Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
एक समय था
जब मीडिया वाले भी सच बोलते थे
सरकारी घोषणाओं की कलई खोलते थे
फिर हर तरफ बस एक ही तस्वीर छा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
विश्वास करो भाईसाहब
पैट्रोल पंप पर सिर्फ़ ईंधन का व्यापार होता था
फिर आ गई भाजपा
अब वहाँ भी साहिब का प्रचार होता था
ईडी और सीबीआई
लोकतंत्र के सिपाही थे
अपराध और भ्रष्टाचार के लिए तबाही थे
फिर आ गई भाजपा
अब इनके रिमोट ख़ुद जिल्ले-इलाही थे
जो हमसे पंगा ले
उसी को रगड़ दो
कैसे भी करके उस पर एक चार्जशीट जड़ दो
बाद में कोर्ट में डाँट पड़ती हो
तो पड़ने दो
विपक्ष को जेल में सड़ने दो
ख़ुद भाजपा के कार्यकर्ता
सारी ज़िन्दगी मेहनत करते थे
कि कभी तो उनके भी झंडे तनेंगे
आडवाणी जी को उम्मीद थी
कि एक दिन वो कुछ बनेंगे
फिर देश में भाजपा आ गई
सारी उम्मीदों पर पानी फिरा गई
पहले रेलमंत्री रेल का उद्घाटन करते थे
विदेश मंत्री विदेशों में विचरते थे
फिर हर मंत्रालय की योजनाओं पर
एक ही तस्वीर छप-छपा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
मंदिर, पद्मावत जैसे मुद्दे छाने लगे
महँगाई को विकास बताने लगे
रोज़गार, ग़रीबी जैसे मुद्दों को
गाय माता चबा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
पहले उद्योगपतियों के टैक्स के पैसे से
सरकार भरती थी घाटा
लेकिन फिर लोकहित को करके टाटा
सरकारी कंपनियाँ
उद्योगपतियों की जेब में समा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई।
आते हुए जो सड़क बनी थी
वो जाने से पहले ही लड़खड़ा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
संसद लीक, पेपर लीक
एयरपोर्ट की छत धड़ाम
खिलाड़ी, डॉक्टर, किसान सड़क पर
अधबने मंदिर में श्रीराम
करोड़ों की मूर्ति ध्वस्त
साहिब फोटो खिंचवाने में मस्त
दो-दो इंजन के बाद भी
ट्रेन पटरी को ठेंगा दिखा गई
कमाल ही हो गया
इस देश में भाजपा आ गई
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Jainism, Poetry
सभी का मन सशंकित हो रहा था
बहुत दिन से कहीं कुछ खो रहा था
जुड़े सब हाथ ढीले पड़ गए थे
पनीले नेत्र पीले पड़ गए थे
तपस्या चरम तक आने लगी थी
ये भौतिक चर्म कुम्हलाने लगी थी
व्रतों पर नूर इतना चढ़ गया था
कि तन का रंग फीका पड़ गया था
हुई जर्जर तपस्यायुक्त काया
तो यम सल्लेखना का व्रत उठाया
किया आचार्य के पद से किनारा
व्रती ने मृत्यु तक का मौन धारा
सुना जिसने, वही थम-सा गया था
गला सूखा, हलक जम-सा गया था
ख़बर ये फैलती थी आग बनकर
हृदय छलका सहज अनुराग बनकर
श्रमण सब बढ़ चले विश्वास लेकर
तपस्वी के दरस की आस लेकर
दिगम्बर साधुओं के संघ दौड़े
हृदय के संग सारे अंग दौड़े
व्रती अंतिम तपस्या कर रहा था
अभागा तन विरह से डर रहा था
हठी तप में जुटा था मौन साधे
खड़ी थी मृत्यु दोनों हाथ बांधे
धरा पर भाग्य जागा था मरण का
उसे अवसर मिला गुरु के वरण का
बिताए तीन दिन यूँ ही ठहर कर
मगर फिर रात के तीजे पहर पर
अचानक साँस की ज़ंजीर तोड़ी
वियोगी ने ये नश्वर काय छोड़ी
चले, त्रैलोक्य तक विस्तार करके
गए ज्यों राम सरयू पार करके
दिगम्बर साधना का बिंदु खोया
व्रतों का चंद्रगिरि में इंदु खोया
धरा से त्याग का प्रतिरूप लेकर
चली हो सांझ जैसे धूप लेकर
पिपासा से अमिय का कूप लेकर
चली है मौत जग का भूप लेकर
प्रजा जागी तो बस माटी बची थी
प्रयोजन गौण, परिपाटी बची थी
चिता में जल रहा दिनमान देखा
सभी ने सूर्य का अवसान देखा
धरा का धैर्य दूभर कर गया है
धरा से स्वयं विद्याधर गया है
✍️ चिराग़ जैन
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ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा
तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया
तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया
मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें
मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें
जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है
मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है
जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ
जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ
ये खेल ज़िन्दगी का अपने हाथ है ही नहीं
है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं
हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है
बहुत ख़ुशी है ज़िन्दगी में, ज़रा-सा ग़म है
ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है
ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है
जो लम्हा बीत रहा है, उसे सलाम करूँ
बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ
मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊंगा
ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन
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एक रात
एक न्यूज़ चैनल
स्पीड की सारी हदें पार कर गया
न्यूज एंकर ने
मेरे टीवी पर
मुझे ही बताया कि मैं मर गया
नेशनल चैनल की न्यूज़ थी
इसलिए संदेह भी नहीं कर सकता था
और मीडिया का इतना सम्मान करता हूँ
कि इस ख़बर को सच साबित करने के लिए
मैं सचमुच मर सकता था
मैंने भी एक झटके में
दुनिया के हर तेज़ चैनल को बीट कर दिया
और अपने ट्विटर हैंडल से
अपनी ही आत्मा की शांति का ट्वीट कर दिया
अब क्या था
मेरी अच्छाइयों की चर्चा
हर फेसबुक फ्रेंड करने लगा
डेढ़ घंटे में ही RIP CHIRAG का हैशटैग
सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा
मेरे बारे में ऐसी-ऐसी बातें लिखी गईं
जिनके बारे मैं मैं ख़ुद नहीं जानता था
उस दिन मैंने लगभग डेढ़ सौ ट्वीट उन अजनबियों के पढ़े
जिन्हें मैं अपना भाई मानता था
उस दिन मुझे पता चला
कि मैंने
अपनी हर नयी कविता को
किस-किस से ठीक करवाया
ढाई सौ लोग ऐसे मिले
जिन्होंने मदद करके
मेरा एक कमरे का मकान बनवाया
उस दिन हर इंसान के
बदले हुए किरदार दिख रहे थे
जो मुझसे उधार लिए बैठे हैं
वो भी मुझे कर्ज़दार लिख रहे थे
उस दिन इतनी ऊँची-ऊँची छोड़ी गई
कि छोड़ने वाले ख़ुद ही नहीं पकड़ पाए
तीन सौ लोगों ने मुझे उंगली पकड़ कर मंच पर चढ़ाया
और उनमें से ढाई सौ तो ख़ुद नहीं चढ़ पाए
एक ने तो यहाँ तक लिखा
कि मुझे हिन्दी का व्याकरण ही उससे ‘सिखा’
वो बहुत प्रतिभाशाली था
वो बहुत अच्छा था
हमेशा खरा बोलता था
मंच पर जादू करता था
हर ओर मेरे सद्गुणों की चर्चा ख़ूब होने लगी
कॉपी-पेस्ट टाइप की श्रद्धांजलियां पढ़-पढ़कर
मुझे मरने से ऊब होने लगी
जब लोगों ने मेरी बर्दाश्त से ज़्यादा
मेरा महिमामंडन कर दिया
तो मैंने अपने मरने की ख़बर का खण्डन कर दिया
खण्डन की ख़बर से
एक ओकेजनल फ्रेंड सचमुच उदास हो गया
कितनी मेहनत से श्रद्धांजलि की पोस्ट लिखी थी
तेरह सौ लाइक्स भी आ गए थे
सारी माइलेज का सत्यानाश हो गया
एक रिश्तेदार ने गुस्से में फोन किया
ये क्या तरीक़ा है भाईसाहब
पहली बार तो आपकी मौत की न्यूज़ मिली थी
वो भी झूठ हो गयी
आपकी तो शोकसभा तक हूट हो गई
मैंने तो तेरहवीं के लिए
हलवाई भी बुक करवा दिया है
भाईसाहब आपने नहीं मर के
मुझे मरवा दिया है
एक ने तो गुस्से में यहाँ तक कह डाला
फिर बच गया साला।
थोड़ी ही देर में मैं जान चुका था
कि आज की दुनिया में
मौत की ख़बर का भी
मल्टिपल यूज़ है
ऐसी हर ख़बर
किसी के लिए पोस्ट
किसी के लिए ट्वीट
और किसी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ है
हम लोगों को एक-दूसरे के मर जाने का इंतज़ार है
ज़िंदा बच जाने का डर है
संवेदना की लाश पर खड़े लोगों के लिए
अब मौत भी एक अवसर है
✍️ चिराग़ जैन
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पहले शेर ने दूसरे से कहा
यार इतना समृद्ध तो यह देश कभी नहीं रहा
हो न हो, अपने भारतीय
विकास की सबसे ऊँची सीढ़ी चढ़ रहे हैं
ज़रूरत के लिए नहीं
मूरत के लिए लड़ रहे हैं।
दूसरे का उत्तर सुनने से पहले
तीसरा शेर बीच में ही बोल पड़ा
जितना ये लड़ रहे हैं
उतना तो अपना अशोक भी कलिंग में नहीं लड़ा
तभी चौथे शेर ने टोका
तीनों शेरों को बोलने से रोका
चुप हो जाओ भाइयो
ज़रा-सा मुँह खुलने पर ही
विवाद बड़ा हो गया है
अपना बंद मुँह
अपने खुले मुँह के सामने खड़ा हो गया है
हमारे मुँह का मुद्दा ट्रोल आर्मी ने जी भरकर घिसा
हमारे फेस एक्सप्रेशंस का अर्थ समझने में
फेल हो गई मोनालिसा
तभी एक लाईक लोलुप देशभक्त
अपनी डिग्रियों पर पैर रखकर
शेर के सामने खड़ा हो गया
सीन इतना रोचक था
कि हर मुद्दे से बड़ा हो गया
शेर की ऊँचाई नापने के लिए
वो अपनी सीमाएँ भी भूल गया
और जोश-जोश में
महँगाई का ग्राफ पकड़ कर झूल गया।
जैसे-तैसे वो दोपाया
पहले शेर के मुँह तक आया
और मुँह में हाथ डालकर
गिनने लगा शेर के दाँत
देखनेवालों को याद आ गयी
एक और पुरानी बात
इतिहास की इस ऊहापोह में
वर्तमान के सवाल सिसक-सिसक कर मरते रहे
लोग खुले मुँह पर अटके रहे
और आँखों से आँसू झरते रहे।
✍️ चिराग़ जैन
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विक्रम तुम तो वर्तमान हो
बल, विवेक, सामर्थ्य सभी कुछ मिला-जुलाकर
आगत का सिंगार करो तुम
ये क्या अपने कंधे पर तुम भूत लादकर घूम रहे हो
क्या तुमको आभास नहीं है
जब भी तुम उस प्रेतकाय के
उलझे केशों से उलझे हो
तब तब तुम अपने भविष्य को
पीठ दिखाए खड़े रहे हो
और कभी जब उसे लादकर
तुम भविष्य की ओर बढ़े हो
तब उसने तुमको बेमतलब
गल्प-कथा में व्यस्त किया है
ऐसी कितनी दंतकथाएँ
तुम्हें भविष् की ओर
देखने से हरदम रोका करती हैं
तुम उसके प्रश्नों का उत्तर देकर ज्यों ही इतराते हो
वह अतीत फिर उसी डाल की ओर
अचानक उड़ जाता है
और तुम्हारा पांव दुबारा
फिर भविष्य को छोड़
भूत की ओर यकायक मुड़ जाता है
तुम जो इस नंगे अतीत को
अपने कंधे पर ढो-ढोकर
किसी तंत्र तक ले आने पर अड़े हुए हो
केवल इस ज़िद के कारण ही
वर्तमान से बहुत दूर तुम
किसी भयानक भूत-स्थल पर खड़े हुए हो
काश कभी ये जान सको तुम
तुम्हें भूत के पीछे जिसने भेज दिया है
वह तुमसे निष्कंटक होकर
अपनी स्वार्थ साधना में संलग्न हुआ है
उसे पता है
भूत कभी भी उस मसान से बाहर नहीं निकल सकता है
कोई कैसा भी विक्रम हो
अगर भूत से उलझ गया तो
भूत उसे भी उस मसान से बाहर नहीं निकलने देगा!
✍️ चिराग़ जैन