Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
सभी होठों पे इक मुस्कान धरता है लतीफ़ा
हरेक महफ़िल में सुन्दर रंग भरता है लतीफ़ा
किसी मनहूस के कानों में पड़कर घुंट न जाए
इसी इक बात से हर रात डरता है लतीफ़ा
गली, नुक्कड़, सफ़र, महफ़िल, महोत्सव और दफ़्तर
अमां हर मोड़ से खुलकर गुज़रता है लतीफ़ा
उछलता है, हंसाता है, ख़ुशी देता है सबको
भला बदले में कब कुछ मांग करता है लतीफ़ा
लतीफ़े का अगर भावार्थ समझाना पड़े तो
अरे इस हाल में तिल-तिल के मरता है लतीफ़ा
लतीफ़ागोई के उस्ताद ही ये जानते हैं
बड़ी मुश्क़िल से होंठों पर संवरता है लतीफ़ा
लतीफ़े यूज़ करके जो लतीफ़े को हिकारें
उन्हीं लोगों की संगत से सिहरता है लतीफ़ा
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
हर पेशे की अपनी-अपनी ब्यूटी है
हर पेशे की अपनी-अपनी ड्यूटी है
हमें अक्सर
सामने वाले का पेशा
मज़ेदार लगता है
क्योंकि उसका सच
हमसे दूर होता है,
लेकिन हर पेशे में
कभी न कभी आदमी
बहुत मजबूर होता है।
जब कोई जज
किसी की ज़िन्दगी का
फैसला लिखता है
तो वो ऊपर से
बहुत आत्मविश्वासी दिखता है
लेकिन भीतर ही भीतर
उसका पसीना छूटता है
फैसले के बाद
कलम ही नहीं टूटती
फैसला लिखने वाला भी टूटता है
हर सर्जरी के बाद
जब तक मरीज़ का
जीवन संघर्ष चलता है
सर्जरी करने वाला डाॅक्टर भी
रात-रात भर करवटें बदलता है
सर्जरी से पहले
मरीज़ ही नहीं डरता
डाॅक्टर भी डरता है
और ज़रा-सी ग़लती होने पर
मरीज़ ही नहीं मरता
कुछ हिस्सों में
डाॅक्टर भी मरता है
सर्कस का जोकर
अपनी पीड़ा जता नहीं सकता
सीमा पर खड़ा जवान
अपनी समस्या बता नहीं सकता
फाँसी पर लटका इन्सान
जब धरती से दो फुट ऊपर
फड़फड़ाता होगा
तो एक बार तो
जल्लाद का कलेजा भी
हिल जाता होगा
लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ता उनको
जो नफ़रत की फ़सल उगाते हैं
कलेजा नहीं थर्राता है उनका
जो नौजवानों को आतंकी बनाते हैं
दिल नहीं दहलता
लाशों के ढेर पर
राजनीति करने वालों का
दर्द नहीं दिखता है उन्हें
तड़प-तड़प कर
भूख से मरने वालों का
मुझे समझ नहीं आता है यार
कि हमनें क्यों उगाए हैं
नफ़रत के देवदार
दर्द, कराह और डर क्यों फैलाते हैं
हम सुख और चैन से रहना
क्यों नहीं सीख पाते हैं
मुझे यकीन है
कि जब तक आदमी में इंसान है
तब तक ज़िन्दगी बहुत आसान है
और जैसे ही हमारे भीतर का इंसान
मर जाता है
आदमी आसानी की सीमाओं से
आगे निकल जाता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
मंच की आलोचना का बोझ भी ढोता रहा
और उसका मंच पर उपयोग भी होता रहा
हास्य कविता की शक़ल में चुटकुला जब भी ढला
तालियाँ तो पिट गईं पर चुटकुला रोता रहा
✍️ चिराग़ जैन