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अनुवाद : परिकल्पना और वस्तुस्थिति

चूँकि उड़ने के लिए पंख फैलाने आवश्यक होते हैं, इसलिए उड़ते हुए पक्षी का आकार, बैठे हुए पक्षी के आकार से बड़ा हो जाता है। भाषा का आकार विस्तृत करके उसे सुदूर यात्रा के योग्य बनाने के लिए ‘अनुवाद’ पंखों की भूमिका निर्वाह करता है। अनुवाद, भाषा के ज्ञानकोष को समृद्ध करता है। अनुवाद के पंख लगाकर ही एक भाषा की रचना अन्यान्य भाषा-भाषियों तक यात्रा करती है।
अनुवाद के महत्त्व को हम यूँ समझ सकते हैं कि रूसी साहित्य के फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की रचना ‘अपराध और दण्ड’ को हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाना अनुवाद के बिना सम्भव नहीं था। इसी प्रकार रबीन्द्रनाथ टैगोर, शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ, लियो टॉलस्टॉय, जेन ऑस्टेन, वर्जीनिया वूल्फ, मार्क ट्वेन, व्लादिमीर नामोकोव, जॉर्ज इलियट, होमर, जॉन मिल्टन, मुंशी प्रेमचंद और कुर्रतुल-ऐन-हैदर समेत सैंकड़ों रचनाकार अनुवाद के जादुई कालीन पर बैठकर ही समूचे विश्व में लोकप्रिय हो सके हैं।
एक अनुवादक का दायित्व कई अर्थों में मूल लेखक से अधिक हो जाता है। वह केवल शब्दों का ही अनुवाद नहीं करता बल्कि स्रोत भाषा के सांस्कृतिक परिवेश तथा लक्ष्य भाषा के सांस्कृतिक परिवेश के मध्य भी सामंजस्य स्थापित करने का दायित्व निर्वाह करता है। साहित्यिक अनुवाद में तो यह दायित्व-बोध सामान्य अनुवाद की तुलना में कई गुना अधिक हो जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि अंग्रेजी की किसी कहानी का अनुवाद हिन्दी भाषा में किया जाए तो अनुवादक को इंग्लैंड के परिवेश तथा भारत के परिवेश का व्यवहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। चूँकि इंग्लैंड में ठण्ड अधिक पड़ती है इसलिए ग्रीष्म ऋतु उनके लिए सुहावनी होती है। लेकिन भारत में यदि यह लिखा जाए कि ‘गर्मी की सुहानी ऋतु थी’ तो पाठक को यह हास्यास्पद जान पड़ेगा। इसी प्रकार हिन्दी में ‘गुलाब’ पुल्लिंग है और अंग्रेजी में ‘रोज़’ स्त्रीलिंग है। कोरा शब्दानुवाद किसी कृति की भावभूमि का मर्म स्पर्श करने की बजाय उसे बेढंग का बनाकर छोड़ देता है।
इसमें भी हिन्दी कविता के अनुवाद के सम्मुख एक कठिनाई इसकी छन्दबद्धता भी है। अनेक हिन्दी कविताएँ ऐसी हैं जिनमें कथ्य से अधिक आनन्द उनके शिल्पपक्ष का है। बुनावट के इस आनन्द को लक्ष्य भाषा तक ले जाना लगभग असंभव है।

हरि गरज्यो, हरि बरस्यो, हरि आयो हरि पास।
पर जब हरि, हरि में गया, तब हरि भयो उदास।।

इस दोहे में रचनाकार ने ‘हरि’ शब्द के विभिन्न अर्थों का प्रयोग करके श्लेष अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है, किन्तु इसको यदि किसी अन्य भाषा में अनूदित किया जाएगा तो यह दोहा तीसरी-चौथी कक्षा के पाठ्यक्रम की एक बेहद सामान्य उक्ति से अधिक कोई अर्थ न संजो सकेगा।
रीतिकाल की रचनाओं में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जो यदि किसी अन्य भाषा में अनूदित कर दिए जाएँ तो गूगल उन्हें ‘इनएप्रोप्रिएट कन्टेन्ट’ समझकर अमान्य कर देगा। किन्तु हिन्दी में वे ही रचनाएँ श्रेष्ठ सौंदर्य तथा काव्य-शिल्प के लिए रेखांकित की जाती हैं।
ग़ज़ल के रदीफ़-काफ़िये उसके सौंदर्य का आधार बन जाते हैं। उन्हें अनुवाद के माध्यम से किसी अन्य भाषा तक साध लेना लगभग असंभव है।

यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है

इस शेर में प्रयुक्त लफ़्ज़ ‘आह’ को ठीक इसी भाव के साथ किसी भी अन्य भाषा तक ले जाना सम्भव नहीं है, और इस लफ़्ज़ की इस प्रयोजनीयता के आभाव में इस शेर की प्रभावोत्पादकता भंग हो जाती है।
यही कारण है कि हिन्दी की छंदबद्ध कविताएँ या तो अनुवादकों की वरीयता पर नहीं आ पातीं या फिर अनुवाद के बाद उनकी रस-निष्पत्ति लगभग शून्य हो जाती हैं।
ऐसा माना जाता है कि एक अच्छे अनुवादक को स्रोत भाषा की सामान्य तथा लक्ष्य भाषा की विशेष जानकारी होनी चाहिए। जबकि मेरा मानना है कि एक अच्छे अनुवादक को स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा दोनों की विशेष जानकारी के साथ-साथ दोनों भाषाओं के मुहावरे की भी जानकारी होनी चाहिये। एक साहित्यिक अनुवादक को दोनों भाषाओं के सांस्कृतिक, सामाजिक तथा पौराणिक परिवेश की भी अच्छी जानकारी होनी चाहिए। तथा कविता का अनुवाद करनेवाले व्यक्ति को दोनों भाषाओं की सामाजिक संवेदना का भी गहरा ज्ञान होना चाहिए।
इस गुण के अभाव में किसी कविता का अनुवाद तो किया जा सकता है किंतु उस अनूदित कृति को ‘कविता’ नहीं कहा जा सकता।
इधर कुछ समय से हिन्दी के अनुवादकों ने अपना पूरा ध्यान कार्यालयी अनुवाद पर केंद्रित कर लिया है। राजभाषा विभाग में नौकरी प्राप्त कर लेना उनके अनुवाद कर्म का अंतिम लक्ष्य है। मैं यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि वर्तमान में अधिकतर राजभाषा विभागों में लिप्यन्तरण को अनुवाद समझा जा रहा है। यही कारण है कि सरकारी प्रपत्रों तथा दस्तावेज़ों में या तो अंग्रेजी अथवा अरबी के शब्दों को यथावत देवनागरी में लिख दिया जाता है या फिर उसको इतना क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ रूप दे दिया जाता है कि वह भाषा के उपहास का कारण बन जाते हैं।
मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि भाषा को जटिल बनाकर उसकी हँसी उड़वाने से बेहतर है कि उसे सहिष्णु बनाकर उसका सरलीकरण कर दिया जाए। कार्यालयी अनुवाद तथा वैज्ञानिक व तकनीकी अनुवाद में हमें यह बात स्वीकार करनी होगी कि विज्ञान, तकनीक तथा कार्यालयी व्यवस्थाओं का जो स्वरूप हमने वर्तमान में अंगीकार किया है, उसका उद्गम संस्कृत से न होकर अंग्रेजी अथवा अरबी से होता है। इस हेतु कम्प्यूटर को ‘संगणक’ कहने की ज़िद्द ठानने से बेहतर है कि हम उसे देवनागरी में ‘कम्प्यूटर’ लिखकर संतोष कर लें।
शब्द आयात करने में भाषा की कोई हानि नहीं होती, जबकि व्याकरण को अनदेखा कर देने से भाषा अपंग हो जाती है। कार्यालयी कामकाज में कई बार ऐसा फूहड़ अनुवाद किया जाता है कि हिन्दी के दस्तावेज़ में भी अंग्रेजी का व्याकरण शेष रह जाता है। इन काग़ज़ात को पढ़कर ऐसा लगता ही नहीं कि आप हिन्दी भाषा पढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने कभी अदालती दस्तावेज़ पढ़े हैं या निविदा आदि की सूचनाएँ पढ़ी हैं, वे मेरी बात से जल्दी सहमत हो सकेंगे।
गूगल ट्रांसलेशन की सुविधा से इस प्रदूषण में दिन दूनी, रात चौगुनी प्रगति हुई है। अंग्रेजी के पत्र को गूगल ट्रांसलेशन से हिंदी में कन्वर्ट करके कार्यालय की दृष्टि में हिंदी को और अधिक अनुपयोगी बनाने में कर्मठ राजभाषा कार्मिकों ने महती भूमिका निभाई है।
राजभाषा विभागों की प्रतिष्ठापना करनेवालों ने स्वप्न यह देखा था कि एक दिन सभी सरकारी दस्तावेज़ मूल रूप से हिंदी में होंगे और विभाषीय क्षेत्रों में पत्राचार करने के लिए उनको अंग्रेजी भाषा में अनूदित करके प्रेषित किया जाएगा। किन्तु अनुवाद की लापरवाही के कारण वस्तुस्थिति यह है कि आज दफ़्तरों में प्रत्येक पत्र मूलतः अंग्रेजी में है और राजभाषा के आँकड़े पूरे करने के लिए उनका अल्लम-गल्लम देवनागरी रूपांतरण करके उन्हें आवश्यक औपचारिकता के रूप में द्विभाषी बनाकर संलग्न कर दिया जाता है। इस अनूदित काग़ज़ की क्षमता तथा उपयोगिता का अनुमान स्वयं कार्यालय को भी होता है, इसी कारण अक्सर द्विभाषी दस्तावेज़ों पर यह डिस्क्लेमर दिया जाता है कि किसी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत नियमावली को प्रमाण माना जाएगा।
अनुवाद को उत्तरदायित्व के स्थान पर औपचारिकता बनाने का ही एक दुष्परिणाम यह है कि गणित, तकनीक तथा विज्ञान जैसे विषयों के हिन्दी अनुवाद केवल ख़ानापूर्ति के लिए प्रकाशित किये जाते हैं। उनकी उपादेयता के विषय में न तो अनुवादक गम्भीर दिखाई देते हैं, न ही प्रकाशक। हाँ, विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करनेवाले मंत्रालय तथा विभाग अपने राजभाषा विभाग के आँकड़े पूरे करने के लिए इस प्रकार के फूहड़ अनुवादों को पुरस्कृत करके हिन्दी के प्रति गाम्भीर्य का अभिनय अवश्य कर लेते हैं।
अर्थशास्त्र तथा सांख्यिकी जैसे विषयों के अनुवादकों ने इतना सहयोग अवश्य किया है कि उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों में इन विषयों की उच्च शिक्षा का माध्यम हिन्दी रखना सम्भव हो सका। अभियांत्रिकी तथा चिकित्सा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र इस सुख से भी या तो वंचित हैं या फिर कोरी औपचारिकता के निर्वहन से धीरज धरे बैठे हैं।
अनुवादक यदि ठान लें तो वे बहुत कम समय में हिंदी की प्रयोजनमूलकता में इतनी वृद्धि कर सकते हैं कि राजभाषा का स्वप्न देखनेवाली आँखों की पथराई पुतलियाँ चमकने लग जाएँ। विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों की सूची में हिंदी की भी कुछ रचनाएँ सम्मिलित हो सकें। यदि अनुवादक थोड़े गम्भीर हो जाएँ, तो हिन्दी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में पढ़कर बड़े हुए बालकों को यह उलाहना नहीं सुनना होगा- ‘अबे, मेडिकल का फॉर्म तो भर रहा है, इंग्लिश मीडियम से पढ़ना पड़ेगा।’

✍️ चिराग़ जैन

भाषा : सिनेमा से समाज तक

हिन्दी सिनेमा की भाषा भारतीय समाज में हिंदी की यात्रा का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करने के लिये पर्याप्त है। ज्यों-ज्यों समाज की भाषा बदली त्यों-त्यों सिनेमा की भाषा भी बदलती गयी।
प्रारंभिक हिंदी फिल्मों में एक ओर उर्दू शब्दावली की भरमार थी तो दूसरी ओर संस्कृतनिष्ठ हिंदी भी सहज स्वीकार्य होती थी। ‘ग़म दिये मुस्तक़िल’ जैसे गीत उन दिनों लोकप्रियता के प्रतिमान बन जाते थे। मजरूह का ही ‘हम हैं मताए-कूचा-ए-बाज़ार की तरह’ जैसी ख़ालिस उर्दू की ग़ज़ल भी न केवल स्वीकार्य थी बल्कि जनता के मुँह पर चढ़कर बोलती थी। उर्दूनिष्ठ हिंदी के ये उदाहरण बाद में शकील बदायूनी, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, क़ैफ़ी आज़मी, जांनिसार अख़्तर और शहरयार से होते हुए गुलज़ार और जावेद अख़्तर के ज़माने तक ख़ूब दिखाई देते हैं। हाल ही में ‘मेरे रश्के-क़मर तूने पहली नज़र इस तरह से मिलाई मज़ा आ गया’ गीत की लोकप्रियता ने उर्दू की स्वीकार्यता पर पुनः मुहर लगाई। यह भी सत्य है कि उर्दू की गाढ़ी शब्दावली के प्रयोग में अब, पहले की अपेक्षा, क़ाफ़ी कमी आ गई है। हाँ, आम बोलचाल की उर्दू पहले भी ख़ूब प्रचलित थी और आज भी उसकी स्थिति में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिलता।
उधर संस्कृतनिष्ठ हिंदी के उदाहरण स्वरूप भरत व्यास के गीतों ने बड़ी लक़ीर खींची। ‘हरी-भरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन’; ‘प्रणय, विरह और मिलन की कथा सुनो साथी’; ‘कल्पना के घन बरसते’ और ‘ओ पवनवेग से उड़ने वाले घोड़े’ सरीखे गीत हिंदी सिनेमा के उस दौर की पहचान बने। इंदीवर ने ‘चन्दन सा बदन, चंचल चितवन’ जैसी शब्दावली से पण्डित जी की इस परंपरा को पुष्ट किया। गोपालदास नीरज जी ने ‘मदिर’; ‘पाती’ और ‘जल’ जैसे शब्दों को गीत में पिरोकर प्रचलित कर दिया। क्लिष्ट शब्दावली के प्रयोग के और भी तमाम उदाहरण हिंदी फिल्मी गीतों में आसानी से ढूंढे जा सकते हैं। बालकवि बैरागी जी द्वारा लिखे गये गीत ‘तू चंदा मैं चांदनी’ में ‘तरुवर’ और ‘पाख’ जैसे शब्द बड़ी आसानी से प्रयुक्त हुए हैं। इससे इंगित मिलता है कि उस समय तक हमारे जन की भाषा में प्रचलन से बाहर हुए शब्दों को पुनर्जीवित करने की क्षमता थी।
इससे अलग एक धारा आमफ़हम शब्दों के दायरे से बाहर जाने से परहेज करती रही। शैलेन्द्र के गीतों में हिंदी का सर्वाधिक जनसुलभ स्वरूप प्रदर्शित होता है। वे दर्शन के गीत भी सबसे सादा शब्दावली के परकोटे से बाहर नहीं जाने देते थे। ‘आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है’; ‘वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ’; ‘सजन रे झूठ मत बोलो, ख़ुदा के पास जाना है, न हाथी है न घोड़ा है वहाँ पैदल ही जाना है’ और ‘याद न जाए बीते दिनों की’ जैसे गीत उसी भाषा के उदाहरण हैं जो हम आज भी आम बातचीत में प्रयोग करते हैं। क़ैफ़ भोपाली, राजा मेहदी अली ख़ान, इंद्रजीत सिंह तुलसी, पण्डित नरेंद्र शर्मा, विट्ठलभाई पटेल और राजेंद्र कृष्ण जैसे रचनाकार भी लगभग इसी आम शब्दावली की परंपरा के गीतकार रहे। और यह शब्दावली ही फिल्मों में सर्वाधिक अपेक्षित भी रही, क्योंकि संस्कृतनिष्ठ हिंदी और उर्दूनिष्ठ हिंदी लिखनेवाले रचनाकारों के यहाँ भी इस शब्दावली के उदाहरण ख़ूब दिखाई देते हैं।
समय के साथ हमारी भाषा में पंजाबी के शब्दों की उपस्थिति बढ़ने लगी। ऐसे में आनन्द बख़्शी और संतोष आनन्द ने पंजाबी के शब्दों का सहजता से प्रयोग किया। ‘कुड़ी’; ‘मुंडा’ जैसे एकाध शब्द का प्रयोग बाद में इतना बढ़ा कि आनंद बख्शी ने ‘बिंदिया चमकेगी’ गीत की प्रत्येक तुकांत पंक्ति में बाक़ायदा पंजाबी का व्याकरण प्रयोग किया – ‘छत टुटदीये ते टुट जाये’।
लोकशैली के गीतों और कहीं-कहीं शुद्ध लोकगीतों को फिल्मों में प्रयोग किया गया तो अवधी, बृजभाषा, मराठी और भोजपुरी के हस्ताक्षर फिल्मी गीतों में चलने लगे। ‘चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे’, ‘ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे’ और ‘कौन दिसा में ले के चला रे बटोहिया’ जैसे गीत इस धारा की गीतशैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
‘गॉड प्रॉमिस हम सच बोला है’ जैसे मुम्बइया हिंदी के भी कुछ गीत फिल्मों का हिस्सा बने। लेकिन यह प्रयोग बहुत अधिक प्रचलित न हो सका। इसी तरह दक्खिनी हिंदी का तड़का लगाकर ‘हमें काले हईं तो क्या हुआ दिलवाले हैं’ जैसे भी एकाध गीत लिखे गए; लेकिन वे भी चरित्र की मांग से अधिक अपनी स्वीकार्यता न बना सके। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि हिंदी फिल्मों का लक्ष्य दर्शक इस भाषा से बहुत परिचित नहीं रहा।
विशेष प्रयोग के रूप में दूसरी पीढ़ी की फिल्मों में भाषाओं के सम्मिश्रण के कुछ उदाहरण अवश्य मिलते हैं, लेकिन उनको भी परंपरा न बनाया जा सका। साहिर ने ‘न तो करवां की तलाश है’ में पंजाबी, ब्रजभाषा और उर्दू का अद्भुत समागम प्रस्तुत किया। नीरज जी ने भी ‘छुपे रुस्तम हैं ज़माने की ख़बर रखते हैं’ में अवधी का तड़का लगाकर क़व्वाली की खूबसूरती बढ़ाई। लेकिन इनकी सनद लेकर आगे के गीतकार ऐसे बहुत अधिक प्रयोग न कर सके।
फिल्मों की छठी-सातवीं पीढ़ी में अचानक अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। यहाँ से शब्दों की तोड़-फोड़ प्रारम्भ हुई। भाषा खिचड़ी होने लगी। यह स्पष्ट रूप से कहना कठिन होगा कि यहाँ से जनता की भाषा फिल्मों ने बदली या फिल्मों की भाषा जनता ने! अंग्रेजी के मुहावरे और विशेष रूप से ‘आई लव यू’ वाक्यांश का प्रयोग गीतों में बहुतायत में होने लगा। वीनू महेंद्र ने ‘लवेरिया’ जैसा शब्द गढ़कर भी गीत लिखा, जो अपने समय मे मिसाल बन गया। आनन्द बख्शी ने भी अंग्रेजी के सहज शब्दों का प्रयोग करने के साथ-साथ कहानी की मांग पर अंग्रेजी के व्याकरण को निभाते हुए भी ‘माई नेम इज़ एंथोनी गोंसाल्विस’ जैसा गीत भी लिखा।
इसके बाद गीतों की भाषा कब हिंग्लिश हो गई, पता ही न चला। वे वर्जित शब्द जिन्हें असंसदीय या अश्लील समझा जाता था, वे भी गीतों में सम्मिलित होने लगे। हम गीत-ग़ज़ल से शुरू होकर गाली-गलौज तक को स्वीकारने लगे। यही स्थिति हमारी आम बोलचाल की भी रही। अंग्रेजी शब्दावली के बढ़ते चलन ने इस स्थिति को पुष्ट करने में महती भूमिका अदा की। एक ज़माने में ‘सेक्सी सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोलें’ गीत आया था तो सभ्य परिवारों में इस गीत को गुनगुनाने पर बच्चे पीट दिए जाते थे। बाद में यह सब आम हो गया। बॉलीवुड में ‘सत्यम-शिवम-सुंदरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसे चित्रपट कलात्मक दृश्यों के कारण विवादित हो गए, लेकिन उनसे जन साधारण की सोच दूषित न हो सकी। लेकिन गीत और संवाद में अश्लीलता की घुसपैंठ ने आज यह स्थिति उत्पन्न कर दी है कि हमारे समाज की भाषा सभ्यता की मर्यादा लांघ चुकी है।
दृश्य सिनेमाघर के पर्दे पर छूट जाता है और भाषा लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर समाज में छूत की तरह फैल जाती है। भाषा में वर्जित शब्दावली का सामान्य प्रयोग बढ़ने की प्रवृत्ति भाषा के लिए तो घातक है ही, समाज और संस्कृति के लिए भी विषबेल सरीखी है।
हिंदी फिल्मों की भाषा से यदि समाज की भाषा बनती है तो फिल्मों को अपनी भाषा के प्रति उत्तरदायित्व-बोध महसूस करना होगा और समाज की भाषा के आधार पर फिल्मों की भाषा तय होती है, तो हमें अपने परिवारों के भाषा-स्तर के प्रति बेहद गम्भीर होने की आवश्यकता है।
✍️ चिराग़ जैन

राजभाषा का निरीक्षण

जिस समस्या का कोई समाधान न हो उस समस्या को ही समाधान मान लेना चाहिए। इस महान विचार से प्रेरित होकर हम समाधान को समस्या बना देने में निष्णात हो गए।
देश को स्वतंत्रता मिली तो राजभाषा का प्रश्न उठा। प्रश्न उठते ही हमने वही किया जो हम करते आए हैं। हमने धड़ल्ले से राजभाषा के विभाग खोल दिये। थोक के भाव निदेशालय और संस्थान बनाकर हिंदी को सरकारी तंत्र में ऐसा उलझाया कि प्रश्न उठानेवालों की बोलती बंद हो गई। स्वयं हिंदी को निरीक्षणों और तिमाही रपट के ऐसे थर्ड डिग्री टॉर्चर मिलने लगे कि हिंदी आज तक उस आदमी को कोस रही है जिसने उसके उत्थान का प्रश्न उठाया था।
क्या ज़रूरत थी यह सब करने की। अच्छी-भली लोगों के मुँह पर चढ़ी थी। उसे उठाकर सरकारी दफ़्तरों में ला पटका। जब कभी हिंदी दिवस आता है या राजभाषा समिति का निरीक्षण आता है तब इसे नहला-धुलाकर पेश कर दिया जाता है और निरीक्षण सम्पन्न होते ही पुनः दफ्तर के सबसे बदबूदार कोने में पटक दिया जाता है।
यह निरीक्षण भी क़माल होता है। देश की सबसे बड़ी पंचायत से कुछ पंच दफ़्तरों का निरीक्षण करने निकलते हैं। निरीक्षण की न्यूनतम शर्त यह है कि दफ़्तर किसी रमणीक स्थल पर बना हो। क्योंकि वे जानते हैं कि जब हिंदी की फाइलों में कुछ नहीं मिलेगा तब निहारने को प्राकृतिक सौंदर्य की आवश्यकता पड़ेगी। वैसे भी जो माँ प्रकृति से दूर हो वह माँ हिंदी के क़रीब कैसे हो सकता है।
बहरहाल, निरीक्षण की सूचना मिलते ही दफ़्तर के अधिकारियों से लेकर कर्मचारी तक काम पर लग जाते हैं। मुख्यालय में नियुक्त राजभाषा अधिकारी तुरंत निरीक्षण के निशाने पर आए दफ़्तर में प्रकट हो जाते हैं। रात-दिन जागकर निरीक्षकों के लिए श्रेष्ठतम प्रवास की व्यवस्था की जाती है। मुख्यालय इस पुनीत कार्य हेतु अलग से बजट की व्यवस्था करता है। प्रत्येक निरीक्षक के लिए अलग से गाड़ी तैनात होती है। उनके पर्यटन की योजना बनाई जाती है। उनके भोजन के मेन्यू सेट किये जाते हैं। उन्हें प्रकारांतर से उपहार देने की प्लानिंग होती है। ये सब महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होने के बाद दफ़्तर की सभी नाम-पट्टिकाएँ गर्म-गर्म देवनागरी में पकाकर परोसने की तैयारी होती है। और निरीक्षण से ठीक पहले कार्यालय में हिंदी के कामकाज की फाइलें चकाचक कर दी जाती हैं।
यद्यपि मंत्रालय के पत्र में यह स्पष्ट लिखा जाता है कि उपरोक्त व्यवस्था सम्बन्धी व्यय नहीं करना है। तथापि राजभाषा के अनुभवी अधिकारी जानते हैं कि निर्देश में लिखा गया ‘नहीं’ पढ़ने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।
निरीक्षकों का कर्मठ दल हवाई अड्डे से ही निरीक्षण प्रारम्भ कर देता है। उनके स्वागत में खड़े कर्मचारी से लेकर गाड़ी पर चिपके स्टीकरों तक हिंदी की उपस्थिति जाँची जाती है। चूँकि सब कुछ पहले से ही तय होता है अतएव कहीं कोई चूक नहीं होती। यह देखकर पहले से ही तय कार्यक्रम के अनुरूप आधे निरीक्षक प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं और बाक़ी के आधे थोड़े उखड़े-उखड़े बने रहते हैं। ऐसा करने से निरीक्षण का डेकोरम बना रहता है।
कार्यालय में प्रवेश करते हुए स्वागत की वेला में पूरा कार्यालय हिन्दीमय हो जाता है। सब हिंदी बोल रहे होते हैं। जहाँ न बोलना हो वहाँ भी सभी हिंदी बोल रहे होते हैं। फिनांस के नाम से बदनाम कमरा अचानक वित्त विभाग हो उठता है। परफोर्मा यकायक प्रपत्र बन जाता है। अटेंडेंस रजिस्टर पर नया आवरण चढ़ाकर उसे उपस्थिति पत्रिका बना दिया जाता है।
निरीक्षण दल जानता है कि यह कायाकल्प उनके आगमन से एकाध दिन पूर्व ही हुआ है तथापि वे कार्यालय में हिंदी की स्थिति देखकर संतुष्ट होने की भंगिमा बना लेते हैं। हिन्दीमय वातावरण में चायपान करते समय उन्हें उनके प्रवास, भोजन तथा पर्यटन के कार्यक्रमों से अवगत करा दिया जाता है। इस सूचना के प्रेषित होते ही कार्यालय की कुछ फाइलों का पूर्वनिर्धारित औचक निरीक्षण सम्पन्न कर लिया जाता है। अगली सुबह निरीक्षण की समस्त कार्यवाही समाप्त होने के बाद निरीक्षण दल प्रकृति के वैभव का निरीक्षण करने लगता है और कार्यालय अपनी स्थायी वेशभूषा में लौट आता है। हिंदी बेचारी आचरण से निकलकर पुनः फाइलों के आवरण में सिमट जाती है।
न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका और विधायिका तक हिंदी के लिए प्रवेश निषेध की तख़्ती हर वर्ष और पुख़्ता होती जा रही है। व्यापार में हिंदी को स्थापित करने के लिए नियुक्त लोग हिंदी का व्यापार करने में संलग्न हैं। हिंदी पखवाड़े के दौरान कार्यालय के बाहर नीले रंग का सरकारी बैनर लटक जाता है। उसके बाद पूरे वर्ष हिंदी का चेहरा उस बैनर की तरह लटका रहता है।
राजभाषा विभागों का बजट पूरे कार्यालय के बजट का सबसे तुच्छ भाग होता है। और वह भी सत्र समाप्ति के समय जबरन व्यय किया जाता है। हिंदी को राजभाषा बनाने का यह ढोंग क क्षेत्र से ग क्षेत्र तक समान रूप से चल रहा है। कार्यालयी हिंदी इतनी क्लिष्ट और अव्यवहारिक बना दी गई है कि जब कभी किसी राजभाषा अधिकारी की अंतरात्मा जागती है तो वह स्वयं हिंदी की कृत्रिम सूरत को देखकर अपनी अंतरात्मा को हिंदी की एक लोरी गाकर सुला देता है।

✍️ चिराग़ जैन

शब्द नहीं चुके, हम चूके हैं

हिंदी की वर्तनी में कई बार हम ऐसी चूक कर देते हैं, जिससे अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लापरवाही के कारण कोई-कोई भूल परंपरा भी बन जाती है और फिर शब्दकोष पलटने के आलस्य के कारण समाचार पत्रों में विद्यमान “विद्वान” उसे प्रचलित प्रयोग का नाम देकर स्वीकार्य मान लेते हैं। उसके बाद कर्मठ सरकारी कर्मचारियों की कृपा से सरकारी दस्तावेज़ और सार्वजनिक सूचना पट्ट तक इस संक्रमण के प्रभाव में आ जाते हैं। आज मैं कुछ ऐसे ही “प्रचलित प्रयोगों” की वास्तविकता का स्मरण करूँगा।

(1)
अंतरराष्ट्रीय = अंतर + राष्ट्रीय = INTERnational (involving two or more countries)
अन्तर्राष्ट्रीय = अंतः + राष्ट्रीय = INTRA-national (within one nation)

(2)
ग्रह, गृह, ग्रहण, गृहिणी
ग् + र + ह = ग्रह = बुध, शुक्र, मंगल आदि आकाशस्थ पिण्ड
ग् + ऋ + ह = गृह = घर
ठीक यही चूक हम ग्रहण और गृहिणी की वर्तनी में भी करते हैं।
ग्रहण शब्द का अर्थ “पकड़ने की क्रिया” से जुड़ा है। अंग्रेजी में इसको Assumption और Eclipse के रूप में समझा जा सकता है। गृहिणी का अर्थ है “घर की स्वामिनी”। अंग्रेजी में इसे Mistress या Housewife कहते हैं।

सूर्य पर ग्रहण लगता है तो गृहिणियाँ पूजन-पाठ करने लगती हैं। पाणिग्रहण के बाद कन्या गृहिणी बन गई। कुण्डली में द्वादश गृह (घर) और नव ग्रह होते हैं।

(3)
‘न’ और ‘ना’
ये दोनों देखने में एक जैसे लगते हैं किन्तु अर्थ की दृष्टि से लगभग विलोम हैं।
“न” निषेधात्मक अर्थ देता है और सामान्यतया वाक्य के अंत में नहीं आता। जैसे – “न जाइये”, “आप न कर सकेंगे”, “अब न रहे” इत्यादि।
“ना” अनुरोधात्मक होता है और वाक्य के अंत में ही आता है।
यथा, “जाइये ना!”; “सुधारिये ना!”;
“न जाइये ना!” -इस वाक्य में यदि “ना” न लगता तो यह आदेशात्मक वाक्य होता किन्तु “ना” ने इसे अनुरोधात्मक बना दिया। है ना!

(4)
जूठा और झूठा
जूठा (जूठन) = खाने-पीने से बचा हुआ।
झूठा = असत्य बोलने वाला।
बोली में झूठ और थाली में जूठ बुरी होती है।

(5)
कई बार अच्छी हिंदी लिखने के चक्कर में हम हास्यास्पद हो जाते हैं। विवाह का निमंत्रण देते समय घर के मुखिया का नाम लिखकर साथ में ‘सपरिवार’ लिखा जाता है। यहाँ तक ठीक है।
सपरिवार = परिवार सहित
किन्तु आजकल कुछ लोगों ने कुछ अलग करने के चक्कर में “सहपरिवार” लिखना शुरू कर दिया है। इस सहपरिवार को सहन करना बहुत मुश्किल है। कुछ लोग इससे भी आगे बढ़कर ज़्यादा ज़ोर डालने के लिए “सपरिवार सहित” लिखने लगे हैं। उपसर्ग लगाने के बाद अलग से सहित लिखकर आप हिंदी का अहित कर रहे हैं।
‘स’ उपसर्ग लगाने से शब्द में सहित का अर्थ सम्मिलित हो जाता है, अलग से भाव स्पष्ट करके सामने वाले की अर्थग्राह्यता पर प्रश्नचिन्ह न लगाएँ।

(6)
“फ” और “फ़” में हम अक्सर भूल करते हैं। फ = PH फ़ = F देवनागरी की मूल वर्णमाला में “F” की ध्वनि के लिए कोई वर्ण नहीं है, किन्तु फ़ारसी और अंग्रेजी के शब्दों का जब हमारी शब्दावली में सम्मिलन हुआ तो इस ध्वनि की आवश्यकता पड़ी। इसलिए “फ़” चिन्ह को इस ध्वनि के लिए सुनिश्चित किया गया। अब हम लगभग एक जैसा चिन्ह देखकर भ्रमित हो जाते हैं और फिर (PHIR) को फ़िर (FIR) बोलते फिरते हैं। यही चूक हम अन्य शब्दों में भी करते हैं। लिखते हैं फोन (PHONE) और बोलते हैं फ़ोन (FONE) थोड़ा ध्यान रखें, आगे से ये हेराफेरी करने से बचें।

(7)
नमस्कार! यह शब्द ‘नमस्कार’ मूलतः संस्कृत का शब्द है। इसमें नमः + कार होने से विसर्ग संधि के नियमानुसार नमस्कार बनता है। ठीक वैसे ही ज्यों नमः + ते = नमस्ते हो जाता है। “नमस्ते” का सौभाग्य यह है कि उसे सब लोग “नमस्ते” ही बोलते हैं, किन्तु ‘नमस्कार’ बेचारा ‘नमश्कार’ बोला जाने लगा। सज्जनो! हमने इस नमश्कार से बहुत से अभिवादन दूषित किए हैं। कृपया आज से अपने “नमस्कार” को सुधार लें।

(8)
राज़ की बात यह है कि राज किसी का भी हमेशा नहीं रहता
राज (हिंदी) = शासन = Rule
राज़ (उर्दू) = रहस्य = Secret

(9)
गढ़ना और गड़ना
स्वर्णकार ने ख़ूबसूरत आभूषण “गढ़े” और उन्हें चोरों से बचाने के लिए ज़मीन में “गाड़” दिया।
नोट : गढ़ का एक अर्थ दुर्ग भी होता है।

(10)
ड़ और ड चिह्न का आकार तथा उच्चारण ध्वनि के कारण ‘ड’ और ‘ड़’ में लोग चूक करते हैं। जबकि इनका बिल्कुल सही प्रयोग करना बेहद आसान है। इसके लिए निम्न बिंदुओं का ध्यान रखना होगा :- .
1) ‘ड़’ कभी भी शब्द के प्रारंभ में नहीं आ सकता। इसलिये यदि यह शब्द के प्रारंभ में है तो निश्चित रूप से ‘ड’ ही होगा। जैसे डगर, डायन, डेरा, डाकिया।
2) हिंदी के शब्द के बीच में या अंत में सामान्यतया ‘ड़’ ही होगा। जैसे कड़क, धड़कन, भाड़, झाड़ी, ताड़ना।

अपवाद : 1) संयुक्ताक्षर या अर्द्धाक्षर के साथ कभी भी ‘ड़’ नहीं लगेगा। चाहे वह शब्द के बीच में या अंत में ही क्यों न हो। जैसे काण्ड, आडम्बर, ठण्ड, हाण्डी, खड्डा, गड्ढा, गुड्डा।
2) अंग्रेजी की वर्णमाला में ‘ड़’ के लिए कोई चिन्ह ही नहीं है। अतः इस भाषा से हिंदी में आए शब्दों में ‘ड़’ की ध्वनि की संभावना ही नहीं है। सो, अंग्रेजी के शब्दों में हमेशा ‘ड’ ही प्रयुक्त होगा। जैसे :- गुड, लीडर, राडार।
3) ‘ड’ से प्रारम्भ होने वाले किसी शब्द से पूर्व यदि उपसर्ग, संधि अथवा समास के कारण कोई अक्षर या शब्द जुड़ता है तो उसमें मूल शब्द का सिद्धांत ही बना रहता है। जैसे ‘निडर’ शब्द में डर से पहले नि उपसर्ग जुड़ने के कारण ‘ड’ बीच में आ गया है, लेकिन इसमें ‘ड’ ही बना रहेगा। उसे बदलकर ‘निड़र’ नहीं किया जाएगा।
नोट : ये सभी नियम ‘ढ’ तथा ‘ढ़’ के प्रयोग में भी समान रूप से लागू होते हैं।

(11)
हँसी और हसीं
हँसी = खिलखिलाहट
हसीं = हसीन, ख़ूबसूरत
उर्दू में जो शब्द ‘न’ पर समाप्त होते हैं उनमें ‘न’ को अनुस्वार से रूपांतरित करने की परंपरा है। (संस्कृत में भी ‘म्’ पर समाप्त होने वाले शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है जैसे ‘देवम्’ को ‘देवं’ लिखा जा सकता है।) ‘हसीन’ का ‘हसीं’; ‘आसमान’ को ‘आसमां’; ‘जुनून’ को ‘जुनूं’ इसी नियम के तहत लिखा जाता है। इसलिए जब किसी की ख़ूबसूरती की बात करनी हो तो उसे ‘हसीं’ कहना, वरना लोग आपकी ‘हँसी’ उड़ाएंगे।

(12)
कृपा और कृपया
1) ‘कृपया’ शब्द में आधा प प्रयोग करके ‘कृप्या’ लिखने से कृपा रुक जाती है।
2) एक वाक्य में एक बार से अधिक कृपा मांगी जाए तो भद्दा लगता है। इसलिए यदि वाक्य के प्रारंभ में ‘कृपया’ प्रयोग किया गया है तो उसमें दोबारा कृपा करने के लिए न कहें। नीचे कुछ उदाहरण देखें :-
“कृपया अपनी थाली स्वयं उठाएँ!” – यद्यपि इस वाक्य में आदेश दिया गया है किन्तु ‘कृपया’ लगने से यह अनुरोधात्मक बन गया है। यदि हम यह लिखें कि ‘अपनी थाली स्वयं उठाने की कृपा करें।’ तो भी इसका स्वरूप समान रहेगा। चूँकि वाक्य के प्रारंभ में ‘कृपया’ लगाने से ‘कृपापूर्वक’ का आशय प्राप्त होता है, इसलिए पुनः ‘कृपा’ लगाने की आवश्यकता नहीं होती।
सामान्यतया कार्यालयी पत्र व्यवहार में अधिकारी को लिखे गए पत्रों में यह चूक अधिक दिखाई देती है। यथा, ‘कृपया दो दिन का अवकाश देने की कृपा करें।’ या ‘कृपया मुझे स्टेशन छोड़ने की अनुमति दें, आपकी अति कृपा होगी।’ – इन वाक्यों में अनुरोध गिड़गिड़ाहट से भी ज़्यादा लिजलिजा हो जाता है।

(13)
कार्यवाही (हिंदी) = Proceedings
कार्रवाई (फ़ारसी)= Action
अदालत में कार्यवाही के दौरान पूछा गया कि शिक़ायत मिलने पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की। .
किसी समाधान तक पहुँचने के लिए सभा आदि में चलने वाली प्रक्रिया को कार्यवाही कहते हैं। किसी कार्यवाही से प्राप्त आदेशों के आधार पर समस्या का समाधान करने हेतु किया जाने वाला कार्य कार्रवाई कहलाता है।

(14)
रु और रू
अन्य किसी भी वर्ण पर ‘उ’ अथवा ‘ऊ’ की मात्रा लगाने में हम चूक नहीं करते किन्तु ‘र’ के साथ अक़्सर यह लापरवाही हो जाती है। थोड़ा ध्यान से देखें। इन दोनों पर लगने वाली मात्रा का आकार भिन्न है। याद करें कि आप र वर्ण पर उ/ऊ की मात्रा लगाते समय लघु अथवा दीर्घ का अंतर करते हैं या नहीं। ‘रुक’ कर सोचें, नहीं तो शब्द ‘रूठ’ जाएंगे।

(15)
जगत् और जगत
जगत् = संसार, दुनिया, शिव
जगत = कुएँ की मेढ़, कुएँ के चारों ओर का चबूतरा
‘जगत्’ संस्कृत का शब्द है और ‘जगत’ हिंदी का। हम सामान्यतया हिंदी में ‘जगत’ लिखकर समझ लेते हैं कि हमने सारा संसार लिख दिया, लेकिन वास्तव में हम तब अपनी दुनिया को कुएँ तक सीमित कर रहे होते हैं।

(16)
जब हम किसी शब्द को संबोधन के लिए प्रयोग करते हैं तो उसमें बहुवचन होने पर भी अनुस्वार नहीं लगता। जैसे :-
बच्चो! स्कूल जाओ।
मित्रो! एक-दूसरे का सहयोग करो।
भाइयो और बहनो! देश का विकास करो।
दिल्लीवालो! दिल्ली को साफ़ रखो।

ये ही शब्द जब संबोधन से इतर कहीं प्रयुक्त हों तो इनमें अनुस्वार लगेगा। जैसे :-
बच्चों ने पाठ पढ़ा।
मित्रों के साथ आनंद आया।
भाइयों की सहायता करो।
बहनों ने अपने-अपने भाइयों को राखी बांधी।
दिल्लीवालों की बात ही कुछ और है।

बच्चो! अपने मित्रों की सहायता करो।
भाइयो और बहनो! मैं सभी दिल्लीवालों को आश्वस्त करता हूँ कि उनके बच्चों के स्कूलों के हालात सुधरेंगे।

(17)
दिया और दीया
दिया : यह एक सकर्मक क्रिया है जो कुछ देने के अर्थ में प्रयोग की जाती है। किसी कार्य के सम्पन्न कर देने के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है।
दीया : दीपक
गृहिणी ने आँगन में ‘दीया’ रख ‘दिया’। ईश्वर ने सबको उसकी क्षमता के अनुसार दुःख ‘दिया’ है।

(18)
दादा और दद्दा
दादा (हिंदी) : पितामह (पिता का पिता)
दद्दा (बांग्ला) : अग्रज (बड़ा भाई) .
कला के क्षेत्र में जब कोई कनिष्ठ कलाकार किसी वरिष्ठ से मिलता है तो सामान्यतया ‘दद्दा’ कहकर संबोधित करता है। यह चलन तब से चला जब कला की गलियों में बंगाली लोगों का वर्चस्व हुआ। ‘दद्दा’ संबोधन ऐसे ही है जैसे हम सामान्य व्यवहार में किसी को भाईसाहब कहते हैं। कुछ लोग अनजाने में ‘दादा’ कह बैठते हैं। जब अपनी आयु से छह-सात वर्ष अधिक के व्यक्ति को कोई ‘दादा’ कहता है तो हास्यास्पद लगता है।

(19)
अर्थी और अरथी
अर्थी : अपेक्षा रखने वाला
अरथी : बाँस और फूस से तैयार वाहन, जिस पर बांधकर शव को मरघट ले जाया जाता है।
आजकल विद्यार्थी (विद्या+अर्थी) ही विद्या की अरथी निकालने पर तुले हैं।

(20)
कढ़ाई, कड़ाही और कड़ाई
कढ़ाई : क़सीदे निकालने का काम
कड़ाही : एक चौड़ा पात्र जो आँच पर रखकर पकाने के काम आता है
कड़ाई : सख़्ती
इन तीनों शब्दों का उच्चारण बहुत निकट का है अतः इनमें हम अक्सर चूक कर देते हैं। बस, ज़रा सी सावधानी से इस चूक से बचा जा सकता है। लड़की कढ़ाई करके सपनों का नाम लिखती है, लेकिन सौतेली माँ कड़ाई करती है कि लड़कियों को चूल्हे-चौके में ही ध्यान लगाना चाहिए। बेचारी लड़की, चुपचाप अपने सपनों को कड़ाही के नीचे भभकती आग में झोंक देती है।

(21)
‘र’ अक्षर पैरों में पड़ा हो तो पूरा होता है और सिर पर चढ़ जाए तो आधा हो जाता है। ‘कर्म’ में ‘र’ आधा है, जबकि ‘क्रम’ में ‘र’ पूरा है। जिसके सिर पर चढ़ता है उससे पहले बोलता है और जिसके पैरों में पड़ता है उसके बाद बोलता है। इस सिद्धांत को आप ध्यान रखेंगे तो कभी भी ‘आशीर्वाद’ लिखने में चूक नहीं होगी।

(22)
अनुस्वार (ं)
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म

इन पाँच वर्गों में क्रमशः ङ, ञ, ण, न और म पंचम अक्षर हैं
1) पंचमाक्षर के बाद यदि उसी वर्ग का कोई व्यंजन हो तो वहाँ ‘हिंदी’ में अनुस्वार से रूपांतरित किया जा सकता है। जैसे दण्ड में ड से पूर्व ण् की ध्वनि है इसलिए इसको ‘दंड’ लिखा जा सकता है। इसी प्रकार चंचल, चंद्रमा, झंझा, पंथ, गंगा, कंपन आदि भी हिंदी में मान्य हैं। किन्तु संस्कृत लिखते समय पञ्चमाक्षर को अनुस्वार रूप में लिखना मान्य नहीं है।
2) पंचमाक्षर के उपरांत यदि किसी अन्य वर्ग का व्यंजन हो तो अनिवार्य रूप से पंचमाक्षर ही लिखना होगा। जैसे : अन्य, उन्मत्त, उन्मुख। यहाँ अनुस्वार से रूपांतरण मान्य नहीं होगा।
3) यदि कहीं पर पंचमाक्षर की पुनरावृत्ति हो तो भी अनुस्वार से रूपांतरण नहीं होगा। जैसे : विभिन्न, सम्मोहन, सम्मत, सम्मान।
4) संस्कृत के शब्दों में यदि अंत में अनुस्वार है तो वह ‘म्’ का द्योतक है। यथा : अहं (अहम्), एवं (एवम्)।

अनुनासिकता चिह्‍न / चंद्रबिंदु (ँ) चंद्रबिंदु वर्ण नहीं है। यह स्वर का नासिक्य विकार है। इसमें स्वरों के उच्चारण में नाक से भी व्युस्राव होता है। जैसे : गाँठ, पराँठा, जहाँ, हँसना, गाँव, गँवार। सामान्यतया, इस ध्वनि के लिए चंद्रबिंदु लगाने का ही प्रावधान है किंतु जहाँ पर शिरोरेखा से ऊपर मात्रा लगती हो वहाँ यदि अनुनासिक ध्वनि है तो मुद्रण की भ्रांति से बचने के लिए चंद्रबिंदु की जगह केवल बिंदी (अनुस्वार) लगाया जाता है, जैसे : नहीं, में, भैंस, मैं आदि।

विशेष : मात्रा गणना के समय अनुस्वार की मात्रा गिनी जाती है किंतु अनुनासिकता की मात्रा नहीं गिनी जाती। कंठ 2 l संतान 2 2 l चंचल 2 l l हंस 2 l हँस l l चँवर l l l धँसी l 2

(23)
आकलन
आकलन हिंदी भाषा का शब्द है, जिसे सामान्यतया पूर्वानुमान द्वारा गणना करने के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। कुछ जगह लोग इसको आंकलन लिखने लगे हैं। किन्तु इस शब्द में अनुस्वार या चंद्रबिंदु नहीं लगता। अंक से बनने वाला शब्द आँकड़ा उन्हें भ्रमित करता होगा किन्तु हर आकलन का संबंध आँकड़ों से नहीं होता।

(24)
सफल और विफल
सफल = स + फल (फल से युक्त) विफल = वि + फल (फल से रहित) ‘सफल’ में फल ‘धातु’ पर ‘स’ उपसर्ग लगा हुआ है। जो लोग इसका विलोम ‘असफल’ लिखते या बोलते हैं वे एक ही धातु पर दो उपसर्ग जड़ देते हैं। सफल का विलोम विफल होता है।

(25)
उद् + ज्वल् + अच् = उज्ज्वल
प्र + ज्वल् + अच् = प्रज्वल
इन शब्दों में किसी भी तरह ‘ज्वल’ को ‘जवल’ बना देने की नौबत नहीं आती। इसलिए जो संधि करनी हो, वह ‘ज्वल’ से पहले ही कर लें। भविष्य में अपने कार्यक्रमों में दीप ‘प्रज्वलन’ ही करवाएँ ताकि कार्यक्रम का भविष्य ‘उज्ज्वल’ हो सके।

(26)
दुनिया
‘दुनिया’ की हालत हमने पहले ही बहुत ख़राब कर रखी है। इसे ‘दुनियां’ लिखकर कृपया इसे और बर्बाद न करें।

(27)
बदतमीज़
बदतमीज़ शब्द हमने बचपन से सुना है। इतना सुना है कि इसे कभी लिखकर देखने की ज़रूरत नहीं समझी, और श्रुत परम्परा से इसे ‘बत्तमीज़’ बोलते रहे हैं। जब आप स्वयं को सभ्य भी बनाए रखना चाहें और गाली बकने का भी मन हो तब यह शब्द बहुत काम आता है। इसे मुस्कुराते हुए बोला जाए तो यह लाड़ की प्रतिध्वनि तक दे देता है। इतने काम के शब्द के साथ बदतमीज़ी की जाए, यह अच्छी बात नहीं है।

(28)
ख़ुदकशी = आत्महत्या
यह शब्द सामान्यतया ग़लत बोला जाता है। कुछ लोग इसे खुदखुशी बोलते हैं तो कुछ खुदकुशी। जबकि इसका अर्थ है ख़ुद को नष्ट कर लेना। ख़ुद के प्राण खींच लेना।

(29)
स्वागतम् = सु + आगतम्
स्वागतम् में अलग से सु जोड़कर सुस्वागतम् लिखना ऐसे ही है जैसे किसी ने पगड़ी के ऊपर मुकुट लगा लिया हो।

(30)
बंद : (फ़ारसी) रुका हुआ, छंद, क़ैद, अवरुद्ध
बंध : (संस्कृत) बन्धन, गाँठ, बांधने की वस्तु
इन दोनों शब्दों की प्रवृत्ति लगभग समान है, इसलिए इनके प्रयोग में छोटी सी चूक होती है। कुछ उदाहरण देखें : मेरे गीत में तीन बंद हैं। समान तो बंध गया लेकिन रास्ता बंद है। शादी की गाँठ बंध जाए तो तो बंदे का दोस्तों से मिलना बंद हो जाता है।

(31)
कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके बहुवचन बनाने की ज़रूरत नहीं होती। लेकिन हम अनजाने में बहुधा ऐसा करते हैं। जैसे, ‘अनेक’ स्वयं में बहुवचन है, इसे अनेकों करके कोई लाभ नहीं है। अंग्रेजी का ‘लेडीज़’ तो इस पीड़ा से सर्वाधिक पीड़ित है। ‘एक लेडीज़ आई’ और ‘लेडीज़ों में न बैठें’ जैसे वाक्य बहुत अखरते हैं।

(32)
शल्वार = पैरों में पहनने का ढीला परिधान
शल्वार फ़ारसी भाषा का शब्द है। अनेक लोग इसे ‘सलवार’ लिखते-बोलते हैं। यह सामान्य प्रचलन में है किंतु सही शब्द ‘शल्वार’ ही है।

(33)
सर (संस्कृत) : जलाशय, तालाब, झील
सर (फ़ारसी) : सिर, सिरा
सर (अंग्रेजी) : एक संबोधन जो सम्मानित पुरुष के लिए प्रयुक्त होता है।
सिर (हिंदी) : कपाल, खोपड़ी, सिरा, चोटी, ऊपर का छोर
संस्कृत के ‘शिर’ को हिंदी में ‘सिर’ कहा गया। इसीलिए हिंदी में भी सिर पर पहनने के आभूषण को ‘शिरफूल’ कहा जाता है। हिंदी में पहुँच कर भी इस शब्द ने अनेक शब्द गढ़े, जैसे सिराहना, सिरमौर, सिरखपी, सिरचढ़ा, सिरताज। उधर फ़ारसी में ‘सिर’ का अर्थ मर्म, गूढ़, राज़ जैसे अर्थों के लिए होता रहा और हिंदी के ‘सिर’ को ‘सर’ कहा जाने लगा। इसीलिए वहाँ जो शब्द गढ़े गए उनमें छोटी इ की मात्रा नदारद रही। जैसे सरफ़रोश, सरमाया, सरफ़राज़, सरमस्ती।
इस स्थिति में कुछ शब्दों के सही रूप की पहचान पूरी तरह मिट चुकी है। जैसे हिंदी में जिसे ‘सिरदार’ कहते हैं उसे फ़ारसी ने ‘सरदार’ कहा और चूँकि ‘दार’ फ़ारसी का प्रत्यय है इसलिए ‘सरदार’ ज़्यादा समीचीन भी है। इस शब्द ने हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की खिचड़ी से काम चला रही पीढ़ी के सिर में दर्द कर रखा है। कुछ वाक्य लिखते हुए तो मज़ा आ जाता है :- सर भी तो सरदार हैं। सर के सर में दर्द है। सरफ़राज़ सर ने उसे बहुत सर चढ़ा रखा है।
भाषा गड्ड-मड्ड हो चुकी है, इसलिए ग़लत दोनों ही नहीं हैं, लेकिन यदि हिंदी वाले ‘सिर’ का प्रयोग करना शुरू करेंगे तो अनेक जगह भ्रम की स्थिति से बच सकेंगे।

(34)
सर्वश्री
संस्कृत में ‘आदिदीपक’ का प्रचलन है। जब कोई शब्द इस तरह लगाया जाए कि उसका प्रभाव उसके बाद आने वाले उस समूह के सभी शब्दों पर पड़े, तो उसे आदिदीपक कहते हैं। जब बहुत से नाम क्रम से पढ़ने अथवा लिखने हों तो सभी के नाम से पूर्व बार-बार ‘श्री’, ‘सुश्री’ अथवा ‘श्रीमती’ लिखने के स्थान पर प्रारम्भ में ‘सर्वश्री’ लिखना पर्याप्त है।
मैंने कुछ लोगों को बार-बार ‘श्री’ के स्थान पर बार-बार ‘सर्वश्री’ प्रयोग करते देखा है। उनको लगता है कि ‘सर्वश्री’ कोई ऐसी डिग्री है जो ‘श्री’ से ज़्यादा ऊँची है। जबकि वास्तव में इसकी व्यवस्था पुनरावृत्ति विकार से बचने के लिए की गई है।

(35)
विद्या, विद्यालय, विद्यार्थी
इन शब्दों के उच्चारण में अक्सर हम चूक करते हैं। विद्या शब्द में ‘द्य’ का प्रयोग है जो कि द् + य के योग से बनता है। चूँकि इस संयुक्ताक्षर की बनावट ‘ध’ से मिलती-जुलती है इस भ्रम में इसे ध और य का योग समझ लिया जाता है। इसका रोमन रूपांतरण करें तो इसकी वर्तनी ‘VIDYA’ होगी, न कि ‘VIDHYA’ । भविष्य में अपने बच्चों को ‘विद्यालय’ भेजें विध्यालय नहीं।

(36)
वैद्य = चिकित्सक, जो वैद्यक शास्त्र के अनुसार चिकित्सा करता हो। (विशेषण) वेद से सम्बंधित।
वैध = विधि के अनुसार, विधान द्वारा स्वीकृत
वैदिक = वेद से संबंधित (मूल स्रोत वेद)
वैद्य जी वैदिक परंपरा के समर्थक हैं। आयुर्वेद की दवाइयाँ अनेक पश्चिमी देशों में भी वैध हैं। मोबाइल कंपनियों को बताइये कि जब हम रीचार्ज करवाते हैं तो उसकी ‘वैधता’ होती है। और चेरिटेबल चिकित्सालयों को बताइये कि अपने दवाख़ाने में ‘वैद्य’ जी को ही नियुक्त करें।

(37)
स्रोत : उत्पत्ति, मूल कारण, बीज
स्तोत्र : स्तुति
इन दोनों शब्दों के उच्चारण में सामंजस्य होने के कारण चूक होती है। कई बार तो ‘स्रोत्र’, ‘स्त्रोत’ और ‘स्त्रोत्र’ जैसी वर्तनी भी पढ़ने को मिलती है। हम यदि शब्दों की प्रवृत्ति और अर्थ का थोड़ा सा ध्यान रखें तो इन स्थितियों से बचा जा सकता है।

(38)
‘वीणापाणि’
यह माँ सरस्वती का एक नाम है। हाथों में वीणा धारण करने के गुण स्वरूप यह समासरूप निर्मित हुआ। इसमें वीणा और पाणि (कर, हाथ) का योग है। कुछ लोग सरस्वती वंदना और सामान्य प्रयोग में ‘वीणापाणी’ लिखते/बोलते हैं। यह ऐसा ही है जैसे किसी एप्लिकेशन में अफ़सर का नाम ग़लत लिखा जाए। रिजेक्ट होने की गारंटी।

(39)
वृत : चुना गया, घेरा गया, लपेटा गया
वृत्त : गोल घेरा, वर्णन
व्रत : नियम
वृत्त शब्द से ‘आवृत्त’ शब्द की सर्जना हुई है, जिसका अर्थ है : मुड़ा हुआ, चक्कर खाया हुआ, दोहराया हुआ, अध्ययन किया हुआ। ‘प्रवृत्त’ शब्द भी इसी से निर्मित है जो सामान्यतया संलग्न या कटिबद्ध होने का अर्थ देता है। वृत शब्द का उपयोग हिंदी में कम होता है अतः बहुत से लोग ‘वृत्त’ को मुखसुख के आधार पर ‘वृत’ लिखते/बोलते हैं। जबकि दोनों शब्दों के लिए अलग-अलग अर्थ निर्धारित हैं। ‘व्रत’ इन दोनों से बिल्कुल अलग शब्द है, किन्तु अनजाने में हम इन सबमें घालमेल कर देते हैं।

(40)
‘हस्’ से हास्य, हास, उपहास, परिहास और अट्टहास जैसे शब्द बने हैं। इन सबमें थोड़ा-थोड़ा अंतर है। यद्यपि संस्कृत शब्दकोश में उपहास और परिहास का अर्थ लगभग समान है तथापि प्रयोग के आकलन अनुसार
परिहास : मज़ाक़, हँसी-ठट्ठा
उपहास : मज़ाक़ उड़ाना, व्यंग्यपूर्ण हँसी उड़ाना
इस दृष्टि से उपहास नकारात्मक है और परिहास स्वस्थ हास्य।
‘अट्टहास’ अर्थात् ऊँचे स्वर का हास। कुछ लोग इसको ‘अट्टाहस’ लिखते-बोलते हैं। जबकि सही शब्द अट्टहास है। हास : हँसी
हास्य : हँसने योग्य (जैसे प्रणम्य, पूज्य आदि)
चौपाल पर बैठे चार छोकरे ‘परिहास’ कर रहे थे। तभी वहाँ से एक लंगड़ा साधु निकला। एक लड़के को शरारत सूझी और उसने साधु के साथ-साथ लंगड़ाते हुए चलना शुरू कर दिया। दूसरे लड़के ने ‘उपहास’ करते हुए कहा- “क्या बात है महाराज!आज तो लहरा रहे हो।” अन्य छोकरे ‘अट्टहास’ करने लगे। साधु कुपित होकर बोला – “उद्दंड बालको! हर विषय ‘हास्य’ नहीं होता। व्याधि में ‘हास’ तलाशोगे तो व्यथित हो जाओगे।”

(41)
आशंका
संभावना
दोनों ही शब्द किसी अनिश्चित के घटित होने का अर्थ देते हैं, लेकिन दोनों के अर्थ में आकाश-पाताल का अंतर है। जो हम चाहते हैं, उसके होने की ‘संभावना’ होती है। और जो हम नहीं चाहते उसके होने की ‘आशंका’ होती है। यथा
1) विदर्भ में इस वर्ष अच्छी बारिश होने की संभावना है।
2) जमुना उफान पर है और शाम तक बारिश होने की ‘आशंका’ है।

(42)
शाप, अभिशाप
यह शब्द ‘शाप’ ही है। न जाने किस विद्वान ने इस शाप में एक छड़ी जोड़ कर इसे ‘श्राप’ बनाने का कुकृत्य किया है। जिसने भी इस शब्द की सूरत बिगाड़ी है उसे पाणिनि का ‘शाप’ लगेगा।

(43)
विमोचन : छुड़ाना, मुक्त करना
लोकार्पण : लोक को अर्पित करना
सामान्य व्यवहार में हम लोकार्पण के ही अर्थ में विमोचन शब्द का प्रयोग कर लेते हैं, किन्तु यदि इसके सही अर्थ पर ध्यान देंगे तो समझ आएगा कि जब मंत्री जी हमारी पुस्तक का ‘विमोचन’ करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि पुस्तक को किसी ने क़ैद कर रखा था जिसे छुड़ाने मंत्री जी आए हैं। इसलिए भविष्य में यदि कोई पुस्तक लिखें, तो उसका लोकार्पण कराएँ, विमोचन नहीं।

(44)
मुहब्बत
इस लफ़्ज़ को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से लिखते हैं। ‘मोहब्बत’ या ‘मौहब्बत’ लिखा देखता हूँ तो मुझे ‘मुहब्बत’ के अंजाम पर रोना आता है।

(45)
सम् + न्यास
व्यंजन संधि के नियमानुसार यदि ‘म्’ के बाद ‘क्’ से ‘भ्’ तक कोई भी स्पर्श व्यंजन हो तो ‘म्’ का अनुस्वार हो जाता है या उसी वर्ग का पाँचवाँ अक्षर बन जाता है। इस हेतु उक्त संधि के बाद जो शब्द बनेगा वह ‘संन्यास’ होगा। अधिकतम स्थानों पर इस शब्द का अनुस्वार ग़ायब रहता है।

(46)
वेला (संस्कृत) : काल, समय
बेला (हिंदी) : चमेली जैसा एक फूल
वेल्ला (पंजाबी) : निठल्ला
लोक प्रयोग में हिंदी की कुछ बोलियों में ‘बेला’ को ‘वेला’ के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। एक फ़िल्म आई थी – ‘आई मिलन की बेला’। इस फ़िल्म में ‘बेला’ शब्द को मुखसुख के आधार पर निर्मित अपभ्रंश के रूप में ‘समय’ के अर्थ में ही प्रयोग किया गया है। यह ग़लत भी नहीं है। लेकिन यदि हमें कभी लिखना पड़ा कि【 ‘बेला’ के महकने की ‘वेला’ बहुत सुहानी होती है।】 तब अवश्य चुनौती खड़ी हो जाएगी।

(47)
धन्यवाद और साधुवाद
‘धन्यवाद’ आभार ज्ञापन के लिए प्रयोग होता है जबकि ‘साधुवाद’ प्रशंसा के लिए प्रयोग होता है। इसलिए जब आपको किसी को THANKS बोलना हो तो ‘धन्यवाद’ कहें, लेकिन जब किसी की सराहना करनी हो तो ‘साधुवाद’ कहें। ‘साधु’ शब्द का संस्कृत में अर्थ है, ‘अच्छा’। इसका संन्यासी से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। उत्तम मनुष्य होने के कारण संन्यासी को साधु कह दिया जाता है।

(48)
उपर्युक्त = उपरि + उक्त = ऊपर कहा गया \
यह शब्द संस्कृत के उपरि में उक्त जोड़ने से बना है। जो लोग इसे ‘उपरोक्त’ लिखते हैं वे ग़लत लिखते हैं। क्योंकि संस्कृत का मूल शब्द ‘उपरि’ है और हिंदी का शब्द ‘ऊपर’। यदि हिंदी वाले ऊपर में उक्त जोड़ेंगे तो ‘ऊपरोक्त’ बनेगा। लेकिन ‘उपरोक्त’ तो किसी तरह से नहीं बनेगा। ‘उपर्युक्त’ विवेचना को ध्यान रखें और ‘उपरोक्त’ लिखने से बचें।

(49)
व्रज : मथुरा और वृंदावन के आसपास का क्षेत्र जो श्रीकृष्ण की लीलाभूमि थी।
‘व्रज’ संस्कृत भाषा का शब्द है। जिस क्षेत्र को इस संज्ञा से जाना जाता है वहाँ के लोकप्रभाव के कारण इसे ब्रज, बृज और बिरज बोल दिया जाता है। इसी प्रभाव के कारण इस क्षेत्र की बोली को हम बृजभाषा कहने लगे। लोक लालित्य के कारण यह सुंदर भी लगता है। किंतु वास्तविक शब्द ‘व्रज’ ही है। फिर भी जब होली का त्यौहार हो तो मन यही गाता है कि – “आज बिरज में होरी रे रसिया!”

(50)
त्योहार : पर्व, उत्सव
इस शब्द को कल तक मैं स्वयं ‘त्यौहार’ लिखता था, लेकिन कल एक सज्जन श्री आशीष शर्मा जी ने मेरी इस चूक की ओर इंगित किया। मैंने शब्दकोष के पृष्ठ पलटे तो ज्ञात हुआ कि मैं ग़लत था। भविष्य में अपने त्योहार मनाते समय अतिरिक्त मात्रा नहीं लगाऊंगा ताकि त्योहारों की शुद्धता का संतुलन बना रहे।

(51)
शम्अ, मआनी, मुआमला, मुआफ़
उर्दू के कुछ लफ़्ज़ हिंदी में आकर अपना रूप इसलिए बदल लेते हैं क्योंकि हिन्दी में सामान्यतया शब्द के बीच मे स्वर हो तो वह पूर्ववर्ती व्यंजन में समाहित हो जाता है, किन्तु उर्दू में इसे अलग से ही लिखा व बोला जाता है। जैसे ‘शम्अ’ को हिंदी में ‘शमा’ लिखने का प्रचलन है। ‘मआनी’ को ‘मानी’ लिखते बोलते हुए हम कब ‘मायने’ बोलने लगे, यह पता ही न चला। चूँकि उर्दू वाले प्रथम अक्षर पर लगी लघु मात्रा को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते इसलिए उनके ‘मुआमला’ का भी ‘मामला’ बिगड़ गया और ‘मुआफ़’ तक को ‘माफ़’ करने लगे।

(52)
वापस : प्रत्यागत, लौटा हुआ
वापसी : प्रत्यागमन, लौटना, वापस आना
वापस शब्द की सही वर्तनी में कहीं भी ‘इ’ की मात्रा नहीं आती। अनजाने में जो लोग इसे ‘वापिस’ बोलते या लिखते रहे हैं वे भविष्य में शुद्ध प्रयोग की ओर वापस आएंगे।

(53)
चुकना और चूकना
शीर्षक में प्रयुक्त इन दो शब्दों के विषय में अनेक जिज्ञासाएं प्राप्त होती हैं। अनेक मित्रों का मत है कि मुझसे भूलवश ऐसा हो गया है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैंने सोच-समझ कर शीर्षक में इन दोनों शब्दों को प्रयोग किया है।
चुकना : सम्पन्न हो जाना, समाप्त हो जाना। यह शब्द भूतकाल में सम्पन्न हुए किसी कार्य अथवा घटना का द्योतक है। जैसे खा चुका, रह चुका, सो चुका।
चूकना : किसी लक्ष्य का छूट जाना। यह शब्द भूल, ग़लती आदि के लिए प्रयोग होता है। जैसे भूल चूक लेनी देनी, मैं मौक़ा चूक गया। ‘शब्द नहीं चुके’ का अर्थ यह है कि शब्द समाप्त नहीं हुए हैं। शब्द कभी नहीं चुकते। हम ही उनका उचित प्रयोग करने में चूक गए हैं। हम ही अनजाने में भूल करते जा रहे हैं।

(54)
छिपना
यह शब्द ‘छिपना’ ही है। जो लोग इसे ‘छुपना’ लिखते या बोलते हैं, वे अशुध्द प्रयोग करते हैं। इस शब्द की विकृति में बॉलीवुड का बड़ा योगदान है। फ़िल्म का नाम ही ‘छुपा रुस्तम’ रख दिया। गाना गाया तो भी ‘छुप गए सारे नज़ारे…’। इनसे प्रेरणा लेकर हम भी अपनी ‘छिपम-छिपाई’ को छुपम-छुपाई’ बोलने लगे। लेकिन शब्दों की इस ‘लुका-छिपी’ में भी शब्दकोश ने कभी कुछ ‘छिपाव’ न रहने दिया।

(55)
अवधि और अवधी
अवधि : समयसीमा, Duration, Period, Term
अवधी : अवध क्षेत्र की बोली।
बाबा तुलसी ने अवधी में ऐसा काव्य रच दिया जिसकी लोकप्रियता की अवधि निरंतर बढ़ती जाती है।

(56)
विदुर : ज्ञाता, पंडित, पाण्डु के अनुज
विधुर : दुःखी, जिसकी पत्नी मर गई हो
अपने ज्ञान और चातुर्य के बल पर विदुर ने यह सिद्ध किया कि वे अपने नाम के अनुरूप ही गुणी भी हैं। किन्तु वे विधुर नहीं थे, क्योंकि उनकी पत्नी ‘पारसंवी’ पूर्णतया स्वस्थ थी और पारसंवी के हाथ से श्रीकृष्ण ने उल्टे पीढ़े पर बैठ कर वैसे ही केले के छिलके खाए थे, जैसे शबरी की भक्ति देख राम ने जूठे बेर खाए थे।

(57)
प्रसाद : अनुग्रह, कृपा, देवता को चढ़ाई गई वस्तु
प्रासाद : राजमहल, राजभवन, देवालय
प्रसाद शब्द को लोग जब किसी के नाम के साथ प्रयोग करते हैं तो सामान्यतया चूक नहीं करते। जैसे हरि प्रसाद, राम प्रसाद आदि। किन्तु इसी शब्द को लेकर जब हम मंदिर पहुँचते हैं तो न जाने क्यों इसे ‘परसाद’ या ‘परशाद’ बोलने लगते हैं। सम्भव है, इस अशुद्ध उच्चारण के कारण देवता हमारा प्रसाद ग्रहण न करते हों।

(58)
दिलासा, सांत्वना
हताशा, निराशा, शोक, दुःख अथवा क्षोभ के समय हिम्मत बंधाना हमारा मानवीय कर्त्तव्य है। किन्तु याद रहे कि दिलासा दिया जाता है और सांत्वना दी जाती है। जो शब्द प्रचलन विकृति के शिकार हुए हैं उनमें ‘दिलासा’ भी एक है। भ्रम की स्थिति में शब्दकोश से पूछा तो पता चला कि दिलासा पुल्लिंग है।

(59)
दुलहन और दूल्हा
हिंदी भाषा का शब्द है ‘दुलहन’ जिसे कुछ लोग ‘दुलहिन’ भी लिख बोल देते हैं। दुलहन शब्द ने जब आंचलिकता का सिंगार किया तो इसे दुल्हनिया कहा जाने लगा। गांव में खेलती इस दुल्हनिया को जब हम वापस शहर लाए तो बाद का ‘इया’ तो हटा दिया किन्तु ‘ल’ की बैसाखी लगाना भूल गए। किन्तु शब्दकोश कुछ नहीं भूलता। उसके पास आज भी ‘दुलहन’ सुरक्षित है। ‘दूल्हा’ इस सबसे इसलिए बच गया क्योंकि लोकबोली के घर प्रवेश करते हुए वह सतर्क था और उसने ‘ह’ की दीर्घ मात्रा को ‘ल’ में जोड़ कर स्वयं को ‘दूलह’ बनाया। इसलिए जैसे ही वह लोक लालित्य से बाहर निकला उसने अपनी आदत के अनुसार स्वयं को ठीक करके फिर से ‘दूल्हा’ बना लिया।

(60)
पूर्वग्रह : पूर्व + ग्रह (समास)
दुराग्रह : दु: + आग्रह (संधि)
पूर्वग्रह का अर्थ है पहले से ग्रहण करना। किसी के विषय में पहले से राय क़ायम करना पूर्वग्रह है। दुराग्रह का अर्थ है मूर्खतापूर्ण हठ या बुरा आग्रह। ‘दुराग्रह’ की वर्तनी देखकर ‘पूर्वग्रह’ को ‘पूर्वाग्रह’ लिखना हमारा ‘पूर्वग्रह’ है और किसी के समझाने पर भी उसमें सुधार न करना ‘दुराग्रह’ है।

(61)
चक्रवर्ती : एक समुद्र से दूसरे समुद्र पर राज्य करने वाला।
चक्र-वृद्धि : सूद दर सूद
कल कोई बता रहा था कि बैंक का ब्याज तो चक्रवर्ती ब्याज होता है। सुनकर मुझे लगा कि इतना ब्याज मिलता होगा जिससे मूलधन का स्वामी अकूत संपत्ति अर्जित कर लेता हो। फिर जब बैंक ब्याज की दर पता की तो लगा कि 4 से 6 प्रतिशत में तो यह सम्भव नहीं है। इसलिए भविष्य में ब्याज से साथ चक्र-वृद्धि शब्द ही जोड़ें। चक्रवर्ती ब्याज देना पड़ा तो बैंक कंगाल हो जाएगा।

(62)
अलमबरदार : झंडा उठाने वाला
नम्बरदार : अंग्रेजों के ज़माने में कर वसूलने वाला ज़मींदार, गाँव का मुखिया।
इन दोनों शब्दों में भ्रम को स्थिति इसलिए उत्पन्न हो जाती है क्योंकि हमारे कुछ ग्रमीण क्षेत्रों में “नम्बरदार” को “लम्बरदार” बोला जाता है और “लम्बरदार” “अलमबरदार” से मिलती-जुलती ध्वनि देता है अंग्रेजों का शासन समाप्त होने के बाद बंगाल में नम्बरदारों के विरुद्ध सरकार ही अलमबरदार बन गई थी।

(63)
बहु : (उपसर्ग से रूप में प्रयुक्त) बहुत, अधिक, ज़्यादा। उदाहरण : बहुआयामी, बहुमान।
बहू : (वधू का अपभ्रंश) पत्नी, दुल्हन
उन्होंने गली-गली जाकर कहा कि राजीव की बहू को बहुमत मत देना।

(64)
अंत्य + अक्षरी = अंत्याक्षरी
इस शब्द को कुछ लोग अंताक्षरी लिखते बोलते हैं, जबकि यह वास्तव में अंत्याक्षरी है।
इसमें अंत्य शब्द ठीक वैसे ही प्रयोग किया गया है जैसे अंत्योदय शब्द में किया गया है।

(65)
प्लेट्स : रकबियाँ, थालियाँ, पत्तलें, पट्टियाँ, पट्ट,
प्लेटलेट्स : एक प्रकार की रक्त कोशिकाएँ
जब किसी को डेंगू होता है तब डॉक्टर प्लेटलेट्स काउंट करवाने को कहता है, लेकिन हमारे देश में अनेक लोग प्लेट्स गिनवाने निकल पड़ते हैं। “जब किसी के प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं तब उसे प्लेट में रखी चीजें नहीं, बल्कि गिलास में भरी चीज़ों का सेवन करना चाहिए।”

(66)
शलजम (हिंदी)
शलगम (फ़ारसी)
ये दोनों शब्द समानार्थी हैं। यद्यपि इनमें कोई भी अशुद्ध नहीं है, फिर भी यदि हिन्दी के पास उसी अर्थ का, उसी मात्राभार का, उसी तुकांत का बिल्कुल वैसा ही शब्द है तो उसमें विदेशी शब्द प्रयोग करना उचित नहीं। मैं पुनः कह रहा हूँ कि दोनों ही शब्द सही हैं।

(67)
उपलक्ष्य
कोई ऐसा कारण अथवा विचार जिसको ध्यान में रखकर कोई बात कही जाए या कोई काम किया जाए, उपलक्ष्य कहलाता है। सामान्यतया सांस्कृतिक कार्यक्रमों के निमंत्रण पत्र पर यह शब्द दिखाई देता है। किंतु कुछ जगह इसे ‘उपलक्ष’ लिखा जाने लगा है। यह उचित प्रयोग नहीं है। लक्ष शब्द का अर्थ है ‘लाख की संख्या’। इसका उपलक्ष्य से कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु प्रचलन के संक्रामक रोग के कारण यह प्रयुक्त होने लगा है। जबकि सही शब्द ‘उपलक्ष्य’ ही है।

(68)
अंग्रेजी का मूड हिंदी का मुंड
इन दोनों शब्दों के अर्थभ्रम से एक अजीब सा शब्द निर्मित हुआ। मुंड का अर्थभ्रम हुआ तो लोग इसे सिर का समानार्थी मानने लगे। ‘सिर घूम जाना’ मुहावरा धीरे-धीरे ‘दिमाग़ घूम जाने’ और ‘दिमाग़ ख़राब होने’ में बदल गया। उधर अंग्रेजी का ‘MOOD OFF’ हौले से हिंदी में प्रविष्ट हुआ। धीरे धीरे यह ‘मूड ख़राब होने’ के रूप में रूपांतरित हो गया। हिंदी बोलचाल में रचा बसा ‘मूड’ हिंदी के ‘मुंड’ से रूपसाम्य रखने के कारण कुछ क्षेत्रों में ‘मूंड’ का रूप धारण करके घूमने लगा। यदि आपने कभी किसी को ‘मूंड ख़राब’ कहते सुना है तो उससे मूड ऑफ़ करने की जगह, इस शब्द की यात्रा का आनन्द लो।

(69)
तत्त्वावधान
इस शब्द की वर्तनी में दो चूक अक्सर दिखाई देती हैं। प्रथम, ‘तत्त्व’ शब्द को ‘तत्व’ लिखा जाता है। दूसरा ‘अवधान’ शब्द को ‘आधान’ लिखा जाता है। इन दोनों से बचें और भविष्य में जब कोई कार्यक्रम हो तो उसे किसी के ‘तत्त्वावधान’ में ही आयोजित करें।

(70)
दवाई / दवाइयाँ
हिंदी में यदि एकवचन से बहुवचन बनाने के लिए शब्द के अंत में ‘याँ’ या ‘यों’ जोड़ा जाता है तो मूल शब्द का अंतिम वर्ण ह्रस्व हो जाता है।
दवाई : दवाइयाँ
भाई : भाइयों
अधिकतर केमिस्ट अपनी दुकान पर “दवाईयां” लिखवाते हैं। इनकी दुकान से औषधि ख़रीदकर रोगी ठीक होगा या नहीं, यह तो ईश्वर जानता है; लेकिन भाषा के बचने की कोई संभावना नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

वाइको

कांग्रेसवाले कैसे-कैसे पीस ले के आए
कटपीस हो के चिन्दी-चिन्दी पे फँसा दिया
कभी तो किसी ने आलू-सोने से बिगाड़ा खेल
कभी नारियल, कभी भिंडी पे फँसा दिया
कभी चायवाला कहा और कप धोने पड़े
निंदा पे फँसाया कभी निंदी पे फँसा दिया
पहले ही बोलती थी बन्द कांग्रेसियों की
और अब वाइको ने हिंदी पे फँसा दिया

✍️ चिराग़ जैन

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