा रहा था।
दस बजते-बजते राजनीति गरमा गई और आरोपियों में से एक का भाजपा कनेक्शन भुनाने के लिए आम आदमी पार्टी एक्टिव हो गई। उधर दिल्ली के एलजी और केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने घटना पर अफसोस ज़ाहिर करते हुए दिल्ली पुलिस से घटना की अपडेट लेनी शुरू कर दी।
दो दिन तक मीडिया मृतका की माँ के रोते-बिलखते फुटेज, सौरभ भारद्वाज की प्रेस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों की प्रेस स्टेटमेंट और थाने के बाहर जमा भीड़ की बाइट चलाकर काम चलाता रहा। उस रात के चश्मदीदों की क्लिप भी हर तीन-चार मिनिट में रिपीट होती रही, जिससे यह सिद्ध हो रहा था कि दिल्ली पुलिस नाकारा है। कुछ बड़े चैनल्स ने स्कूटी से टक्कर और गाड़ी के नीचे फंसी लड़की की एनीमेशन भी चलाई। एक डिवाइडर से यू टर्न लेती गाड़ी की सीसीटीवी फुटेज भी सैंकड़ों बार चलाई गई। बारह किलोमीटर तक घिसटकर मर चुकी लड़की को मीडिया दो दिन तक घसीटता रहा।
अदालत में सुनवाई होने से पहले ही आरोपियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। पुलिस की चार्जशीट का तो पता नहीं लेकिन जल्दबाज़ रिपोर्टर्स ने उन्हें बलात्कारी कहने में देर नहीं लगाई।
लड़की की पहचान, उसके परिवार की पहचान, उसकी सहेली की पहचान सब कुछ मीडिया ने सार्वजानिक कर दी और विधि-पत्रकारिता के नियम-कायदे मुँह बाये देखते रह गए।
उधर एक आरोपी का भाजपा से सम्बंध होने के कारण भाजपा इस पूरे मुद्दे पर बैकफुट पर रही।
दो दिन बाद सुधीर चौधरी ने अपने ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में यह दावा किया कि कंझावला कांड में एक नया एंगल सामने आया है कि उस रात दुर्घटना में मरने वाली लड़की के साथ एक सहेली भी थी। सुधीर चौधरी ने यह भी बताया कि उस सहेली से उनके चैनल ने एक्सक्लूसिव बातचीत करके पता चला लिया है कि मृतका उस रात होटल के कमरे से शराब पीकर निकली थी और उसका उसकी सहेली से झगड़ा भी हुआ। होटल के स्टाफ से यह भी पता चल गया कि वह लड़की पहले भी इस होटल में आती रही है, कि उस लड़की से मिलने (थोड़ी देर के लिए) उसके पुरुष मित्र भी आए थे…!
इसके बाद अचानक सोशल मीडिया के ग्रुप्स में कुछ ऐसा पोस्ट किया जाने लगा जिससे ख़बर के प्रति लोगों का नज़रिया एकदम बदल गया। जो बिलखती माँ अपनी बेटी के हत्यारों को मृत्युदंड देने की मांग कर रही थी, वही अब अपनी मरी हुई बेटी को छीछालेदर से बचाने की कोशिश करती मिली।
मेरा प्रश्न यह है कि हम आख़िर कब तक इस प्रचार तंत्र के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे? नीचे जो प्रश्न मैं पूछ रहा हूँ उनको गंभीरता से सोचकर अपने आप से उनके उत्तर पूछने का प्रयास करना :-
1. अगर वह लड़की किसी तथाकथित अपराध में लिप्त रही भी हो (जो सुनिश्चित करना न्यायालय का कार्य है) तो भी क्या उसे मार देने की छूट किसी अन्य नागरिक को दे देनी चाहिए?
2. अगर वह नशे की हालत में किसी गाड़ी से टकरा ही गयी थी, तो भी क्या उसे 12 किलोमीटर तक सड़क पर घसीटना जस्टीफाई किया जा सकता है?
3. रात के समय यदि कोई लड़की सड़क पर किसी भी स्थिति में मृत पाई जाए, तो क्या उस स्थिति में यह मान लेना चाहिए कि उसका बलात्कार ही हुआ होगा?
4. इस दुर्घटना के बाद क्या हमारे समाज को इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए कि देर रात तक बाहर रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर कम से कम पारिवारिक अंकुश की पहल की जाए।
5. स्कूटी पर जा रही स्त्री हो या गाड़ी में घूम रहे पुरुष; दोनों ही के लिए भीषण सर्दी की रात में सुनसान सड़कों पर निकलना असुरक्षित क्यों नहीं है?
6. पुलिस की मुस्तैदी और कार्यशैली पर पूरी व्यवस्था को गंभीरता से पुनर्विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
7. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिसकर्मी से शिकायत करने पर यदि पुलिसवाला उल्टे आपको ही डाँटकर भगा दे तो आप कुछ नहीं कर पाते।
8. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिस अपनी जनता से सुरक्षाकर्मी जैसा नहीं अपितु तानाशाह जैसा व्यावहार करती है।
9. क्या यह सत्य नहीं है कि आरोपियों में एक व्यक्ति के भाजपा सम्बंध से भाजपा विरोधियों को ‘अवसर’ मिल गया?
10. क्या यह सत्य नहीं की लड़की की सहेली की गवाही से भाजपा समर्थकों को ‘अवसर’ मिल गया?
11. क्या यह सत्य नहीं कि हमें हमारी सड़कों को दिन-रात सुरक्षित और निर्भय बनाए रखने के प्रयासों को वरीयता देनी चाहिए।
12. क्या यह आवश्यक नहीं कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को मनुष्य होने की न्यूनतम अर्हता का ध्यान रखना चाहिए!
मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह अच्छी तरह जाँच लें कि आप जो लिखने जा रहे है वह खुले हुए ज़ख़्म पर मरहम लगाने जैसा है, यदि आपकी उंगली ने रिसाव के किसी भी संवेदनशील तन्तु को छू दिया तो घाव की टीस, चित्कार बनकर मनुष्यता के कान फोड़ देगी!

✍️ चिराग़ जैन

विघटन

“अलवर में एक मूक-बधिर बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।” इस ख़बर में न तो ‘अलवर’ शब्द महत्वपूर्ण है, न ‘मूक-बधिर’। इसमें अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है बलात्कार। इसमें किसी शब्द पर शर्मिंदा हुआ जा सकता है तो वह शब्द है बलात्कार।
लेकिन हम इस एक शब्द को छोड़कर, बाक़ी हर शब्द पर चर्चा करेंगे। भाजपा समर्थक ‘अलवर’ शब्द को बार बार बोलकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को नीचा दिखाएंगे। उत्तर में कांग्रेस समर्थक ‘हाथरस-हाथरस’ चिल्लाकर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को चिकोटी काटेंगे। कोई ‘दलित-दलित’ चिल्लाएगा तो कोई बलात्कृता और बलात्कारी का धर्म बताकर चिल्लाने लगेगा।
लेकिन इन सब चीख़-चिल्लाहटों में वो एक चीख़ कराहकर दम तोड़ देगी, जो उस दुर्घटना में किसी चिड़िया के हलक़ से निकली होगी। हम बलात्कार को छोड़कर हर विषय पर चर्चा करेंगे।
आख़िर कब तक हम मूल विषय की आवाज़ को अपने शोर-शराबे की क्षमता से दबाते रहेंगे? कई बार ऐसा लगता है कि कहीं ये राजनैतिक दल इस बात की प्रतीक्षा तो नहीं करते कि चुनाव से पहले अगर विरोधी पार्टी की सरकार वाले राज्य में कोई बलात्कार हो जाए तो बाज़ी पलटी जा सकती है। …लेकिन मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी बलात्कार की प्रतीक्षा कर सकता है। लेकिन जिस तरह बलात्कार के बाद राजनीति होती है, उसे देखकर इस आशंका को सिरे से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता।
निश्चित रूप से, प्रशासन या राजनेता बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के समर्थन में नहीं हो सकते। लेकिन वे ऐसा कर पाने का नैतिक बल क्यों नहीं दिखा पाते कि इस तरह की किसी भी दुर्घटना पर अपराधी की जाति, धर्म और विचारधारा को दरकिनार करके स्पष्ट विरोध दर्ज कराए।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम ख़ालिस इंसान होकर सोचने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते? किसानों की आत्महत्या भाजपा के शासनकाल में हुईं तो कांग्रेस शोर मचाने लगी। अरे भाई, एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं करते कि एक भी आत्महत्या प्रशासन के लिए शर्मनाक है। फिर चाहे वह जिसकी भी सरकार हो।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम सब कोरे भारतवासी होकर क्यों नहीं सोच सकते। एक बार भाजपा समर्थक भाजपा से, और कांग्रेस समर्थक कांग्रेस से सवाल क्यों नहीं पूछ पाते?
ऐसी कौन सी शासन व्यवस्था का सपना हम देख चुके हैं जिसमें शासन कोई भी करे, व्यवस्था पूरी तरह चरमराई ही रहेगी? एक बार महंगे को महंगा, झूठे को झूठा, मूढ़ को मूढ़, भ्रष्ट को भ्रष्ट, अभद्र को अभद्र, अश्लील को अश्लील क्यों नहीं कहा जा सकता?
एक बार विपक्षी पार्टी में मौजूद किसी अच्छे इंसान की सार्वजनिक प्रशंसा क्यों नहीं की जा सकती? इतने लंबे समय तक राजनीति को प्रमुख मानकर देख चुके तो एक बार मुद्दों को प्रमुख मानकर क्यों नहीं देखा जा सकता?
किसानों के आंदोलन पर पानी की बौछार करवाने वाली सत्ता की आलोचना करने वाला विपक्ष एक बार इतना नैतिक बल क्यों नहीं जुटा पाता कि वह रामदेव के आंदोलन पर आधीरात को हुए लाठीचार्ज के लिए क्षमायाचना कर सके।
अलवर के बलात्कार पर अशोक गहलोत को घेरने वाले भाजपाई एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते कि बलात्कार हाथरस में हो या हैदराबाद में; अलवर में हो या दिल्ली में …बलात्कार सिर्फ़ बलात्कार होता है। और इस अपराध के अपराधियों को यथाशीघ्र सज़ा दिलवाने के लिए हम सब राजनीतिज्ञ एकजुट होकर काम करेंगे।
एक बार किसी बलात्कार की ख़बर में घटनास्थल, जाति और धर्म टटोलने से पहले हम अपने घर के आंगन में खेलती किलकारी के सिर पर हाथ फेरकर यह शपथ क्यों नहीं उठा सकते कि कम से कम इस एक विषय पर हमारी धारणा किसी राजनैतिक प्रोपेगेंडा से प्रभावित नहीं होगी। न पक्ष में, न विपक्ष में।
दलित का बलात्कार! क्या मतलब है इस बात का? सवर्ण का होता तो क्या अपराध न होता? मुस्लिम के साथ दरिंदगी? हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन के साथ होती तो दुखद न होती? आख़िर कब तक हम इन मातमों में माइक तलाशते रहेंगे?
कोई सद्भाव की बात करे तो उसमें वामपंथ तलाशा जाने लगता है। कोई मिलकर रहने को कहे तो उसे कांग्रेसी चमचा कहकर ट्रोल किया जाता है। कोई सांस्कृतिक चेतना का हवाला दे तो उसे संघी और भाजपाई कहकर अपमानित किया जाता है। कोई मनुष्यता पर सतर्क विवरण प्रस्तुत कर तो उसे रवीश का चेला कहा जाता है। कोई सभी दलों से अलग हटकर केवल भारतीय होने की अपील करे तो उसे केजरीवाल की राह पर चलने वाला बताया जाने लगता है।
मैं देश के सभी राजनैतिक दलों से अपील करता हूँ; मैं देश के सभी बुद्धिजीवियों से अनुरोध करता हूँ; मैं देश के सभी धर्मगुरुओं से निवेदन करता हूँ; मैं देश की सभी सेलिब्रिटीज़ से रिक्वेस्ट करता हूँ कि घृणा और विघटन की राह पर बहुत आगे निकल आए इस देश को एक बार मनुष्यता की भव्यता की याद दिलाएँ ताकि जब हमारी अगली पीढ़ी के साथ कोई अन्याय हो तो उसके आँसू पोंछने वाले हाथ उससे उसकी जाति, कुल, धर्म या राजनैतिक विचारधारा का सर्टिफिकेट न मांगे।

✍️ चिराग़ जैन

एक अदद मनुष्य का सवाल है

दो दिन पहले हिसार की ख़बर थी कि एक व्यापारी को उसकी कार में ज़िन्दा जला दिया। अब करौली की ख़बर है कि मन्दिर के पुजारी को ज़िन्दा जला दिया।
हे ईश्वर! पाशविकता का यह पथ आखि़र किस मन्ज़िल तक ले जायेगा हमारे समाज को। मैंने बचपन में एक महिला को आग की लपटों में घिरे हुए सड़क पर दौड़ते देखा है। (वह एक दुर्घटना थी, जिसमें खाना बनाती महिला की साड़ी ने अंगीठी से आँच पकड़ ली थी) लेकिन उस महिला की चीख़ें आज भी मेरे दिल को दहला देती हैं। मैं महीनों ठीक से सो न सका था।
पीड़ा, भय, निराशा और करुणा से गुँथी वह चीख़ जब भी याद आती है तो मन विह्वल हो उठता है। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि उस चीख़ में आक्रोश और घृणा भी मिल जाये, तो उससे तो सारा ब्रह्मांड काँप जाता होगा। फिर ऐसे कौन लोग हैं जिनके ज़मीर इनके प्रभाव से अनछुए रह जाते हैं!
इस घटना पर भी राजनीति और प्रशासन अपनी-अपनी फेस सेविंग से ज़्यादा कुछ न करेंगे, लेकिन इस आग की राख से यह प्रश्न पुनः उठ खड़ा हुआ है कि हम कौन से समाज का निर्माण करने में व्यस्त हैं? हम किस सभ्यता को पोसने में बेसुध हुए जा रहे हैं? हिन्दू-मुस्लिम; सवर्ण-दलित; ब्राह्मण-मीणा …और कितने विभक्त होंगे हम। कल ब्राह्मणों में भी शैव-वैष्णव होने लगेगा। आखि़र कहाँ जाकर अन्त होगा इस अभिशाप का?
करौली की घटना को ब्राह्मण बनाम मीणा का रंग दिया जा रहा है। हद्द है, हम उस समाज की स्थापना क्यों नहीं करते जिसमें पीड़ित और अपराधी दोनों को ही केवल मनुष्यता की कचहरी में खड़ा किया जाये! एक मीणा के अपराध से पूरा मीणा समाज अपराधी कैसे हो गया?
इस हिसाब से तो देश का प्रत्येक व्यक्ति अपराधी है। सामान्यीकरण की इसी प्रवृत्ति की आँच पर राजनीति अपनी रोटियाँ सेंकती है। ‘मरने वाला आदमी था क्या यही क़ाफ़ी नहीं!’ यही हमने हाथरस में किया और यही करौली में।
जातियों के इस वर्गसंघर्ष से देश को बचाने के लिये समाज में मुरझाती जा रही मानवता के बीजों को संरक्षित करना होगा ताकि अपराध करनेवाले को इस बात का डर रहे कि यदि वह अपराध करके घर लौटेगा तो अपने मुहल्ले में रहनेवाले मनुष्यों से आँखें कैसे मिलायेगा?

✍️ चिराग़ जैन

राजनीति की फ़िल्म इंडस्ट्री

राजनीति की स्क्रिप्टिंग और प्रशासन का अभिनय देखकर लगता है कि उत्तर प्रदेश में फ़िल्म इंडस्ट्री बनाने का विचार निराधार नहीं था।
✍️ चिराग़ जैन

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