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पुलिस और जनता के बीच का रिश्ता

सोशल मीडिया पर इन दिनों प्रशासन और जनता के बीच टकराव के बेशुमार वीडियो अपलोड हो रहे हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस देश के लगभग प्रत्येक नागरिक ने किसी न किसी चौराहे पर, किसी न किसी थाने में या किसी न किसी सड़क पर किसी पुलिसकर्मी का दुर्व्यवहार झेला है।
सभ्य नागरिक से सभ्यता से बात करनेवाले पुलिसकर्मियों की संख्या निश्चित रूप से बहुत कम है। यदि देश एक परिवार है तो पुलिस इस परिवार की वह चिड़चिड़ी भाभी है, जो सबके साथ ही अभद्र व्यावहार करती है, और अब लोगों ने उसकी आदतों का बुरा मानना बंद कर दिया है।
आप परिवार के साथ कहीं जाओ चाहे अकेले हो, पुलिसकर्मी ने यदि आपको रोक लिया तो आपका चेहरा उतर ही जाना है। बड़े-बुजुर्ग अपनी पीढ़ियों को समझाते हैं, ‘पुलिसवाले से मत उलझो, वरना जीना हराम हो जाएगा।’
जबकि सत्य यह है कि भारत में जो लोग पुलिस की वर्दी पहनकर कानून के प्रतिनिधि बनकर घूम रहे हैं, वे कहीं दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं। वे हमारे ही परिवारों के बेटे-बेटियाँ हैं।
यह भी सत्य है कि जनसंख्या के अनुपात में पुलिसकर्मियों की संख्या इतनी कम है कि लगभग हर थाने में हर पुलिसकर्मी के पास पेंडिंग फाइल्स की भरमार रहती है।
न्यायपालिका, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की फटकार झेलते हुए, इन पुलिसकर्मियों की विनम्रता भड़ास बन गई है। और यही भड़ास इनकी बोली और गालियों के माध्यम से आम आदमी पर बरसती रहती है।
सड़क पर ड्यूटी करते किसी कांस्टेबल या सबइंस्पेक्टर से आप तब तक सभ्य व्यवहार की अपेक्षा नहीं कर सकते, जब तक आप स्वयं कोई तोप न हों, या फिर वह आपको व्यक्तिगत रूप से पहचानता न हो।
इन परिस्थितियों का दुष्परिणाम यह है कि कांस्टेबल, सब इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर स्तर के पुलिसकर्मियों को उनके उपरवालों से सम्मान नहीं मिलता और जनता से प्यार नहीं मिलता। दुर्भाग्यवश पुलिस महकमे में यही वह तबका है, जिसका आम जनता से सामना होता है।
ऐसे में जनता और प्रशासन के मध्य परस्पर घृणा का माहौल बन चुका है। पुलिसकर्मी आम आदमी को उसके मुँह पर गाली देता है और आम आदमी पुलिसकर्मियों को उनकी पीठ पीछे गाली देता है।
कानून के क्रियान्वयन के लिए पुलिसकर्मियों को यदि हथियार और अधिकार नहीं थमाए गए तो अपराध नहीं रुक सकते। किन्तु जिनकी रक्षा के लिए पुलिसकर्मियों को अधिकार और हथियार सौंपे गए हैं, उन्हीं के अधिकारों का हनन करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
प्रथम दृष्टया ही प्रत्येक नागरिक को अपराधी मान लेने की प्रेक्टिस इतनी पक चुकी है कि अब पुलिसकर्मी, किसी समान्य नागरिक से भद्र व्यवहार करना अपनी तौहीन समझने लगे हैं।
मैंने सामन्यतः पुलिसकर्मियों को सहज या सरल आचरण करते हुए कम देखा है। वे मुझे अक्सर दो ही परिस्थितियों में दिखाई देते हैं, या तो वे किसी पर चढ़े हुए होते हैं, या फिर उन पर कोई चढ़ा हुआ होता है।
45 डिग्री की गर्मी से लेकर, हाड़ कंपाती सर्दी और मूसलाधार बारिश तक ड्यूटी पर मुस्तैद रहनेवाले इस पुलिसकर्मी की समाज में यह दुर्दशा क्यों हो गई कि जिस जनता की सुरक्षा के लिए ये खाकी पहनकर घर से निकलते हैं, वही जनता इनके प्रति क्रुद्ध और क्षुब्ध है।
चौकीदार किसी भवन के गेट पर आपको रोककर रजिस्टर में एंट्री करने को कहता है और आप चिढ़ जाते हैं, तो आप समझ लें कि आप अराजक नागरिक है। आपकी और आपके समाज की सुरक्षा के लिए आपके मार्ग में अवरोधक लगाना उसकी विवशता है। किन्तु 100 रुपये का नोट आपसे वसूलने के लिए उन अवरोधकों का दुरुपयोग करनेवाला पुलिसकर्मी भी सामाजिक आचरण को अराजक बनाने का अपराधी है।
यदि खेत ही बाड़ से चिढ़ेगा तो फसल की सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी, लेकिन यदि बाड़ ही खेत को खाने लगेगी तो पूरा खेत ध्वस्त हो जाएगा।
पुलिसकर्मियों से बातचीत शुरू होते ही कैमरे ऑन करनेवाले लोग इस बात के प्रमाण हैं कि पुलिस महकमे ने जनता के साथ दुर्व्यवहार किया है। परिस्थितियों के किसी भी झरोखे से झाँक लो, गाली, मारपीट, अपमान और रिश्वतखोरी से त्रस्त जनता कानून के इन पहरेदारों से सहज नहीं हो सकेगी।
सिंघम जैसी फ़िल्में देखकर जनता ने यह तो समझ लिया कि पुलिसकर्मियों का जीवन आसान नहीं होता। सिंघम जैसी फ़िल्मों ने यह तो समझा दिया कि राजनैतिक दबाव, विभागीय भ्रष्टाचार और अपने वेतन-भत्तों की हकीकत के बीच ड्यूटी करना कितना कठिन है। लेकिन इतनी सी बात आज तक इस देश की जनता समझ नहीं पा रही कि किसी नागरिक से गाड़ी के काग़ज़ मांगते समय उससे बदतमीजी करना क्यों आवश्यक है। किसी का अपराध सिद्ध होने से पहले ही उसे अपराधी मान लेने की आदत किस विवशता का परिणाम है।

✍️ चिराग़ जैन

रहिमन काग़ज़ राखिए…

कई बार ऐसा महसूस होता है कि धरती पर हमारा जन्म ही केवल काग़ज़ सम्भालने के लिए हुआ है। आपके पास काग़ज़ हैं, तो सब कुछ है। आपके पास घर है, लेकिन घर के काग़ज़ नहीं हैं तो भले ही आप महल में रह रहे हो, सरकार के लिए आप बेघर हो। लेकिन सड़क पर रहनेवाले बेघर के नाम की, किसी मकान की रजिस्ट्री अगर सरकारी बाबू को मिल गई तो फिर वो लाख सिर पटक ले, उसे बेघर नहीं माना जाएगा।
कोई पैदा हुआ तब माना जाता है, जब उसके पैदा हो जाने का काग़ज़ बरामद हो जाए। ऐसे ही कोई मरा हुआ भी तब माना जाता है जब नगर निगम उसके मरण का दस्तावेजीकरण कर देता है। और ये मरने का काग़ज़ हासिल करने के लिए भी बहुत काग़ज़ लगाने पड़ते हैं। भले ही नगर निगम का पूरा महकमा किसी की शवयात्रा में सशरीर शामिल हुआ हो, भले ही स्वयं यमराज किसी के मरने की गवाही देने उपस्थित हो जाएं, लेकिन काग़ज़ लगाए बिना मरण प्रमाण-पत्र नहीं मिलेगा। उल्टे कोर्ट, यमराज को अपने यमराज होने के कागज़ प्रस्तुत करने का आदेश भी दे सकता है। आखिर हर चीज़ का कोई सिस्टम होता है।
मनुष्य जाति ज्यों-ज्यों विकसित हुई, त्यों-त्यों इन काग़ज़ों को सम्भालनेवाले लोग, पेशे और विभाग भी विकसित हुए। चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, अभिलेखागार जैसी संज्ञाएं काग़ज़ के महत्व का प्रमाण हैं।
आम आदमी के लिए आवश्यक है कि वह काम से ज्यादा काग़ज़ पर ध्यान दे। आम आदमी हमेशा काग़ज़ों से घबराया रहता है। लेकिन सिस्टम कभी काग़ज़ से नहीं घबराता। उसे अच्छी तरह पता है कि कब कौन सा काग़ज़ मिलना चाहिए और कब कौन सा काग़ज़ नहीं मिलना चाहिए।
आपको बैंक में खाता खोलने के लिए पैन कार्ड, आधार कार्ड, बायोमैट्रिक और गवाही जैसे पर्याप्त काग़ज़ देने पड़ते हैं। फिर भी आप काग़ज़ का महत्व भूल न जाओ, इसलिए बैंक समय-समय पर आपका केवाईसी करता है। इस प्रक्रिया में आप उन्हीं कागज़ों की एक और कॉपी नत्थी करते हैं। बैंक नयी कॉपी को पुराने काग़ज़ से मिलाकर सन्तुष्ट होता है कि उसके कस्टमर का काग़ज़ी चरित्र बिल्कुल नहीं बदला है। इस प्रक्रिया के पूर्ण हुए बिना आप अपने खाते से अपना ही पैसा नहीं निकाल सकते हैं। किन्तु जब आपके साथ कोई डिजिटल फ्रॉड हो जाए तो अपराधी ने आपके खाते से पैसा किस खाते में ट्रांसफर किया। किस जगह से उसे निकाला गया। किस ब्रांच में उसका केवाईसी हुआ, कहाँ उसने साक्षात आकर बायोमैट्रिक किया और किसने उसके अस्तित्व की गवाही दी- पुलिस को ये काग़ज़ नहीं मिलते। अर्थात्‌ आपके खाते में से आपको पैसा निकालना है, तो केवाईसी ज़रूरी है, लेकिन कोई प्रतिभाशाली जेबकतरा आपके बैंक खाते से पैसा बिना केवाईसी के निकाल सकता है।
बीमा एजेंट जब बीमा करने आता है तब वह बीमित व्यक्ति का परिचित होता है। तब उसे किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं होती। ‘अरे भाईसाहब, मैं बैठा हूँ ना’ और ‘आप फ़िकर मत करो’ जैसे मंत्रोच्चार से वह नागरिक के माथे पर बीमातिलक लगा देता है। लेकिन जैसे ही उस नागरिक को इंश्योरेंस के क्लेम की ज़रूरत पड़ती है, तब अचानक वह परिचित एजेंट ‘सिस्टम’ बन जाता है। और सिस्टम के लिए तो काग़ज़ लगाने ही पड़ते हैं।
किसी नागरिक की छवि आयकर इंस्पेक्टर की आँखों में उतर जाए, तो उसके परदादा ने बचपन में उसे जो चवन्नी दी होती है, उसको भी गैरकानूनी नकद लेनदेन साबित कर दिया जाता है। लेकिन ईमानदारी से टैक्स देने के बाद बचे हुए पैसे हड़पकर, जब कोई बिल्डर घर नहीं देता तो वकीलों को बिल्डर की बेईमानी सिद्ध करने में दस-दस साल लग जाते हैं।
काग़ज़ जब चाहे प्रकट हो जाता है, जब चाहे विलीन हो जाता है। यह काग़ज़ की लीला है। इसलिए आपका पेट भरे या न भरे, काग़ज़ का पेट भरते रहो। क्योंकि रहीम ने कहा है- “रहिमन काग़ज़ राखिए…”
✍️ चिराग़ जैन

कविता और सत्ता

पौराणिक सन्दर्भों से लेकर आज तक गुरुकुल और कविता ने सत्ता का निर्देशन किया है। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त हो या सिकंदर सरीखा विश्वविजेता; सभी ने गुरुकुल की तर्जनी का सम्मान किया है।
यह व्यवस्था इसलिए भी अपरिहार्य है कि सत्ता जनभावना से सीधे संपर्क में नहीं रह पाती। अवसरवादी चाटुकार सत्ता को भ्रमित करने में सदैव सक्रिय रहते हैं, ऐसे में कवि, ऋषि और कभी-कभी विदूषक; राजा से अभय प्राप्त करके राजा को जन-समस्याओं और अभिरुचियों से परिचित कराते हैं।
किन्तु वर्तमान समय में, प्रत्येक राजनैतिक दल ने कवियों और विचारकों को अपने इशारे पर चलाने का अभ्यास प्रारंभ कर दिया है।
कल राजस्थान के भवानीमंडी कवि सम्मेलन में एक पार्षद ने विनीत चौहान कवि को कविता-पाठ से इसलिए रोक दिया कि उनकी बातें कांग्रेस का राजनैतिक नुकसान कर रही थीं। ऐसा ही मामला राजस्थान के नौहर में छह महीने पहले भी घटा था, जहाँ गले में भगवा पटका डाले कुछ युवकों ने सुरेन्द्र शर्मा जी को इसलिए टोक दिया क्योंकि वे साम्प्रदायिक सद्भाव की बात कर रहे थे। उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष एक कार्यक्रम इसलिए रद्द करना पड़ा क्योंकि आयोजकों ने उसमें मुस्लिम कवियों को भी निमंत्रित किया था। एक व्यंग्यकार के साथ भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं क्योंकि वे भाजपा की नीतियों पर कटाक्ष करते हैं!
कवि जन का प्रतिनिधि है। कवि समाज का हृदय और मस्तिष्क है, और राजनीति समाज का हाथ हैं जो शक्ति की तलवार से सज्ज है। यदि हृदय और मस्तिष्क हाथों को नियंत्रित न करें तो ये तलवार समाज को काट डालेगी। l
जो कवि इन दिनों किसी राजनैतिक दल के प्रचारक बनकर सत्ताओं का गुणगान करने में व्यस्त हैं, उन्हें समझना होगा कि कविता का कार्य सिंहासन को दर्पण दिखाना है। और जो आयोजक अपने आपको कवियों का नियामक समझकर उन्हें कविता लिखने-पढ़ने का सलीक़ा सिखाने निकले हैं, उन्हें समझना होगा कि नंदवंश और कुरुवंश क्यों नष्ट हुए!
कांग्रेस हो या भाजपा; आप हो या सपा… कवि-सम्मेलनों में हो रहे मनोरंजन और वैचारिक विमर्ष को सहिष्णु होकर सुनना आपकी नैतिकता नहीं आवश्यकता है। क्योंकि यदि मंच ने आपके मन मुताबिक आपको प्रसन्न करना शुरू कर दिया तो यह आपकी राजसत्ता को विनष्ट करने का उपाय होगा!
आपातकाल हो या बोफोर्स; कॉमनवेल्थ हो या अन्ना आंदोलन, कवि सम्मेलन का मंच हमेशा जनता के पक्ष में खड़ा दिखाई दिया है। राजनीति यह अच्छी तरह समझ ले कि कड़वा पचाने की क्षमता न रही तो सत्ता के चाटुकारों की मनपसंद बातें तुम्हारे लिए मधुमेह बन जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन

अराजकता को साधुवाद

‘नो एफआईआर, नो इन्वेस्टिगेशन, नो चार्जशीट, फैसला ऑन द स्पॉट…’ -ऐसे संवाद फिल्मों में तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में इस डायलॉग पर काम करनेवाले कार्यपालक निरंकुश हो जाते हैं।
यह सत्य है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और लचर व्यवस्था का ही दुष्प्रभाव है कि ‘फ़ैसला ऑन द स्पॉट’ जैसे अराजक संवाद इस देश में ‘लोकप्रिय’ हो जाते हैं। पुलिस की वर्दी पहनकर भी क़ानून को ताक पर रखनेवाले पुलिसवालों को हमने ‘दबंग’; ‘सिंघम’; ‘सिमबा’ और ‘पुलिसगिरी’ जैसी फिल्मों में अराजक होते देखा तो हमने यह कहकर स्वयं को संतुष्ट कर लिया कि इस देश में अपराधियों का यही इलाज है।
यदि डॉक्टर अयोग्य होगा तो कंपाउंडर के हाथ में सर्जिकल नाइफ़ सौंप देंगे क्या? डॉक्टर को कर्मठ और सक्षम बनाने की बजाय हम कंपाउंडर के ऑपरेशन करने को तो जस्टिफाई नहीं किया जा सकता ना! निरंतर डॉक्टरों के साथ रहने का कारण, ऑपरेशन थियेटर में आने-जाने के कारण वार्ड बॉय भी शल्य चिकित्सा की शब्दावली सीख जाता है, लेकिन उसे किसी की सर्जरी करने को तो नहीं कहा जा सकता ना!
न्यायालय किसी लोकतंत्र के शल्य चिकित्सक हैं और पुलिसकर्मी इस अस्पताल का नॉन मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ। अस्पताल की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह स्टाफ बहुत आवश्यक है, किन्तु सामान्य बुखार में भी कोई टेबलेट लिखने की छूट इस स्टाफ को नहीं दी जा सकती।
हैदराबाद में जब पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया था तो लोगों को तालियाँ पीटते देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था। मैं यह नहीं जानता कि वह एनकाउंटर झूठा था या बनावटी। लेकिन उस घटना पर पुलिस की पीठ थपथपाने वाले यह ज़रूर मानते थे कि पुलिस ने एनकाउंटर का नाटक करके आरोपियों की हत्या की है। यदि वह एनकाउंटर सत्य भी रहा हो तो भी इलाज के लिए वार्ड से ऑपरेशन थियेटर में ले जाते समय यदि किसी मरीज़ की मौत हो जाए तो उसका श्रेय अथवा दोष वार्ड बॉय को कैसे दिया जा सकता है?
उस दिन हैदराबाद की घटना पर जो सोशल मीडिया ट्रोलिंग हुई थी वह इस देश की संवैधानिक तथा न्यायिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा कुठाराघात था। उसके बाद विकास दुबे प्रकरण, फिर मृतका के घरवालों को घर में बंद करके आधी रात को पेट्रोल डालकर शवदाह करने की घटना या कोई भी अन्य नागरिक… ये सब घटनाएँ उस अराजकता का एक झरोखा है, जो हमारे समाज में मूर्खतापूर्ण महत्वाकांक्षाओं के हाथों बोई जा रही है।
मरनेवाले को हिन्दू अथवा मुस्लिम के स्थान पर इस देश के एक नागरिक के रूप में देखेंगे तो आप स्वीकार कर सकेंगे कि उसे अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए था। जिन फिल्मों में हमने पुलिसिया गुंडागर्दी पर तालियाँ बजाई हैं, उन्हीं फिल्मों से यह भी सीखा जा सकता है कि कई बार परिस्थितियाँ और इत्तेफ़ाक किसी निर्दाेष को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर देते हैं। अदालतें इसी संदेह की पड़ताल करने का माध्यम हैं।
मैं फिर दोहरा रहा हूँ कि न्याय व्यवस्था को आत्मावलोकन करके अपनी गति तथा कार्यप्रणाली को सुधारने की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन जब तक यह काम न हो तब तक भी न्यायालय का विकल्प थाना नहीं हो सकता।
भारतीय लोकतंत्र की एक इकाई होने के नाते प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह व्यवस्था का सम्मान करे। अराजकता किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। व्यवस्था में कोई ख़ामी आई तो उसे सुधारा जा सकता है किंतु अराजकता का चेहरा समाजसेवा, राष्ट्रहित और समाजहित से हू-ब-हू भी मिलता हो तो भी उसके निरंकुश होने की शत-प्रतिशत गारंटी होती है।
आशा है कि भविष्य में किसी कम्पाउंडर को सर्जरी करते देखेंगे तो कम से कम हम तालियाँ तो नहीं पीटेंगे; क्योंकि अगली बार ऑपरेशन टेबल पर हम भी हो सकते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

गंगा और शव

कौन कहता है कि गंगा में लाशें बह रही हैं
अब तो लाशों में गंगा बह रही है।

कौन कहता है कि प्रशासन
साम्प्रदायिक भेदभाव करता है
प्रशासन तो सब लाशों से
एक जैसा बर्ताव करता है।

कौन कहता है
नदी किनारे मानव सभ्यता पनपती है
अब तो नदी तट पर
मानवता की रूह दहलती है।

साहेब!
एक बात बताओगे
अगर हर घाट पर मुर्दे दफ़्न होंगे
तो अगली दिवाली पर
दीये कहाँ जलाओगे?
✍️ चिराग़ जैन

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