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रहिमन काग़ज़ राखिए…

कई बार ऐसा महसूस होता है कि धरती पर हमारा जन्म ही केवल काग़ज़ सम्भालने के लिए हुआ है। आपके पास काग़ज़ हैं, तो सब कुछ है। आपके पास घर है, लेकिन घर के काग़ज़ नहीं हैं तो भले ही आप महल में रह रहे हो, सरकार के लिए आप बेघर हो। लेकिन सड़क पर रहनेवाले बेघर के नाम की, किसी...

कविता और सत्ता

पौराणिक सन्दर्भों से लेकर आज तक गुरुकुल और कविता ने सत्ता का निर्देशन किया है। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त हो या सिकंदर सरीखा विश्वविजेता; सभी ने गुरुकुल की तर्जनी का सम्मान किया है। यह व्यवस्था इसलिए भी अपरिहार्य है कि सत्ता जनभावना से सीधे संपर्क में नहीं रह पाती।...

अराजकता को साधुवाद

‘नो एफआईआर, नो इन्वेस्टिगेशन, नो चार्जशीट, फैसला ऑन द स्पॉट…’ -ऐसे संवाद फिल्मों में तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में इस डायलॉग पर काम करनेवाले कार्यपालक निरंकुश हो जाते हैं। यह सत्य है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और लचर व्यवस्था का ही...

गंगा और शव

कौन कहता है कि गंगा में लाशें बह रही हैं अब तो लाशों में गंगा बह रही है। कौन कहता है कि प्रशासन साम्प्रदायिक भेदभाव करता है प्रशासन तो सब लाशों से एक जैसा बर्ताव करता है। कौन कहता है नदी किनारे मानव सभ्यता पनपती है अब तो नदी तट पर मानवता की रूह दहलती है। साहेब! एक बात...

सत्यमेव जयते

सत्य के आधार पर खड़े चार-चार शेर भी झूठ बोलनेवालों को कुछ नहीं कहते। देश की हर सरकारी मुहर पर एक झूठ लिखा है – ‘सत्यमेव जयते’। ✍️ चिराग़...
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