+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

गली-गली में शोर है

यह दान की मर्यादा है कि दाहिने हाथ से दान दो तो बाएं हाथ को पता नहीं चलना चाहिए कि दान दिया गया। शायद इसी सिद्धांत पर भरोसा करके चौकीदारों ने दानपात्र का पेट काटकर अपनी जेबें भर ली होंगी। क्योंकि उन्हें आश्वस्ति थी कि दाहिना हाथ तो किसी से कुछ कह नहीं सकता और दानपात्र की दृष्टि में हम अपने आपको सुपात्र सिद्ध कर ही लेंगे।
इस तरह दानदाता की मर्यादा का लाभ उठाकर चौकीदार, आस्था की लक्ष्मण रेखा को तार-तार करते रहे। सब कुछ शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था। बीच-बीच में जब कोई दुष्ट सीसीटीवी कैमरा चौकीदारों को आँखें दिखाने का प्रयास करता था तो चौकीदार इसकी नाभि का अमृत सुखा देते थे।
आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित होने के बाद किसी चौकीदार को यह ध्यान आया होगा कि दीवारों के भी तो कान होते हैं। लेकिन इस डर को बाकी चौकीदारों ने यह कहकर हवा में उड़ा दिया होगा कि दीवारों के कान होते हों तो होने दो, लेकिन दीवारों की जुबान तो हो नहीं सकती। इसलिए डरने की कोई ज़रूरत है ही नहीं।
दीवारों ने तो किसी से कुछ नहीं कहा लेकिन किसी दिन किसी घर के भेदी ने अयोध्या में छुपे रावणों की लंका का भेद खोल दिया। चौकीदारों को इससे भी कोई फर्क़ नहीं पड़ा, क्योंकि उन्होंने सुन रखा था कि ‘पिया भए कोतवाल तो डर काहे का!’
कोतवाल साहब ने भी कहावत की लाज रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन कोतवाली का एक सिपाही इस अंधेर से आँखें नहीं मूंद सका और उसने आस्था की लाज बचाने के लिए कोतवाल का विरोध करने का मन बना लिया।
अब ‘मरता क्या ना करता’ के सिद्धांत पर कोतवाल साहब ने चौकीदारों के आगे दोनों हाथ जोड़ दिए, दाहिना हाथ भी और बायां हाथ भी!

✍️ चिराग़ जैन

अवसर

राज्य में नियम बना कि जो भी नागरिक राजा की आलोचना करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा।
भयभीत प्रजा मौन हो गई।
एक दिन एक मंत्री ने राजा का मूड देखकर सलाह देने की हिम्मत की- “महाराज, यदि प्रजा के बोलने पर रोक लगी रही तो लोगों के भीतर-भीतर गुस्सा भर जाएगा। और इससे क्रांति की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
राजा ने अगले ही दिन ‘भड़ास उत्सव’ का आयोजन किया। राज्य के मेला ग्राउंड में माइक लगाया गया। और आलोचना के लिए दो घंटे की अवधि सुनिश्चित कर दी गई।
आश्वस्त किया गया कि इन दो घंटों में राजा, राज्य, योजना, नीति, प्रक्रिया या तंत्र की आलोचना करनेवाले पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।
नगर में आयोजन प्रारंभ हुआ और राजा अपने कानों में कपास उगाकर अपने महल में सो गया।
सभी नागरिक शिकायतों के पोथे लेकर आयोजन स्थल पर पहुँचे, लेकिन एक भी नागरिक राजा के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं बोल पाया। क्योंकि दो घंटे तक तो मंत्रियों ने ही माइक नहीं छोड़ा।
✍️ चिराग़ जैन

बेताल पचीसी

पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी।
जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर कहानी के समाधान में भटक जाता। ज़रा-सी चूक होते ही बेताल हाथ से निकल जाता था और विक्रम देखता रह जाता था।
एक दिन विक्रम ने साधु के हाथ-पैर बांधकर उसे ही पीठ पर लाद लिया। थोड़ी दूर चलते ही बेताल ने दूर बैठकर एक कहानी शुरू की और फिर कहानी बीच में छोड़कर भाग गया।
विक्रम ने साधु को रास्ते में पटका और कहानी पूरी करने निकल गया। इससे पहले कि कहानी पूरी हो, बेताल फिर से कोई नई कहानी उसके हाथ में थमाकर भाग निकला।
अब, साधु बीच रास्ते में बंधा हुआ कराह रहा है। यज्ञशाला पर बेताल ने कब्ज़ा कर लिया है। और विक्रम बेचारा, रोज़ एक कहानी को अधूरा छोड़कर, नई कहानी को पूरा करने में व्यस्त है।

✍️ चिराग़ जैन

हमारा लोकतन्त्र महान!

लोकतन्त्र नामक राज्य के आसपास घना ‘लोभारण्य’ था; जिसमें भयानक धनपशु और लाभासुर रहा करते थे। ये लाभासुर जब-तब नागरिकों का रक्त चूसते थे और और धनपशु बर्बरतापूर्वक उनका जीवन नारकीय बना देते थे। ‘नागरिकों’ ने अपनी सुरक्षा के लिए कठिन तपस्या की और व्यवस्था का निर्माण किया। नागरिकों की रक्षा के लिए यह व्यवस्था शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी। अब धनपशु और लाभासुर नागरिकों को प्रताड़ित करने आते थे, तो व्यवस्था उनके प्रयासों को विफल कर देती थी। इस स्थिति का सामना करने के लिए लाभासुरों ने व्यवस्था की घेराबंदी में भ्रष्टकीट छोड़ दिए और धनपशुओं ने जगह-जगह रिश्वत का गोबर करके व्यवस्था की धरती में दीमक प्रविष्ट करवा दी। भ्रष्टकीटों ने व्यवस्था के अस्त्र-शस्त्रों को नपुंसक बना दिया और दीमकों ने व्यवस्था को भीतर से खोखला कर दिया। इस दुर्बलता का लाभ उठाते हुए लाभासुरों और धनपशुओं ने व्यवस्था के भीतर अपने प्रतिनिधियों को घुसा दिया। करत-करत अभ्यास के… ये प्रतिनिधि नियामक बन गए और इन्होंने पूरी व्यवस्था को धनपशुओं और लाभासुरों के पक्ष में नागरिकों के विरुद्ध खड़ा कर दिया। अब जो नागरिक, धनपशुओं और लाभासुरों को अपना रक्त पीने से रोकता था, उसे विकास-विरोधी कहा जाने लगा। जिसने दया की गुहार की, उसे व्यवस्थाद्रोही कहा जाने लगा।
व्यवस्था ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके नागरिकों के हाथ-पैर बांधकर लोभारण्य में फेंक दिया और नागरिकों को यह आदेश दे दिया कि जब कोई तुम्हारा रक्त पीने आए तो प्रतिकार करके उसका अपमान न करना। बल्कि हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहना – ‘हमारा लोकतन्त्र महान!’

✍️ चिराग़ जैन

शुभचिंतक

एक राजा के दो बेटे थे। एक नाटे कद का था और दूसरा लंबे कद का। बचपन से ही दोनों में तनाव रहता था। जब वे बड़े हुए तो राजा ने राज्य का बंटवारा कर दिया और पूरे देश के अधिकतम नाटे नागरिक नाटे बेटे के देश में चले गए। मूल राज्य में लंबे नागरिक रह गए। लेकिन कुछ नाटे लोग अपना देश छोड़कर नाटे देश में नहीं गए और लंबे राजा के शासन में रहने लगे।
लंबे राजा ने अपने राज्य में बचे सभी नाटे लोगों को माली, तांगा, मजदूरी, दर्जी, हजामत और अन्य छोटे कामों में लगाए रखा। वे सोचने-समझने का विवेक न हासिल कर लें इसलिए नगर में जगह जगह उनके लिए नाटे बाबा के नाम पर समुदाय केंद्र बना दिये जहां हर ढाई पहर बाद पूरे नाटे समुदाय को इकट्ठा होना अनिवार्य कर दिया। अपने लोगों से उनके बीच यह बात और फैला दी कि वो जितने ज़्यादा बच्चे पैदा करेंगे उतना ही उनका भला होगा। उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी किसी भी परम्परा में यदि बदलाव किया गया तो यह उनकी सामुदायिक भावनाओं का अपमान होगा।
अब लंबे लोग व्यापार करते रहे और नाटे लोग उनके यहां नौकरी करते रहे और बदबूदार परंपराओं को निबाहते हुए जनसंख्या बढाने में लगे रहे। विकासहीन रूढ़ियों में बंधी यह जनसंख्या अपने संकरे मुहल्लों में सीमित रहकर बीमारियों और अशिक्षा का शिकार बनी रही।
कुछ समय बाद लंबे समुदाय के कुछ लोग नाटे लोगों की इस दशा से द्रवित हुए और उन्होंने स्वयं को लंबे समुदाय का शुभचिंतक घोषित करके राज्य की सत्ता हथिया ली। सत्ता हाथ में आते ही उन नए राजाओं ने सबसे पहले नाटे समुदाय में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना शुरू किया। उनके समुदाय केंद्र ध्वस्त करने शुरू कर दिए। और अपने लोगों से लंबे समुदाय में यह बात फैला दी कि लंबे लोगों को भी हर ढाई पहर बाद लंबे बाबा के समुदाय केन्द्र पर इकट्ठा होना चाहिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहियें।
अब अपने ऊपर अचानक आए संकट से नाटे लोगों का समुदाय जागरुकता की ओर बढ़ने लगा है और शिक्षा, सभ्यता तथा विकास के पथ पर अग्रसर लंबू समुदाय काम-धंधा, रोज़गार, कला, हास्य और उत्सव भुलाकर कट्टरता, घृणा, प्रतिहिंसा, नारेबाजी और उपद्रवों में रुचि लेने लगा है।
सत्ता में बैठे लोग मन ही मन खुश हैं कि उन्होंने नाटे लोगों के विकास की बाड़ गिरा भी दी और लंबे समुदाय वाले उन्हें अपना शुभचिन्तक भी मान रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

मास्टरजी की ऐसी-तैसी

‘मनसुख’ अपने खेत के एक कोने में पक्षियों के लिए चुग्गा डाल रहा था। उसे ऐसा करते देख गाँव के मास्टरजी ने उसे रोकना चाहा। मनसुख ने मास्टरजी को निष्ठुर, निर्दयी और चिड़िया-विरोधी कहकर अपमानित किया और सारे गाँव में कहता फिरा कि ”मास्टर ‘चुग्गा विरोधी गैंग’ का सरगना है। खाली पड़े खेत में चिड़ियों को चुग्गा डालता हूँ, बेचारी चिड़ियों का पेट भर जाता है। इसमें इस मास्टर का क्या जाता है!”
किसान ने यह बात इतने ज़ोर-शोर से प्रसारित की कि गाँव के कुछ लड़कों ने ‘पंछी करुणा दल’ बनाकर बात को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।
किसी ने कहा, मास्टर चाहता है कि चुग्गे का अन्न मास्टर को दे दिया जाए। किसी ने कहा कि मास्टर चिड़ियों को समाप्त करके, ख़ुद पूरे आकाश में उड़ना चाहता है। किसी ने कहा कि मास्टर किसान के खेत हड़पने का षड्यंत्र कर रहा है।
मास्टर को देखते ही ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के नारा लगाने लगे- ‘हम चिड़ियों के ख़ास हितैषी, मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’
इन सब बातों से आहत होकर मास्टरजी ने चुप्पी ओढ़ ली। किसान और गाँव के लड़के मास्टर को जलाने के लिए जेब से पैसा ख़र्च करके मनसुख के खेत में चुग्गा डालने लगे। पंछियो के झुंड के झुंड खेतों पर मंडराने लगे।
बुआई का समय आया तो मनसुख ने चुग्गा डालना बन्द कर दिया और खेत में बीज बोए। पंछियों ने बुआई का एक-एक बीज चुग्गा समझकर चुग लिया। मनसुख को दुःख तो हुआ लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी ज़्यादा थी कि मास्टर के बच्चे की हेकड़ी निकल गयी और चुग्गा डालने की परंपरा स्थापित हो गयी।
अगले दिन मनसुख ने फिर बीज बोए। लेकिन अब तक उसकी स्थापित की हुई परम्परा जड़ पकड़ चुकी थी। एक सप्ताह तक किसान रोज़ बुआई करता रहा लेकिन पंछियों को खेत से उड़ाने का साहस न जुटा सका, क्योंकि परम्परा उसी की बोई हुई थी।
अब मनसुख को पंछियों पर क्रोध आने लगा लेकिन ज्यों ही उसने पंछी भगाने के लिए उठने लगा तो देखा कि सामने से ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के बोरी भर मक्का लिए चले आ रहे थे। पास आकर बोले, आओ मनसुख भाई, खेत में चुग्गा डालें।
मनसुख निरुत्तर बैठा रहा। लड़के नारा लगाते हुए उसके खेत में चुग्गा डालने लगे। मनसुख का गला रुंध गया, आँखें डबडबा आईं लेकिन कानों में लड़कों की आवाज़ लगातार आ रही थी- ‘…मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!