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बोगनवेलिया

सारा शहर सज उठा है तुमसे बरसात नहीं हुई तो भी… मायावी हो तुम बोगनवेलिया कभी कतार बाँध कर खड़े हो जाते हो तेज़ दौड़ती सड़क के दोनों ओर कभी लिपट जाते हो किसी वृक्ष से और कभी ऐसे ही बस उग आते हो निरुद्देश्य जहाँ-तहाँ तुम ऊँच-नीच नहीं जानते छोटा-बड़ा भी नहीं भाषा-धर्म समझते ही...

विरोध

देर तक खड़ा रिरियाता रहा बादल लेकिन नीम रूठा ही रहा न तो पाथेय दिया निंबोरी का न ही आंगन सँवारा नीमपुष्प से। लेट आए हो ना बदरा अब भुगतो भूख सहोगे तो समझोगे किसी की प्यास! ✍️ चिराग़...

बरसात की एक सुबह

लाजवाब है आज की सुबह रात भर धोया गया है सारा शहर हर पेड़ को नहलाया गया है रात भर उत्सव का नज़ारा कर रहा हूँ अपनी बालकॅनी से। दारू पी है शायद नीम और पीपल ने। अभी तक झूम रहे हैं दोनों याड़ी। सहजने की फलियाँ बिछ गई हैं …मुजरा करने के बाद। मिट्टी की ख़ुश्बू वाला फ्रेशनर...
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