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मेहंदी

सावन की हरियाली उतर आई है हथेलियों पर …महकने लगा है भाग्य! ✍️ चिराग़ जैन

लरजिश हमारे लहजे में

कहाँ अचानक मिले हैं हम-तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है महकती रुत उनके सुर्ख़ नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है किसी तरह भी समझने...

सावन

घन, पंछी, बरखा करें, गर्जन, कलरव, सोर हृदय मयूरा झूमिहै, ज्यों सावन में मोर जब मेघन का नेह जल, बरसत है चहुँ ओर इस प्रेमी मन भीगता, उत बिरहन की कोर ✍️ चिराग़...

उस घड़ी

आप संग गुज़रे लम्हे, पीड़ा अजानी हो गये प्यार के रंगीन पल, क़िस्से-कहानी हो गये हर किसी के ख़्वाब जब से आसमानी हो गये पाप के और पुण्य के तब्दील मआनी हो गये एक दीवाने से झोंके ने उन्हें छू भर लिया और उनकी चूनरी के रंग धानी हो गये सर्द था मौसम तो बहती धार भी जम-सी गयी धूप...

वसंत (दो चित्र)

परेशानियों में यदि उलझा हो अंतस् तो कैसा लगता है ये वसंत मत पूछिये एक-एक दिन एक युग लगता है; और कैसे होता है युगों का अंत मत पूछिये प्रेमगीत शोर लगते हैं और लिपियों के चुभते हैं कितने हलन्त मत पूछिये जल विच कमल सरीख़ा लगता है मन काहे बनता है कोई सन्त मत पूछिये धरती के...
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