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अलविदा 2016

कड़वी यादों के संग बीता दो हज़ार सोलह का साल ऐसी उथल-पुथल थी इसमें, कोई पाया नहीं संभाल अभी साल प्रारंभ हुआ था, चढ़े दूसरे सूरजदेव वायुसैनिकों के सम्मुख थे आतंकों के अधम कुटेव पश्चिम में आतंक चढ़ा तो पूरब में दहला इम्फाल भारत भर को स्तब्ध कर गया, तीन जनवरी का भूचाल अभी...

प्रेम के इक ताल में

आजकल मुझसे न पूछो, कब उगा सूरज गगन में आजकल मैं प्रेम के इक ताल में उतरा हुआ हूँ बुद्धि का मत है विकलता मौन से होगी नियंत्रित किन्तु हर इक रोम अब वाचाल हो बैठा अचानक अब गिरा या तब गिरा का एक कौतुक चल रहा है मन मुआ मोती भरा इक थाल हो बैठा अचानक भाग्य है जिसका चुभन...

श्रद्धांजलि : अनुपम मिश्र जी को

सूखी बावड़ी बिलख कर रोई है आज; सूखे कुओं की कागलें क्षण भर छलछला कर सूख गई हैं फिर से; जर्जर तालाबों की मिट्टी बैठ गई है थक कर! पानी की पीर को बानी देने वाली आवाज़ ख़ामोश हो गई है आज। सूखे स्रोतों से बतिया कर जो तर कर देता था उनका दामन वो निःशब्द हो गया है। एक पानीदार...

केदारनाथ धाम का उलाहना

देखकर तुमको पुलककर खोल दूंगा द्वार इस भ्रम में नहीं रहना! याद रखना, सर्द बर्फीली हवा से भागकर तुम मधुर मनुहार के हर इक नियम को त्यागकर छोड़ जाते हो कड़कती ठण्ड से बन स्वार्थी बर्फ़ के वीरान जंगल में अकेला, बेसहारा ये सभी कुछ भूलकर तुमसे मिलूंगा; मैं निरा ईश्वर नहीं हूँ।...
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